नीरजा चौधरी। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव नतीजों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भाजपा अब अपराजेय नहीं रही। करीब हर बड़े प्रदेश में भाजपा की सरकार होने से भारत का नक्शा एक तरह से भगवा रंगत ले चुका था, जिससे लड़ाई एकतरफा हो गई थी। अचानक राजनीतिक रूप से पूरी तस्वीर बदल गई और संभावनाओं का नया पिटारा खुला। बिहार, पंजाब, पुडुचेरी और कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर बाकी राज्यों से विपक्ष का सफाया कर चुकी मोदी-अमित शाह की जोड़ी का विजयी रथ थम गया है। ऐसे में 2019 में होने वाले आम चुनाव पर 2018 विधानसभा चुनावों का अक्स कई तरीके से देखा जा सकता है। 

पहला, इन चुनावों ने कांग्रेस को भाजपा के किसी भी विकल्प का केंद्र बिंदु बना दिया है। अब कई क्षेत्रीय पार्टियों के नेता (जैसे टीआरएस के के चंद्रशेखर राव जिन्होंने तेलंगाना ने फिर शानदार वापसी की है ऐसे संघीय मोर्चे को बनाने पर जोर देने लगे हैं जो गैर भाजपा और गैर कांग्रेस होगा। हालांकि इस मोर्चे में कांग्रेस की भूमिका को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया शामिल है। वहीं चंद्रबाबू नायडू और शरद पवार जैसे नेता का स्पष्ट कहना है कि कांग्रेस के बिना भाजपा का कोई विकल्प नहीं हो सकता है।

तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस आत्मविश्वास से लबरेज है। जो जीता वही सिंकदर बनकर निकली कांग्रेस विपक्षी एकता की धुरी साबित हो सकती है। हिंदी पट्टी से परिवर्तन की बयार चलाने वाली इस पार्टी के करिश्मे को वे क्षेत्रीय दल भी महसूस करने लगे हैं जो नरेंद्र मोदी का विरोध करते रहे हैं। हालांकि यह इसके लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू साबित हो सकता है। अगर कांग्रेस आने वाले लोकसभा चुनावों में भाजपा को रोकने की कारगर हथियार बनती दिखती है तो वह क्षेत्रीय दलों की चिंताओं को भी बढ़ाती है जिनके जनाधार में सेंध लगाकर वह खुद को मजबूत करेगी।

हालांकि यह बहुत कुछ क्षेत्रीय दलों के प्रति कांग्रेस की संवेदनशीलता और लचीलेपन पर निर्भर करेगा जिसके तहत वह उन्हें यह सुनिश्चित करा सकने में सक्षम होगी कि वह बड़े भाई की तरह का व्यवहार नहीं करेगी। इसकी जगह कांग्रेस को दिखाना होगा कि वह सबको साथ लेकर भाजपा को हराने के लक्ष्य से आगे बढ़ रही है। बहरहाल, हाल ही में दिल्ली में विपक्षी नेताओं की बैठक में राजद के तेजस्वी यादव की इस आशय की एक आशंका पर राहुल अपनी पार्टी के रुख को लचीला बता चुके हैं। दूसरा बात भी अहम है। तीन राज्यों में जीत ने राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के मुकाबले मजबूत विपक्षी नेता के रूप में स्थापित किया है।

विपक्ष में कोई नेता अभी इस स्थिति में नहीं है। वहीं भाजपा में कुछ लोगों को लगता है कि उनकी पार्टी के लिए यह फायदेमंद होगा और मोदी बनाम राहुल की लड़ाई में मोदी बहुत आगे निकल जाएंगे। लेकिन अब राजनीतिक परिदृश्य धीरे-धीरे बदल रहा है। इन चुनावों से पता चला है कि पहले जिस तरीके से राहुल को लोग खारिज करते थे, अब उनकी धारणा बदली है। लोग अब उन्हें नए चश्मे से देख रहे हैं और कह रहे हैं कि वे हर चीज अलग तरीके से करते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि हिंदू राहुल गांधी के मंदिर जाने और हिंदू होने का प्रमाण-पत्र देने के विरोध में नहीं हैं। यही वजह है जिसने राहुल गांधी के अभियान को तेज धार दी। उन्होंने नब्ज पकड़ी और किसानों की समस्या, बेरोजगारी, जीएसटी, नोटबंदी जैसे मुद्दे उठाकर आम आदमी के दिल में अपनी जगह बना ली। यूपी, गुजरात और कर्नाटक की तुलना में नोटबंदी और जीएसटी का विरोध इन तीन राज्यों में ज्यादा दिखा था। ये सभी मुद्दे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। पूरे देश में इनकी गूंज है। ये राज्यों तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में अगले साल होने वाले आम चुनाव में सभी मुद्दे लोगों के जेहन में रहेंगे।

भाजपा को इन मुद्दों को शीर्ष पर रखना होगा। भले ही राम मंदिर का मुद्दा अहम क्यों न हो। ऐसे कई लोग हैं जो मानते हैं कि संघ परिवार फिर से मंदिर निर्माण के लिए माहौल बना रहा है। हिंदुओं को अपने पक्ष में मजबूत करने के लिए तमाम कोशिशें हो रही हैं। भाजपा भी चुनाव से पहले कानून के रास्ते मंदिर निर्माण की घोषणा कर सकती है। फिर भी 2018 के विधानसभा चुनावों परिणामों को देखते हुए लोग अपने जीवन से जुड़ी समस्याओं को प्राथमिकता दे रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में सामाजिक कल्याण योजनाएं लागू करने के बावजूद दलितों, आदिवासियों और ओबीसी आंदोलन भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण बना। इस मुद्दों की प्रधानमंत्री को चिंता करनी होगी। दशकों से भाजपा के वोट बैंक रहे उच्च जातियों और कारोबारियों में भी नाराजगी है। एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम पर शीर्ष न्यायालय के फैसले को पूर्ववत करने के लिए दलितों और आदिवासियों के साथ एकजुटता दिखाना उनकी नाराजगी की बड़ी वजह है। ऐसे में कई स्थानों पर भाजपा को दो नावों की सवारी भारी पड़ी।

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने भाजपा के लिए नई चुनौतियों खड़ी की है। इसने कांग्रेस को पुनर्जीवित किया है तो पार्टी के अंदर और बाहर राहुल गांधी को बतौर नेता स्थापित किया। इससे विपक्षी एकता को मजबूती मिलेगी और आर्थिक मसलों पर उसका विरोध और मुखर होगा। भाजपा को अपनी गल्तियों को सुधारना होगा। बिना देरी जी-तोड़ मेहनत में जुड़ जाना होगा।

(लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्‍लेषक हैं)

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