नई दिल्ली [ निर्मल गुप्त ]। वह आदमकद महापुरुष थे। कालांतर में वह कभी दफ्ती से निर्मित कटआउट बने तो कभी पत्थर को तराश कर मूर्तिवत बना दिए गए। बुत निरंतर बनते रहते हैं। उनके चेहरे बदलते रहते हैं। असल समस्या तो उनकी नुकीली नाक के कारण सुर्ख दुम वाली उस चिड़िया को होती रही है जिसने उसके सिर पर धरे हैट के मुहाने पर अपना घरौंदा बनाया। नुकीलेपन के चलते उसकी दुम के पंख कई बार टूटे और बिखरे। उसके बच्चे तो खैर बच्चे ही थे। वे अक्सर खिलंदड़ी करते हुए नाक पर जा बैठते और खुद को चोटिल कर लेते। एक बार तो चिड़िया ने उस मूरत से बाकायदा पूछा-पार्टनर, यह तो बताओ कि तुम्हारी नाक की पॉलिटिक्स क्या है? इसे थोड़ा भोथरा बनवा लिए होते तो तुम्हारा क्या चला जाता। तब जवाब मिला-मेरी नाक मेरी है। तुझे उससे क्या?

मूर्ति की नाक सवालों के घेरे में

चिड़िया को उसकी यह बात बड़ी खटकी। वह उससे बहस में उलझ गई। जब बात तू तू-मैं मैं के आर-पार विमर्श के स्तर तक गई तो मूरत ने कहा-तू बेकार ही बात का बतंगड़ बना रही। मैं व्यक्ति नहीं विचार हूं। विचार बेसिर पैर के होते हैं। यह नाक जो तुझे चुभ रही है वह तो किसी नादान कलाकार की हथोड़ी और छेनी की करतूत है। बहरहाल, प्रतिमा यथावत लगी रही। चिड़िया कुपित भाव से उसके सिर पर बैठी नाक को सवालों के घेरे में लाने की कोशिश करती रही। एक दिन उसने सब्ज रंग वाली चिड़िया से पूछा-बहना बता, इसकी नाक तो मेरे लिए बड़ी मुसीबत है। सब्ज चिड़िया पहले तो चहचहाई। फिर बोली-चल मेरे साथ। मैंने एक ऐसी मूर्ति देखी है जिसके नाक और कान नदारद हैं, बस आकृति है। वह लगभग निराकार है।

निराकार पर कोई अपना घर कैसे बसा सकता है

 -तू मेरी सहेली है या बैरन? सुर्ख रंग वाली चिड़िया बुदबुदाई। उसने कहा-निराकार पर कोई अपना घर कैसे बसा सकता है। तिनके टिकाने का पुख्ता ठिकाना न होगा तो घर तिनका तिनका बिखर न जाएगा।

न मूरत बचेगी और न घोंसला

 

-अरे नहीं ,असल घर तो वही जो स्मृति में बसता है। वैसे तुझे बता दूं, आने वाला समय असमंजस से भरा होगा। तब यह न मूरत बचेगी और न तेरा घोंसला।

मूरत रहे या न रहे पर उसके विचार तो बने रहेंगे

-ओह ,यह तो बड़ी बुरी खबर है। तू मुझे किसी समतल नाक वाले का एड्रेस दे। मैं अपना घर वहां बना लूंगी। या... किसी नकटे का अतापता बता दे। मैंने सुना है कि नकटे कतई हार्मलेस होते हैं। समय बीतता गया। तमाम गहमागहमी के बीच सुर्ख रंग वाली चिड़िया का घर बसा रहा। सब्ज रंग वाली चिड़िया ने उसे वैकल्पिक घर के लिए अनेक सुझाव दिए, पर बात बनी नहीं। फिर उसने किसी को कहते सुना कि यह मूरत रहे या न रहे पर उसके विचार तो बने रहेंगे। उसने बहुत अनुमान लगाया, पर वह तकनीक पता न लगी कि विचार के धरातल पर घर कैसे बसता है? तमाम तरह के अनुमानों और आशंकाओं के साथ वह अपना सुर्ख रंग लिए उड़ती रही। नीचे धरती पर मूरत के इर्द-गिर्द तरह-तरह की दुकानें सजती गईं। शुरू-शुरू में वहां झंडे, बिल्ले और पोस्टर बिके। फिर वहां चाय वाले ने अपनी रेहड़ी सजा ली।

अपना-अपना काम करना चाहिए, एक दूसरे की हांडी में नजर नहीं मारना चाहिए

चिड़िया ऊपर से नीचे देखती तो पता लगता कि चाय के साथ देश-दुनिया के मुद्दों पर लगातार बहस चल रही है। इसके बाद आलू की टिक्की वाला आया। उसके बगल में सींक कबाब वाले ने अपना खोंमचा जमा लिया। कभी-कभी टिक्की वाला कबाब वाले को देख नाक भौं सिकोड़ता तो चाय की दुकान पर जमे बहसवीर हस्तक्षेप करते कि अपना-अपना काम करो। एक दूसरे की हांडी में नजर न मारो।

मूरत पर हथौड़े और घन चलाना ऐतिहासिक भूल है

फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसे देख चिड़िया सहम गई। चाय सुड़कते लोगों ने अपनी प्याली मेज पर धर दी। उन्होंने अपनी आस्तीन ऊपर चढ़ा लीं। थोड़ी देर में जिंदाबाद के नारे दूर से गूंजते सुनाई दिए। मूरत के नजदीकी लोग भी बड़ी जोर से चिल्लाए- मुर्दाबाद-मुर्दाबाद। देखते ही देखते मूरत को भीड़ ने घेर लिया। कुछ के पास लाठियां थीं तो कुछेक हथौड़े लिए थे। घन बरसने लगे तो चिड़िया ने बड़ी उम्मीद के साथ मूरत की ओर देखा। मूरत बिल्कुल बुत बनी दिखी। घबराई चिड़िया ने कातर स्वर में मूरत से कहा-कुछ करते क्यों नहीं। उसने शातिराना जवाब दिया-मुझे अब क्या करना है। अब जो होगा वह ऐतिहासिक भूल होगी। तू अपनी खैर मना और अपने बाल बच्चों के साथ यहां से उड़ जा।

भंजित मूर्ति की जगह कोई अन्य मूर्ति स्थापित होने से क्या नाक का आकार बदलेगा

चिड़िया उड़ी तो उड़ती चली गई। अंतत: उसने एक मॉडर्न आर्ट संग्रहालय के परिसर में खड़ी बेसिरपैर वाली कलाकृति में अपना घर नए सिरे से बसा लिया और चैन की सांस ली। अब सुनने में आ रहा है कि वहां भंजित मूर्ति की जगह कोई अन्य मूर्ति स्थापित होने वाली है। वह जानना चाहती है कि इस नई मूरत की नाक का आकार दरअसल क्या होगा?

[ हास्य-व्यंग्य ]

Posted By: Bhupendra Singh