[ भरत झुनझुनवाला ]: कोरोना संकट के बीच कई राज्यों ने श्रम कानूनों को नरम करने अथवा उन्हें कुछ समय के लिए स्थगित करने के कदम उठाए हैं, लेकिन केवल ऐसे ही कदमों से न तो निवेश आएगा और न ही रोजगार सृजित होंगे। निवेश के लिए बुनियादी संरचना, कानून व्यवस्था, बाजार में मांग, आयात की स्थिति पर भी विचार करना होता है। केवल श्रम सुधार सफल नहीं होंगे। स्वीडन में श्रम कानून सख्त होने के बावजूद रोजगार सृजित हो रहे हैं, जबकि कनाडा में श्रम कानून नरम किए जाने के बाद भी वहां रोजगार में गिरावट आ रही है। जैसे मंडी में क्रेता एवं विक्रेता के बीच सौदा होता है उसी प्रकार श्रम बाजार में श्रमिक और उद्यमी के बीच सौदा होता है। इस सौदे के आधार पर श्रमिक के वेतन निर्धारित होते हैं।

यदि सरकार श्रम कानून बनाकर गिरावट को रोकना चाहती है तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे

यदि मंडी में आलू की सप्लाई अधिक हो और खरीदने वाले कम हों तो आलू के दाम गिर जाते हैं। इसी प्रकार जब अर्थव्यवस्था में श्रम की सप्लाई अधिक हो और मांग कम हो तो वेतन कम हो जाते हैं। अपने देश में श्रम की अपार सप्लाई है और अर्थव्यवस्था कमजोर है, इसलिए वेतन में गिरावट के आसार हैं। यदि सरकार कानून बनाकर इस गिरावट को रोकना चाहती है तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। यदि व्यापारी तय कर लें कि 50 रुपये प्रति किलो से नीचे आलू नहीं बेचेंगे तो बड़ी मात्रा में आलू बिकने से रह जाएगा। इसी प्रकार यदि सरकार वेतन को कृत्रिम रूप से ऊंचे स्तर पर लाती है तो उद्यमी श्रमिक के स्थान पर मशीन का उपयोग करेंगे और श्रम की मांग कम हो जाएगी और श्रमिक बेरोजगार हो जाएंगे।

तकनीक ने अधिक संख्या में श्रमिकों को रखने का झंझट कम किया

एक चीनी मिल 40 वर्ष पहले दो हजार टन गन्ने की पेराई एक दिन में करती थी। तब वहां लगभग दो हजार श्रमिक काम करते थे। आज उसी चीनी मिल में आठ हजार टन गन्ने की प्रतिदिन पेराई की जा रही है, जबकि श्रमिकों कि संख्या पांच सौ के करीब रह गई है। इसका कुछ कारण तो तकनीकी सुधार है जैसे ऑटोमेटिक मशीन। इससे चीनी की गुणवत्ता को नियंत्रित किया जा सकता है। दूसरा कारण यह है कि उद्यमी अधिक संख्या में श्रमिकों को रखने का झंझट नहीं मोल लेना चाहते।

श्रम कानूनों के कारण उद्यमी श्रमिकों के स्थान पर मशीन का उपयोग कर रहे हैं

उद्योगों के महासंघ फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री का एक अध्ययन कहता है कि श्रम कानूनों के कारण अपने देश के उद्यमी अपनी फैक्ट्रियों को विदेश में स्थापित कर रहे हैं अथवा श्रमिकों के स्थान पर मशीन का उपयोग कर रहे हैं। कृत्रिम रूप से वेतन को ऊंचा बनाकर हमने श्रमिकों के एक कुलीन वर्ग की स्थापना कर दी है। ऊंचे वेतन एवं ट्रेड यूनियनबाजी के कारण ही जिन उद्योगों के कारण कानपुर कभी मैनचेस्टर ऑफ ईस्ट के नाम से मशहूर था वे मृतप्राय हो गए। मुंबई में दत्ता सामंत के श्रमिक आंदोलन के कारण कपड़ा मिलें दूसरे राज्यों में स्थानांतरित हो गईं।

श्रम को मशीन का सामना करना है तो उसे अपनी उत्पादकता बढ़ानी पड़ेगी

यह चिंता सही है कि यदि श्रम कानूनों का उपयोग वेतन को कृत्रिम रूप से ऊंचा बनाए रखने के लिए किया जाता रहा तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे, लेकिन श्रम कानून के दो पहलू हैं। एक पक्ष श्रमिक की उत्पादकता का है। दूसरा पक्ष वेतन और सुरक्षा का है। यदि श्रम को मशीन का सामना करना है तो उसे अपनी उत्पादकता बढ़ानी पड़ेगी। यह मिल मालिक को तय करना है कि वह चीनी के बोरे सिलने के लिए श्रमिक का उपयोग करेगा अथवा ऑटोमेटिक मशीन का? यदि श्रमिक एक घंटे में 20 बोरे सिलता है तो उद्यमी के लिए श्रमिक का उपयोग करना उचित है, लेकिन यदि वह 10 बोरे सिलता है तो उसके लिए मशीन का उपयोग करना लाभप्रद हो जाता है। यदि हमें उद्योगों को श्रम का उपयोग अधिक करने के लिए प्रेरित करना है तो श्रम की उत्पादकता बढ़ानी पड़ेगी।

उत्पादकता बढ़ाना के लिए उद्यमी मशीन का उपयोग करने को प्रेरित

जो श्रमिक आज 10 बोरे प्रति घंटा सिलाई कर रहा है उसे प्रेरित करना होगा कि वह 20 बोरे प्रति घंटे सिलाई करे। इस दृष्टि से अपने देश में इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट यानी औद्योगिक विवाद कानून खासतौर से नुकसानदेह रहा है। इस कानून के तहत उद्यमी के लिए किसी अकुशल कर्मी से निजात पाना असंभव हो जाता है। एक उद्यमी ने बताया कि ढिलाई बरतने वाले एक कर्मी को काम करने को कहा तो जवाब मिला कि आप हमें निकाल दीजिए, हम लेबर कोर्ट से पुर्नस्थापित हो जाएंगे। ऐसे माहौल में श्रमिक की उत्पादकता घट जाती है और उद्यमी मशीन का उपयोग करने को प्रेरित होता है।

उद्योगों को बंद करने की छूट होनी चाहिए

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रपट के अनुसार देश में एक श्रमिक 6,414 अमेरिकी डॉलर का उत्पादन करता है जबकि चीन में 16,698 डॉलर का। यदि हम श्रम की उत्पादकता बढ़ाते हैं तो उद्यमी के लिए श्रम का उपयोग करना लाभप्रद हो जाएगा। जिन कानूनों से उद्यमी के लिए श्रमिक से काम लेना कठिन हो जाता है उन कानूनों को निरस्त करना चाहिए। इस दिशा में निर्धारित समय के लिए लोगों की नियुक्ति की पहल उचित है। उद्योगों को बंद करने की भी छूट होनी चाहिए ताकि बाजार की स्थिति के अनुसार उद्यमी अपने उत्पादन को परिवर्तित कर सके। चूंकि फैक्ट्री एक्ट या वर्कमैन कंपनसेशन एक्ट का श्रमिक की उत्पादकता से सीधा संबंध नहीं इसलिए ऐसे कानूनों को निरस्त करने की जरूरत नहीं।

सरकार को रोजगार सृजित करने वाली आर्थिक नीतियां लागू करनी चाहिए

सरकार को वैसी आर्थिक नीतियां भी लागू करनी चाहिए जिनसे रोजगार सृजित हो। फिलहाल सभी बड़ी कंपनियों को एनर्जी ऑडिट कराना पड़ता है। उन्हें सत्यापित करना पड़ता है कि उन्होंने उचित मात्रा में ही उर्जा का उपयोग किया है। इसी प्रकार व्यवस्था की जा सकती है कि हर बड़ी कंपनी को एक श्रम ऑडिट कराना पड़े जिससे यह स्थापित हो कि वह अनावश्यक रूप से मशीनों का उपयोग नहीं कर रहा।

मशीनों के स्थान पर श्रमिकों से काम कराए जाएं

दूसरा कदम यह हो सकता है कि जिन मशीनों से श्रम का विस्थापन अधिक होता है और कार्य की गुणवत्ता में विशेष सुधार नहीं होता उन पर भारी टैक्स लगा दिया जाए। यदि सड़क बनाने के लिए एस्कावैटर का प्रयोग न किया जाए और कार्य श्रमिक से कराया जाए तो बड़ी मात्रा में रोजगार सृजित होंगे। सरकारी ठेकों में व्यवस्था की जा सकती है कि मशीनों के स्थान पर श्रमिकों से काम कराए जाएं।

सरकार को चाहिए कि शिक्षा की दिशा इंटरनेट आधारित सूचना की ओर मोड़े

सरकारों को शिक्षा व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। हमारी शिक्षा का मूल चरित्र सरकारी नौकरी पाना है। सरकार को चाहिए कि शिक्षा की दिशा इंटरनेट आधारित सूचना की ओर मोड़े जिससे हमारे युवाओं को अनुवाद, वीडियो बनाने इत्यादि कार्यों में दक्षता हासिल हो और वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी रोजगार हासिल कर सकें।

( लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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