[ प्रदीप सिंह ]: वीआइपी सिंड्रोम वैसे तो सामंतवादी सोच की देन है, लेकिन प्रजातंत्र में भी सामंतवादियों की एक नई जमात पैदा हो गई है। इसमें सिर्फ सत्ताधारी नहीं आते। इस जमात में बुद्धिजीवी, रसूख वाले और पैसे वाले भी शामिल हैं। खुदा न खास्ता यदि आप लेफ्ट लिबरल की श्रेणी में आते हैं तो फिर क्या कहना। यह कहना सच के साथ अन्याय होगा कि कानून की नजर में सब बराबर हैं। कम से कम अपने देश में तो ऐसा ही है। कुछ लोग हैैं जिनके लिए कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों की परिभाषा बदल जाती है। वे मानकर चलते हैं कि कानून की जो परिभाषा आम लोगों पर लागू होती है वह उनके लिए नहीं बनी। वैसे तो गाहे-बगाहे ऐसी घटनाएं होती रहती हैं जो हमें आम और खास के इस अंतर का अहसास कराती रहती हैं परंतु हाल में दो ऐसी घटनाएं हुईं जिससे यह मुद्दा फिर से अपनी कुरुपताओं के साथ जनमानस के सामने प्रस्तुत है।

बीती 30 अगस्त को मद्रास हाईकोर्ट की दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि देश के सभी टोल प्लाजा पर वीआईपी लोगों के लिए अलग लेन हो। इस सूची में देश के सभी कार्यरत न्यायाधीश भी शामिल होंगे। माननीय न्यायाधीशों को टोल प्लाजा पर न तो कतार में खड़ा होना पड़े और न ही उन्हें अपना पहचान पत्र दिखाना पड़े, क्योंकि ऐसा करना अपमानजनक लगता है।

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को निर्देश है कि वह ऐसी व्यवस्था के लिए फौरन सभी टोल प्लाजा चलाने वाली कंपनियों को इस आशय का एक सर्कुलर जारी करे और अदालत को सूचित करे। इस निर्देश की अवहेलना के गंभीर परिणाम होंगे। जाहिर है, ऐसा नहीं हुआ तो इसे अदालत की अवमानना माना जाएगा। मद्रास हाईकोर्ट की यह खंडपीठ दो हफ्ते बाद इस मामले की फिर सुनवाई करेगी। इसलिए प्राधिकरण के पास इतना ही समय है।

यह वही न्यायपालिका है जो नेताओं की वीआइपी संस्कृति पर प्रतिकूल टिप्पणियां और फैसले देती है।

सत्ता कोई भी हो ( सरकार में होना ही जरूरी नहीं ) उसके मिलते ही व्यक्ति को लगता है वह दूसरों से अलग है। वह जमाना अब नहीं रहा जब पद पाकर व्यक्ति झुकता था। अब पद पाकर तनना अपवाद नहीं नियम बन गया है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसे वीआइपी या महत्वपूर्ण बनने की चाहत न हो, परंतु इंसानों की एक ऐसी भी जमात है जिसे लगता है कि वीआइपी न हुए तो जीवन अकारथ। अपने देश में वीआइपी होना ऐसी नियामत है जिसके लिए अदालतों के दरवाजे आधी रात को भी खुल जाते हैं।

न्याय पाने या कहें कि कानून से बचने के लिए उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं करना पड़ता जो एक आम आदमी को करना पड़ता है। ऐसे लोगों के सामने कानून बौना नजर आता है और अगर ऐसा न हो तो उसे होना पड़ता है। सामान्य प्रक्रिया और कानून के अनुसार आचरण की अपेक्षा उनकी शान में गुस्ताखी है। इसी मानसिकता के लोगों ने पांच कथित शहरी नक्सलियों की गिरफ्तारी के बाद जो किया उससे करोड़ों लोगों को एक बार फिर हैरान किया है। ऐसी घटनाएं हर बार आम आदमी के सामने प्रत्याशित अचरज की तरह प्रस्तुत होती हैं। उसे पता होता है कि कानून और अदालत के दरवाजे उनके लिए हमेशा खुले होते हैं। फिर भी हर बार उसे अचरज होता है कि ऐसा भी हो सकता है। यहां हम उस मामले के गुण-दोष पर चर्चा नहीं कर रहे।

यह सही है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार है। यह अधिकार भारत के संविधान ने हर भारतीय नागरिक को दिया है। इस अधिकार का किसी दशा में हनन न हो, यह देखना अदालत का काम है। देश की न्यायिक व्यवस्था में कोई आपराधिक मामला पहले मजिस्ट्रेट की अदालत में जाता है। वहां से सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है। इन पांच विशिष्टजनों के लिए व्यवस्था उलट दी गई। महाराष्ट्र पुलिस ने इन्हें भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार किया था। इससे पहले कि पुलिस को ट्रांजिट रिमांड मिलता, मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया। वह भी सीधे संविधान पीठ के सामने। हम सबने देखा है कि कोई मामला संविधान पीठ को सौंपा जाए या नहींं, इसी पर देश की सर्वोच्च अदालत में लंबे समय तक बहस होती है, परंतु यह सब सामान्य लोगों के लिए है।

व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए सबके साथ ऐसा हो तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। संविधान कहता है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं। क्या ऐसा ही अवसर देश में रोज गिरफ्तार होने वाले हजारों लोगों को मिलता है? यदि नहीं तो फिर इन्हें क्यों? निचली अदालत ने तो मामले की सुनवाई भी नहीं की। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह इन महानुभावों के मौलिक अधिकार की रक्षा करने में नाकाम रही है। इसलिए देश की सर्वोच्च अदालत को दखल देना पड़ा। ऐसे वाकये देखकर देश के आम लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या न्याय अमीरों और रसूख वालों के लिए ही है, क्योंकि इन पांच लोगों का केस लड़ने के लिए देश के नामी वकील लाइन लगाकर खड़े हो गए। जिनकी एक दिन की फीस लाखों में है। हो सकता है कि ये वकील उनका केस मुफ्त में लड़ रहे हों। तो जिसके पास पैसा है उसे पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती। पैसे वालों की दुनिया का यह चलन हो सकता है।

देश की जेलों में लाखों ऐसे लोग हैं जिनके मुकदमे की सुनवाई बरसों से शुरू ही नहीं हुई। ऐसे भी हैं जो जिस अपराध के आरोप में बंद हैं उसमें मिलने वाली अधिकतम सजा से ज्यादा समय से जेल में हैैं। ऐसे भी हैं जिन्हें अदालत से जमानत तो मिल गई, लेकिन जमानत राशि न दे पाने के कारण जेल में ही रहने को अभिशप्त हैैं। देश में एक और वर्ग है जिसे समझ में नहीं आता कि राम जन्मभूमि जैसा लोगों की भावना से जुड़ा मुद्दा सालों साल क्यों अदालत में लटका हुआ है? इस मसले पर 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया था।

आम लोगों को तो यह भी समझ में नहीं आता कि संजय दत्त, सलमान खान और संजीव नंदा के लिए कौन सा कानून और कौन सा संविधान बना है। कैसे ओमप्रकाश चौटाला और लालू यादव जैसे लोगों को बीमारी के नाम पर महीनों जेल से बाहर रहने और राजनीतिक गतिविधि (चौटाला के मामले में) चलाने की छूट मिल जाती है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वीआर कृष्णअय्यर ने 1976 में एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में कहा था कि ‘कानून भौंकता सब पर है, लेकिन काटता केवल गरीबों, बेबसों, अनपढ़ों और अनभिज्ञ लोगों को है।’

[ लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैैं ]

Posted By: Bhupendra Singh