नई दिल्ली [ मार्कण्डेय राय] विश्व स्तर पर ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में अधिक लोग रहते हैं। 2007 में पहली बार इतिहास में वैश्विक शहरी आबादी वैश्विक ग्रामीण जनसंख्या से अधिक हुई और दुनिया की जनसंख्या इसके बाद मुख्य रूप से शहरी बनी हुई है। 21वीं शताब्दी के शहरी इलाकों का प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण विकास चुनौतियों में से एक बन गया है। निरंतर शहरों के निर्माण में हमारी सफलता या विफलता 2015 के बाद के संयुक्त राष्ट्र विकास एजेंडे की सफलता में एक प्रमुख कारक होगी।

विश्व की 54 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है

इस शताब्दी में चार मेगा ट्रेंड उभरे हैं, शहरीकरण उनमें से एक है। आज विश्व की 54 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है जो 2050 तक बढ़कर 66 प्रतिशत हो जाने की संभावना है। हालांकि 2030 तक इसके 60 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। दूसरे शब्दों में कहें तो 2050 तक शहरी क्षेत्रों में रहने के लिए अतिरिक्त 2.5 अरब लोगों की भविष्यवाणी की गई है। शीर्ष 600 शहरी केंद्रों की वैश्विक जीडीपी में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है। करीब एक अरब लोग मलिन बस्तियों में रहते हैं जो कि हमारी वैश्विक आबादी का 14 प्रतिशत है। साल 2018 निरंतर विकास ‘लक्ष्य 11’ का वर्ष है! लक्ष्य 11 ‘शहरों और मानव बस्तियों को समावेशी, सुरक्षित, लचीला और टिकाऊ’ बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। वहीं संयुक्त राष्ट्र की नई शहरी कार्यसूची हमारे शहरों की योजना, निर्माण, प्रबंधन और शासन के तरीके को और बेहतर बनाने के लिए एक कार्यान्वयन ढांचा है।

दुनिया में सबसे अधिक शहरी क्षेत्र उत्तरी अमेरिका में है

वर्तमान में दुनिया में सबसे अधिक शहरी क्षेत्र उत्तरी अमेरिका में है, जहां जनसंख्या का 82 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में रहता है। इसके बाद लैटिन अमेरिका और यूरोप का स्थान आता है जहां क्रमश: 80 प्रतिशत और 73 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है। अफ्रीकी आबादी का कम से कम 40 प्रतिशत हिस्सा और एशिया में 48 प्रतिशत लोग शहरी इलाकों में रहते हैं जो 2050 में बढ़कर क्रमश: 56 और 64 प्रतिशत रहने का अनुमान है। माना जा रहा है कि भारत में ही 2050 तक 50 प्रतिशत जनसंख्या शहरी हो जाएगी। अभी दिल्ली सहित देश के सात शहरों की जनसंख्या 50 लाख से अधिक है।

दिल्ली दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर है

दिल्ली वर्तमान में दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर है। 2030 तक इसकी आबादी 3.6 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। 3.8 करोड़ की आबादी के साथ टोक्यो दुनिया का सबसे बड़ा शहर है। 2030 तक इसकी आबादी 3.7 करोड़ के साथ शीर्ष पर रहेगी। वहीं शांघाई की जनसंख्या 2.3 करोड़, मैक्सिको सिटी, मुंबई तथा साओ पाओलो की आबादी 2.1 करोड़ और ओसाका की जनसंख्या 2 करोड़ हो जाएगी। हमारे भारत में ही अभी 465 से अधिक शहर एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले हैं। लगभग 165 शहरों में 3 लाख से अधिक आबादी है, जिसमें से 53 शहर 10 लाख से अधिक आबादी वाले हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु ने विश्व के 30 बड़े महानगरों में अपना स्थान बना भी लिया है।

शहरी विकास के लाभ के लिए सरकारों को नीतियां बनानी और लागू करनी होंगी
बहरहाल इस शहरी विकास के लाभ सभी में समान रूप से और स्थाई रूप से साझा किए जा सकें, इसके लिए सरकारों को नीतियां बनानी और लागू करनी होंगी। देखा जाए तो शहरी विकास के संबंध में वर्तमान और भविष्य की जरूरतों का आकलन करना बहुत ही जरूरी होता है। सशक्त शहरी विकास निरंतर विकास लक्ष्यों की उपलब्धि में और तेजी ही लाएगा। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र आवास संयुक्त राष्ट्र संघ की एक इकाई है जो स्थाई शहरीकरण और मानव बस्तियों पर केंद्रित है। अभी संयुक्त राष्ट्र आवास 60 से अधिक देशों में काम कर रहा है ताकि रचनात्मक शहरी नियोजन को वित्त और कानून के माध्यम से बढ़ावा दिया जा सके। संयुक्त राष्ट्र आवास नई शहरी कार्यसूची और लक्ष्य 11 को लागू करने के लिए नेतृत्व और मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसी कड़ी में 25 जून, 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘100 स्मार्ट सिटीज मिशन’ की शुरुआत की थी। देश के 100 स्मार्ट शहरों के विकास और 500 अन्य शहरों के पुनरुत्थान के लिए 98,000 करोड़ रुपये को मंजूरी दी गई है। इसमें 48,000 करोड़ रुपये स्मार्ट सिटीज मिशन तथा कायाकल्प और 50,000 करोड़ रुपये का प्रावधान अमरुत योजना के तहत शहरी परिवर्तन के लिए किया गया है।

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र वर्तमान और नई पीढ़ी के रहने के लिए उपयुक्त नहीं है

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र वर्तमान और नई पीढ़ी के रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। अभी दिल्ली में हवा की गुणवत्ता बहुत खराब है। नए साल की शुरुआत से ही पीएम 2.5 खतरे की सीमा के ऊपर है। आज भी पीएम 2.5 का स्तर करीब 400 के आसपास बना हुआ है, जो जनजीवन को अस्त-व्यस्त किए हुए है। डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने सुबह में चलने और व्यायाम बंद करने की सलाह दी है। ऐसी स्थिति में भारत में शहरों के सतत विकास के लिए हमें ग्रामीण क्षेत्र के समुचित विकास की तरफ विशेष ध्यान देना चाहिए। ‘पुरा’ (प्रोवाइडिंग अर्बन एमेनेटिज टू रूरल एरिया) अर्थात ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं का प्रावधान के सिद्धांत का कार्यान्वयन करना बहुत जरूरी है जो हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने दिया था।

‘पुरा’ का उद्देश्य शहरी सुविधाओं को ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यान्वित करना है
‘पुरा’ का उद्देश्य ग्राम पंचायतों और निजी क्षेत्र की भागीदारी से शहरी सुविधाओं को ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यान्वित करना है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए सार्वजनिक और निजी दोनों ही क्षेत्र के लोगों के अनुभव और विशेषज्ञता का लाभ लेने की बात कही गई है। इसके लिए फंडिंग की व्यवस्था केंद्रीय योजनाओं से की जा सकती है। इसके अलावा ‘पुरा’ का प्रस्ताव है कि शहरों के बाहर आर्थिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण केंद्रों में शहरी बुनियादी सुविधाएं और सेवाएं प्रदान की जाएंगी। व्यावसायिक और तकनीकी संगठनों की स्थापना की जाएगी ताकि सड़कों और इलेक्ट्रॉनिक संचार के जरिये भौतिक कनेक्टिविटी और ज्ञान कनेक्टिविटी साकार हो सके और फिर आर्थिक कनेक्टिविटी का लक्ष्य हासिल किया जा सके। साल 2004 के बाद से ही भारत सरकार कई राज्यों में पायलट ‘पुरा’ कार्यक्रम चला रही है। इस दौरान सामने आई खामियों को दूर कर इसे राष्ट्रीय स्तर लागू करने का अब समय आ गया है। दरअसल सामाजिक समावेश कार्यक्रम का उद्देश्य देश के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी, सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और दूरसंचार सेवाओं जैसी सुविधाएं प्रदान करना है। इसमें कोई दो राय नहीं कि जब ये उद्देश्य पूरे हो जाएंगे तभी देश के सभी गांव सही मायने में विकास प्रक्रिया का हिस्सा बन पाएंगे।


[ लेखक संयुक्त राष्ट्र आवास के वरिष्ठ सलाहकार एवं ग्लोबल पीस एंड डेवलपमेंट सर्विस एलायंस के अध्यक्ष हैं ] 

Posted By: Bhupendra Singh

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