विकास सारस्वत : कतर में जारी फीफा विश्व कप फुटबाल इतिहास का पहला ऐसा आयोजन है, जो खेल से ज्यादा अन्य कारणों से चर्चा में है। भारत से भागे जाकिर नाइक के आगमन ने इस कार्यक्रम को और विवादास्पद बना दिया। हालांकि कतर ने सफाई दी है कि उसने नाइक को नहीं बुलाया, लेकिन यह प्रश्न अनुत्तरित है कि वह वहां पहुंचा कैसे? यह पहला अवसर है जब किसी पश्चिम एशियाई या मुस्लिम देश को फुटबाल विश्व कप की मेजबानी मिली है। एक नए भौगोलिक क्षेत्र और भिन्न संस्कृति में विश्व कप की पदचाप उत्साह का विषय होनी चाहिए थी, परंतु खेल जगत में निराशा और नाराजगी देखने को मिल रही है।

प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही विश्व कप विवादों में घिरा रहा। मेजबानी का अधिकार पाने को लेकर न सिर्फ कतर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, बल्कि अमेरिकी अदालत में अमेरिका के अलावा ब्राजील, अर्जेंटीना, त्रिनिदाद और ग्वाटेमाला फुटबाल संघ प्रतिनिधियों पर घूस खाकर कतर के पक्ष में वोट देने के मुकदमे चले और सजा भी हुई। फुटबाल जगत में इसे लेकर भी नाराजगी है कि गर्मियों में होने वाले विश्व कप को कतर की भीषण गर्मी के चलते सर्दी में समायोजित करने की वजह से प्रमुख प्रतियोगिताओं का कार्यक्रम प्रभावित हुआ।

सबसे ज्यादा आक्रोश का कारण कतर का मानवाधिकार विरोधी रिकार्ड और उसकी वह इस्लामी कट्टरता है, जिसने विश्व कप को खेल के बजाय इस्लाम के प्रचार का अवसर बना दिया है। ‘द गार्जियन’ के अनुसार 2010 में मेजबानी मिलने के बाद से अब तक दोहा में विभिन्न निर्माण कार्यों में अमानवीय परिस्थितियों में कार्य कर रहे लगभग 6,500 प्रवासी मजदूरों की जान जा चुकी है। इतनी बड़ी संख्या में हुई मौतों के विरोध में डेनमार्क टीम की किट बना रही कंपनी हमल ने टीम के अधिकृत रंगों के अलावा काले रंग की अतिरिक्त पोशाक भी तैयार की। कतर पर खेल को मजहबी कलेवर देने का जुनून इस कदर हावी है कि उसने तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। बीयर जो फुटबाल संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है और जो आयोजन के अनुबंध का हिस्सा थी, उस पर रोक लगा दी गई। समलैंगिक अधिकारों को समर्थन देने वाले प्रतीक वर्जित करने के साथ महिलाओं के पहनावे पर कड़े दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए।

कतर में सार्वजनिक स्थलों पर इस्लामी उक्तियां और हदीसें लिखी हुई हैं। होटलों में क्यूआर कोड से आगंतुकों को दीनी तालीम के लिए प्रेरित किया जा रहा है। सरकार ने जगह-जगह इस्लाम पर प्रदर्शनियां लगा रखी हैं। अपनी मान्यताओं को लेकर बेहद संवेदनशील कतर ने यहूदियों के कोशर भोजन और सब्बाथ पर रोक लगा दी है। विश्व के सबसे लोकप्रिय खेल आयोजन में मजहबी कट्टरता की नुमाइश के क्रम में कतर ने भगोड़े जाकिर नाइक को इस्लामी प्रचार के लिए आने दिया। इसी कतर ने शिवलिंग के अपमान के प्रत्युत्तर में नुपुर शर्मा की टिप्पणी पर बेअदबी का हल्ला मचाया था।

फुटबाल विश्व कप जैसे बड़े आयोजन के समय मेजबान देश एक लघु विश्व का रूप ले लेता है। ऐसे में आयोजनकर्ता का आतिथ्य भाव दूसरों की संवेदनाओं और मान्यताओं के आदर में दिखाई देता है, परंतु कतर जैसे देश से ऐसी कोई अपेक्षा बेवकूफी है। विश्व भर में आतंकी संगठनों की पैरवी और वित्तीय सहायता करने में कतर अग्रणी रहा है। हमास जैसे आतंकी और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे अतिवादी संगठनों को कतर का खुला समर्थन मिला है। तालिबान पिछले 12 वर्षों से दोहा में दफ्तर खोले हुए है। 9/11 हमले का मुख्य साजिशकर्ता खालिद शेख मोहम्मद पकड़े जाने से पहले कतर में रह रहा था। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था और कई देशों द्वारा आतंक की काली सूची में डाले गए इमाम अब्दुल्लाह अल अली, नबील अल अबदी और स्वयं को ‘अलकायदा कमांडो’ कहने वाला हमद अल अली कतर की सरकारी मस्जिद अब्दुल वहाब मस्जिद में खुतबे पढ़ते रहे हैं।

जर्मनी के मंत्री ग्रैग म्यूलर ने कतर राजशाही पर इस्लामिक स्टेट को वित्तीय मदद देने के आरोप लगाए हैं। इसी तरह अमेरिकी राजनयिक डेविड कोहन ने कतर पर अलकायदा को वित्तीय मदद देने के आरोप लगाए हैं। अलकायदा के दो सबसे बड़े वित्तपोषक अल सुबाय और अल नुऐमी कतर में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। अमेरिका द्वारा घोषित आतंकी अब्द अल रहमान तो कतर फुटबाल संगठन का अध्यक्ष भी रहा है। उस पर दुनिया भर के तमाम आतंकी संगठनों को वित्तीय मदद मुहैया कराने के आरोप हैं। ऐसे आपत्तिजनक रिकार्ड के बावजूद कतर को विश्व कप की मेजबानी देना बहुत चौंकाने वाली बात है।

अतीत में आस्ट्रेलियाई मीडिया सामंत कैरी पैकर द्वारा शुरू की गई वर्ल्ड क्रिकेट सीरीज में शिरकत करने वाले खिलाड़ियों का इसलिए बहिष्कार होता था, क्योंकि पैकर ने रंगभेदी दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ियों को मौका दिया था, लेकिन आज आतंक के सबसे बड़े समर्थक और पोषक देश कतर को विश्व कप की मेजबानी दिखाती है कि खेल संस्थाओं का नैतिक मेरुदंड गायब हो चुका है। कतर को उसकी शर्तों पर विश्व कप आयोजन के अधिकार ने इस्लामी कट्टरता और उसके राजकीय प्रोत्साहन को सामान्य बना दिया है। खेलों को राजनीति से दूर रखना एक बात है, मगर उन्हें भेदभावपूर्ण, दमनकारी शासनों में सम्मानजनक स्थान दिलवाने का जरिया बनाना अलग बात। कतर की यह दलील थोथी है कि वह एक भिन्न संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है और इस भिन्नता का सम्मान होना चाहिए। लैंगिक भेदभाव, गैर-नस्लीय अप्रवासियों का शोषण या भिन्न यौन अभिरुचि के चलते समलैंगिकों का उत्पीड़न कहीं से सांस्कृतिक नहीं है। यह सीधी-सीधी क्रूरता है।

कतर विश्व कप पर अंतरराष्ट्रीय क्षोभ को नार्वे फुटबाल संघ की अध्यक्ष लीज क्लवेनेस ने सटीक प्रतिध्वनि दी है। लीज के अनुसार ‘फुटबाल के मूल हित मानवाधिकार, समानता और लोकतंत्र में निहित हैं और कतर को विश्व कप फीफा द्वारा अस्वीकार्य तरीकों से दिया गया वह आयोजन है, जिसके परिणाम तमाम अस्वीकार्य बातों में होंगे।’ कतर के सामने फीफा ने किस तरह समर्पण कर दिया, यह इससे सिद्ध होता है कि वह उन खिलाड़ियों को यलो कार्ड दिखाने की धमकी दे रहा, जो समलैंगिकों के समर्थन में अपनी बांह पर वन लव बैंड पहनना चाहते हैं।

(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Edited By: Praveen Prasad Singh

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