ब्रिटेन में हुए जनमत-संग्रह को लेकर देश में भी काफी चर्चाएं हुईं। लोगों की दिलचस्पी यह जानने में है कि क्या भारत में भी जनमत-संग्रह हो सकता है? क्या संविधान इसकी आज्ञा देता है? दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने पर क्या दिल्ली में जनमत-संग्रह कराया जा सकता है? क्या कॉमनवेल्थ और सार्क में भारत के बने रहने पर देश में जनमत-संग्रह हो सकता है? आदि। देश में जनमत-संग्रह की स्मृतियां अच्छी नहीं। यह देश के बंटवारे और जम्मू-कश्मीर पर जनमत-संग्रह के मुद्दे से जुड़ा हुआ है। बंटवारे के बाद जिस तरह पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करने की कोशिश की उससे वहां के शासक महाराजा हरी सिंह ने भारत से सैन्य सहायता मांगी। 26 अक्टूबर 1947 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को भेजे टेलीग्राम में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने स्पष्ट किया था कि कश्मीर को सहायता देना एक मित्र व पड़ोसी देश के रूप में भारत का कर्तव्य था, लेकिन जम्मू-कश्मीर के लोगों की इच्छा के अनुरूप ही उस राज्य का भारत या पाकिस्तान में विलय होगा। नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भी इसी आशय का पत्र लिखा। ऐसा ही आश्वासन उन्होंने 31 दिसंबर 1947 के अपने पत्र में संयुक्त राष्ट्र को भी दिया था।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा 21 अप्रैल 1948 को इस संबंध में प्रस्ताव संख्या 47 पारित किया गया। उसके तीन हिस्से थे। प्रथम, जम्मू-कश्मीर में शांति-व्यवस्था की बहाली। इसके अंतर्गत सबसे पहला कदम पकिस्तान को उठाना था। उसे अपने कबीले और नागरिकों को वापस बुलाना था और बिना भेदभाव के सभी मूल-नागरिकों को स्वतंत्र रूप से जनमत-संग्रह में भाग लेने के लिए वातावरण तैयार करना था, जो उसने नहीं किया। जब पकिस्तान अपने इस दायित्व को पूरा कर ले तब भारत को अपनी सेनाएं लौटाने की योजना बनानी थीं। द्वितीय, जब प्रथम खंड में उल्लिखित स्थिति उत्पन्न हो जाए तब भारत को जम्मू-कश्मीर सरकार को प्रेरित करना था कि सभी राजनीतिक समूहों को जनमत-संग्रह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाए। और अंतिम भाग में सुरक्षा परिषद द्वारा पूरे प्रकरण के पर्यवेक्षण की अपेक्षा की गई थी। ज्यादातर लोगों को सुरक्षा परिषद द्वारा जम्मू-कश्मीर में जनमत-संग्रह के प्रस्ताव के इस क्रम का पता ही नहीं। अत: वे प्राय: इसका जवाब नहीं दे पाते कि क्यों भारत अपने वायदे से पीछे हटा, क्यों उसने वहां जनमत-संग्रह स्वीकार नहीं किया। उस प्रस्ताव की प्रारंभिक शर्तों को पाकिस्तान कभी पूरा न कर सका। बहरहाल, देश में इस परिप्रेक्ष्य में जनमत-संग्रह के प्रति एक पूर्वाग्रह जरूर है।

लेकिन जनमत-संग्रह तो लोकतंत्र के प्रारंभिक स्वरूप का अवशेष है। जब थोड़े से लोग थे तब जनता एक जगह एकत्रित हो कानून बनाती, उनको लागू करने वालों का चयन करती और कानून का उल्लंघन करने वालों को दंडित करने के लिए न्यायाधीशों को नियुक्त करती थी। इसे ही प्रत्यक्ष लोकतंत्र की संज्ञा दी गई। जनसंख्या बढऩे के साथ-साथ ऐसा करना संभव न रहा और तब प्रतिनिध्यात्मक लोकतंत्र की स्थापना हुई जिसमें जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती जो जनादेश के आधार पर कानून बनाते, कानूनों को लागू करते और न्यायाधीशों की नियुक्ति करते। यही लोकतंत्र का वर्तमान स्वरूप है। केवल स्विट्जरलैंड ऐसा देश है जिसमें अभी भी जनमत-संग्रह के रूप में प्रत्यक्ष लोकतंत्र के अवशेष मिलते हैं अर्थात यदि संविधान का संशोधन करना हो तो उसके लिए जनमत-संग्रह अनिवार्य है। वैसे तो भारतीय संविधान में जनमत-संग्रह का कोई प्रावधान नहीं, लेकिन इसका यह आशय नहीं कि सरकार किसी संवेदनशील मुद्दे पर जनता की राय न ले सके। ब्रिटेन इसका ज्वलंत उदाहरण है। ब्रिटिश संविधान में भी जनमत-संग्रह का कोई प्रावधान नहीं, लेकिन हेरॉल्ड विल्सन सरकार ने 1975 में ब्रिटेन में पहला जनमत-संग्रह इस बात पर करवाया कि ब्रिटेन को यूरोपियन इकोनॉमिक कम्युनिटी में रहना है या नहीं। उसके लिए उनको पहले संसद से रेफरेंडम एक्ट, 1975 पारित करवाना पड़ा। अभी यूरोपीय संघ जनमत-संग्रह के लिए भी डेविड कैमरन की सरकार को पिछले वर्ष संसद से यूरोपियन यूनियन रेफरेंडम एक्ट 2015 पारित करवाना पड़ा। चूंकि ब्रिटिश संविधान में जनमत-संग्रह का कोई प्रावधान नहीं इसलिए ऐसे जनमत-संग्रह का परिणाम केवल जनता का मूड जानने का एक साधन है, वह सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं। प्रधानमंत्री कैमरन यदि चाहें तो जनमत-संग्रह के परिणाम की उपेक्षा कर संसद में पुन: इस पर निर्णय के लिए जा सकते हैं।

लोकतंत्र में जनमत-संग्रह का बड़ा वजन होता है और उसके विरुद्ध जाने का साहस प्राय: किसी में नहीं होता। इसका रुचिकर उदाहरण 1789 में बना अमेरिका का संविधान है। अमेरिका 1774 में स्वतंत्र हुआ और पहला संविधान 1781 में बना। यह एक कमजोर संविधान था। उसमें संशोधन द्वारा एक मजबूत संघीय सरकार लाने के लिए 1787 में फिलाडेलफिया में तत्कालीन सभी 13 राज्यों का सम्मेलन बुलाया गया। संशोधन की प्रक्रिया के अनुसार संशोधनों को सभी 13 राज्यों की व्यवस्थापिकाओं से पास होना जरूरी था। लेकिन जॉर्ज वाशिंगटन की अध्यक्षता में एकदम नया संविधान बना दिया गया और अनुच्छेद 7 में यह व्यवस्था कर दी गई कि केवल नौ राज्यों में जनता द्वारा पारित होने पर ही संविधान लागू हो जाएगा। इस प्रकार अमेरिकी संविधान बनाने वालों को न तो नया संविधान बनाने, न ही सभी 13 राज्यों की सहमति के बिना लागू करने का कोई अधिकार था, फिर भी केवल जनता की स्वीकृति के कारण अमेरिकी संविधान लागू हो गया। भारतीय परिप्रेक्ष्य में संघ, राज्य या स्थानीय सरकारों को किसी विषय पर जनमत-संग्रह कराने की बाध्यता तो नहीं, लेकिन यदि कोई सरकार किसी विषय पर दलगत दृष्टिकोण से अलग हटकर जनता की राय जानना चाहे तो उसकी कोई मनाही भी नहीं।

[लेखक डॉ. एके वर्मा, सेंटर फॉर द स्टडी आफ सोसाइटी एंड पोलिटिक्स के निदेशक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस