डॉ. एके वर्मा

चंडीगढ़, गुजरात, ओडिशा, महाराष्ट्र, आदि जगहों पर स्थानीय निकायों के चुनावों में मिली अप्रत्याशित सफलता से भाजपा के हौसले बुलंद हैं, लेकिन जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश के चुनाव आगे बढ़ रहे हैं उसके समेत अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं केदिलों की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं। उत्तर प्रदेश के चुनावों में नई-नई प्रवृत्तियों का उभार देखा जा रहा है। यह अनुमान लगाना कठिन हो रहा है कि ऊंट किस करवट बैठेगा। चुनाव के प्रथम चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा के उभार और जाटों की रालोद में वापसी के संकेत मिले थे। ये ऐसी प्रवृत्तियां थीं जिसने सपा-कांग्रेस गठबंधन और भाजपा, दोनों को नुक्सान पहुंचाने का काम किया होगा। मायावती ने जब दलित-मुस्लिम सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत की थी तब ऐसा नहीं लग रहा था कि मुस्लिम सपा को छोड़ कर बसपा की ओर रुख करेंगे, लेकिन पसमांदा मुस्लिमों का एक वर्ग धीरे-धीरे उनकी ओर आकृष्ट होता गया। यद्यपि सपा-कांग्रेस गठबंधन से मुस्लिम मतों का बंटवारा कुछ रुका, लेकिन मुस्लिम धर्मगुरुओं की अपील और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ओल्ड बॉयज एसोसिएशन की सक्रियता से काफी मुस्लिम मायावती की ओर खिसक गए। यह प्रवृत्ति पूरे प्रदेश में देखी जा रही है। जाटों का एक बड़ा वर्ग मुज्जफ्फरनगर दंगों के बाद रालोद के नेता अजित सिंह से नाराज होकर भाजपा की तरफ चला गया था, लेकिन आरक्षण पर जाट-आंदोलन की वजह से और जाट-मुस्लिम सुलह से एक बड़ा वर्ग फिर से उसकी ओर लौट आया। माना जाता है कि जिन विधानसभाओं में रालोद ने चुनाव नहीं लड़ा और जहां रालोद प्रत्याशी कमजोर था वहां को छोड़कर अधिकतर जाटों ने रालोद के पक्ष में मतदान किया और इससे भाजपा को नुकसान पहुंचा।
दूसरे चरण में रूहेलखंड में मुस्लिम फैक्टर प्रमुख था। प्रदेश में 19 फीसद मुस्लिम जनसंख्या के मुकाबले इस क्षेत्र के 11 जिलों की 67 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम जनसंख्या औसतन 34 फीसद है। शायद इसीलिए इस क्षेत्र में बसपा ने अनारक्षित सीटों का 53 फीसद और सपा-कांग्रेस ने 58 फीसद मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। रालोद ने भी 15 मुस्लिम प्रत्याशी खड़े किए। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी मजलिस-इ-इत्तिहादुल-मुसलमीन ने 11 और डॉ अयूब की पीस-पार्टी ने 10 मुस्लिम प्रत्याशी खड़े किए। पिछले चुनावों में पीस-पार्टी चार और मिल्लत-कौंसिल भोजीपुरा (बरेली) की सीट जीत चुकी है इसलिए इन्हें मात्र वोट-कटवा पार्टी नहीं कहा जा सकता। इससे रूहेलखंड में एक ओर मुस्लिम मतों के लिए मारामारी दिख रही थी जिससे मुस्लिम मतों का बंटवारा निश्चित था, वहीं दूसरी ओर यह सांप्रदायिक धु्रवीकरण को भी जन्म दे रही थी जो भाजपा के लिए अनुकूल थी। तीसरे चरण में लड़ाई ‘यादव-लैंड’ में थी जिसमें सपा और मुलायम के गढ़ मैनपुरी, इटावा, कन्नौज, औरैया, सीतापुर, हरदोई और कानपुर देहात समेत 12 जिलों के 69 विधानसभा क्षेत्र थे। यह इलाका सपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसमें लगभग 80 फीसद सीटें उसके पास थीं, लेकिन शिवपाल यादव बनाम अखिलेश यादव की कलह ने यहां खूब रंग दिखाया। शिवपाल जसवंतनगर से सपा प्रत्याशी हैं। जानकारों का मानना है कि रालोद के जो 40 प्रत्याशी इस क्षेत्र से लड़े उनमें अधिकतर शिवपाल प्रायोजित थे और उन्होंने सपा के यादव वोट काटे। इसके अलावा अति-पिछड़ी जातियों को भी भाजपा के रूप में एक वैकल्पिक मंच मिल गया, क्योंकि भाजपा ने उनको बड़ी संख्या में टिकट दिया और उनके नेताओं केशव प्रसाद मौर्य, स्वामी प्रसाद मौर्य और अनुप्रिया पटेल को शीर्ष नेतृत्व में स्थान मिला। सपा के जनाधार यादव-मुस्लिम से कुछ मुस्लिमों को मायावती ने आकृष्ट किया। इस चरण में केवल सपा के पास ही खोने को था, क्योंकि बसपा के पास केवल छह और भाजपा के पास पांच सीटें थीं। सपा मात्र 29 फीसद मतों पर बनी सरकार थी और यदि इससे थोड़ा भी यादव और मुस्लिम वोटर खिसक गया तो सपा की सत्ता में वापसी पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा।
चौथा चरण उस क्षेत्र में था जिसे हम पूर्वांचल के प्रवेश द्वार के रूप में जानते हैं अर्थात इलाहबाद, कौशांबी, फतेहपुर, रायबरेली आदि। इसके साथ इसी चरण में दक्षिण के प्रवेश द्वार बुंदेलखंड (झांसी, जालौन, महोबा, बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, जालौन, ललितपुर) में कुल 12 जिलों की 53 विधानसभा सीटों पर चुनाव थे। इस क्षेत्र में मुस्लिम जनसंख्या का औसत केवल 9.54 फीसद है। यह क्षेत्र कुछ समय से सपा-बसपा का गढ़ रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में बुंदेलखंड में सपा और बसपा दोनों को 26-26 फीसद वोट मिले थे, लेकिन बसपा को केवल 15 और सपा को 26 सीटें मिली थीं। लोकसभा चुनाव में मोदी-लहर का ऐसा असर पड़ा कि न केवल लोकसभा की चारों सीटें भाजपा की झोली में चली गईं, वरन उसे अप्रत्याशित रूप से 45 फीसद मत भी मिले। इस बार भी बुंदेलखंड में भाजपा हर जगह टक्कर में दिखी। इस चरण की एक विशेषता यह भी रही कि समाज के अति-पिछड़े वर्ग का मोदी के प्रति झुकाव साफ दिखाई दिया। पिछले चुनावों में अन्य वर्गों के साथ इस वर्ग ने भी विकास के आर्थिक कारक को आधार बना कर मोदी को वोट दिया था, लेकिन इस बार यह जुड़ाव सामाजिक कारक अर्थात जाति से भी जुड़ गया, क्योंकि बहुत से अति-पिछड़ों को लगता है कि मोदी उनकी जाति के हैं। कहना न होगा कि यह वर्ग प्रदेश में बहुसंख्यक है और यदि यह झुकाव मतों में बदल गया तो भाजपा की मुराद पूरी हो सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में जो भारी भीड़ जुट रही है वह भी एक संकेतक है। इधर उन्होंने रैलियों में अपने सरकार के कामों की मार्केटिंग बहुत अच्छे से की है। वह अपने मतदाताओं से भी ‘कनेक्ट’ हो जाते हैं। छोटे और सीमांत किसानों के कर्ज को पहली कैबिनेट की बैठक में माफ कराने, किसानों की उपज को सरकारी समर्थन मूल्य पर खरीदने और फसल बीमा को गंभीरता से लागू कराने की गारंटी देकर उन्होंने किसानों का दिल जीतने का प्रयास किया है, लेकिन सत्ता की कुंजी शायद इस बार पूर्वांचल के मतदाताओं के हाथ में है।
सपा-बसपा के पिछले 15 वर्षों के शासन के बावजूद अभी भी यहां का मतदाता विकास के लिए तरस रहा है। उसे और क्षेत्रों के लोगों की तरह ही विकास की दरकार है। पूर्वांचल में 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को लगभग 40 फीसद वोट मिले थे। अभी भी लोगों की विकास की प्यास जस-की-तस है। वे क्या निर्णय लेते हैं यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन यहां सपा के प्रति लोगों की निष्ठा बरकरार है। यद्यपि मुलायम के प्रचार में न निकलने से उन पर कुठाराघात जरूर हुआ है। ऐसा लगता है कि अखिलेश की सपा का कुछ नुकसान राहुल को साथ लेने से हो सकता है। राहुल जब भी बोलते हैं, कांग्रेस-सपा गठबंधन प्रत्याशियों के कुछ वोट कट जाते हैं। देश का औसत मतदाता शालीनता और सकारात्मकता पसंद करता है और उसकी लक्ष्मणरेखा लांघने से नुकसान ही होता है। इधर अखिलेश ने भी प्रधानमंत्री के प्रति अपनी भाषा और अभिव्यक्ति में संतुलन खोया है। यह उनकी छवि के लिए ठीक नहीं। पूर्वांचल के लोग बहुत भावुक हैं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अभूतपूर्व योगदान दिया, लेकिन बदले में उन्हें केवल उपेक्षा मिली। अंतिम दो चरणों के चुनाव प्रचार की रणनीति को इस परिप्रेक्ष्य में निर्मित करने अर्थात विकास की चाहत को पूरा करने का भरोसा दिलाने में जो सफल होगा, सेहरा उसी के सर बंधेगा।
[ लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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