रसाल सिंह। भारत और चीन दोनों की अर्थव्यवस्थाएं प्रतिस्पर्धी हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में दोनों काफी हद तक समान वस्तुओं का निर्माण और निर्यात करते हैं। परंतु चीन से आयातित सस्ती वस्तुओं से भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष एक बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है। चीन वर्तमान में भारतीय उत्पादों का तीसरा बड़ा निर्यात बाजार है। वहीं चीनी वस्तुओं का भारत सबसे ज्यादा आयात करता है और भारत चीन के लिए एक सर्वाधिक संभावनाशील बाजार है। यहां सस्ते चीनी उत्पादों के उपभोक्ताओं की बड़ी भारी संख्या है।

चीन से भारत मुख्यतः इलेक्ट्रिक उपकरण, मेकेनिकल सामान, कार्बनिक रसायनों आदि का आयात करता है। वहीं भारत से चीन को मुख्य रूप से खनिज ईंधन और कपास आदि का निर्यात किया जाता है। भारत में चीनी टेलीकॉम कंपनियां और चीनी मोबाइल का मार्केट बहुत बड़ा है। भारत का थर्मल पावर एवं सोलर मार्केट चीनी उत्पादों पर निर्भर है। दवाओं के लिए कच्चे माल की प्राप्ति के लिए भारत पूरी तरह से चीन पर निर्भर है जिसका दुखद परिणाम कोरोना काल में लॉकडाउन के कारण चीन से कच्चे माल की आपूर्ति न हो सकने के कारण दवाओं के उत्पादन एवं आपूर्ति में कमी और यकायक हुई मूल्य वृद्धि के रूप में देखा गया। इस समस्या से शीघ्र छुटकारा प्राप्त किए जाने की आवश्यकता है, वरना भविष्य में भारत को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।

भारत चीन द्विपक्षीय व्यापार के संदर्भ में वर्ष 2019 में भारत ने चीन से 75 अरब डॉलर की वस्तुओं का आयात किया था, जबकि इस दौरान भारत ने चीन को सिर्फ 18 अरब डॉलर की वस्तुओं का निर्यात किया। स्पष्ट है कि भारत को 57 अरब डॉलर के व्यापार घाटे का सामना करना पड़ा। इससे बचने के लिए भारत को चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता कम करनी होगी। इसके लिए घरेलू स्तर पर कच्चे माल की उपलब्धता के साथ उत्पादक गतिविधियों को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है। भारत को तत्काल नई औद्योगिक इकाइयां लगाने और व्यापार करने के नियमों को सरल बनाने की आवश्यकता है। नौकरशाही और लालफीताशाही जनित लेटलतीफी और अव्यवस्था को भी दूर किया जाना चाहिए। यह एक चिंतनीय प्रश्न है कि भारत में श्रम सस्ता होने के बावजूद उत्पादन लागत चीन के मुकाबले इतनी अधिक क्यों है?

यह सर्वविदित है कि डब्ल्यूटीओ के अधीन भारत चीनी या अन्य किसी देश की वस्तुओं के आयात पर प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंध नहीं लगा सकता है, परंतु परोक्ष रूप से आयात शुल्कों में वृद्धि करके या सुरक्षा मानकों के आधार पर ऐसी प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की जा सकती है। गौरतलब है कि दिसंबर 2010 में भारत द्वारा चीन से आयातित दूध और दूध से निर्मित अन्य वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, क्योंकि चीनी दूध में मोलामिन नामक पदार्थ से कई चीनी बच्चों की मृत्यु हो गई थी।

चीनी वस्तुओं के आयात और उपयोग के सामरिक प्रभावों के विषय में भारतवासियों में जागरूकता पैदा किया जाना अति आवश्यक है। स्वदेशी उत्पादों का अधिकाधिक उपयोग चीन की सामरिक सामर्थ्य को क्रमशः कमजोर करेगा। यह चीन के आर्थिक वर्चस्व और क्रमिक विस्तारवाद का सबसे सटीक इलाज है। सरकार को इस दिशा में व्यापक विचार-विमर्श करके ठोस पहल करनी चाहिए ताकि वर्षों पुरानी इस समस्या का समाधान करके भारत की आत्मनिर्भरता के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा को दूर किया जा सके। वस्तुतः आर्थिक आत्मनिर्भरता ही चीन की सामरिक हेकड़ी का सही और समीचीन जवाब है।

[प्रोफेसर, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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