हिमाचल प्रदेश, नवनीत शर्मा। दवा ही जहर बन जाए तो सोचना पड़ता है कि इस जहर से मरा क्या- क्या है। जम्मू-कश्मीर के 12 मासूम बच्चे इसलिए मौत के मुंह में नहीं चले गए कि वे बीमार थे। इसलिए, क्योंकि उन्हें दवा में मीठा जहर दिया गया। दवा बनाने वाली कंपनी हिमाचल प्रदेश से है। सिरमौर के कालाअंब में यह दवा बनती थी। विज्ञान से जुड़े साहित्य खासतौर पर गद्य में मीठे जहर का जिक्र आता है। किसी को चुपचाप मारने का यह माध्यम होता है। उस मीठे जहर को डाई एथेलीन ग्लाइकोल कहा जाता है।

कालाअंब की कंपनी डिजिटल इंडिया की पीने वाली दवा कोल्डबेस्ट में यही डाला गया था। बेशक, इसमें प्रोपेलीन ग्लाइकोल का इस्तेमाल होना था। प्रोपेलीन की खूबी यह है कि इसे आमतौर पर खाने में सुरक्षित समझा जाता है। इसका काम है दवा का अतिरिक्त पानी सोख लेना, लेकिन दवा में नमी बरकरार रखना। लेकिन जहर ही सही, मीठा था, इसलिए उचित कच्चा माल मिला या नहीं, यह सोचने का वक्त किसी के पास नहीं था। ऑर्डर आया होगा कि इतना माल चाहिए और दवा की जगह जहर बना दिया गया। दवा के नमूने मानकों पर हार गए। मामला दर्ज हो गया है, अब अगला कदम गिरफ्तारी ही होगा। कंपनी का लाइसेंस रद कर दिया गया है और उत्पादन तो 17 फरवरी से ही बंद है।

किसका नुकसान हुआ? जम्मू कश्मीर के ऊधमपुर में 12 घर सूने हुए, बस यही? एक ही घर की दहलीज का दीपक बुझने पर जब सन्नाटा चिंघाड़ता है, उसे कोई संवेदनशील झेल सकता है? जहर दिलाया गया, वह भी दवा की शक्ल में? कोई भी सांत्वना पर्याप्त हो सकती है? ये 12 जीवन अगर मौत में न बदलते तो अपने घर परिवार ही नहीं, नए जम्मू-कश्मीर की प्रगति का हिस्सा बनते।

दरअसल, यह भरोसे के संकट का प्रश्न है, यह एशिया के सबसे बड़े फार्मा हब कहे जाते हिमाचल की व्यवस्था के खिलाफ गंभीर शिकायत है। यह उस परिपाटी में दी गई ढील का नतीजा है जहां नियम माने जाएं तो गलती की संभावना नहीं रहती। यह हिमाचल प्रदेश में कतिपय दवा उद्योगों के लालच और उसकी निगरानी की स्वाभाविक कमी का दुष्परिणाम है। इस सबमें हिमाचल ने अपनी प्रतिष्ठा को दाग लगवाया है। अगर 500 से अधिक दवा उद्योगों की निगरानी के लिए उचित सरकारी संख्याबल ही नहीं है तो जांच, निरीक्षण, पड़ताल आदि स्वत: ही विदेशी शब्द अनुभव होते हैं।

हिमाचल प्रदेश की आर्थिक उन्नति में दवा उद्योग की भूमिका से इन्कार नहीं है, लेकिन सूचनाएं बहुत कुछ कहती हैं। सरकार को अपना अमला मजबूत करना चाहिए। सिर्फ हर बार यह देना काफी नहीं है, ‘चिकित्सक जेनरिक दवाइयां लिखें।’ वे दवाइयां किन हालात में, किस मंशा और जानकारी के साथ बन रही हैं, इन तक नजर हो सरकार की। अन्यथा, ब्रांड बनने की राह पर चला हिमाचल कमजोर रह जाएगा। छवि का सूचकांक गिराने के लिए जम्मू-कश्मीर जैसी एक ही घटना बहुत बड़ी है। जेनरिक दवाइयों के आग्रह में क्या उचित कच्चे माल की जगह मीठा जहर इस्तेमाल होने देंगे?

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन समय-समय पर मानक पूरे न करने वाली दवाओं के बारे में चेतावनी जारी करता है। बीते वर्षों में उक्त कंपनी का नाम भी बार- बार आया है, सवाल यह है कि क्या उस बैच और लॉट की सारी दवाइयां वापस बुलाई जाती हैं? संदेह इसलिए होता है, क्योंकि अगर विभाग के पास लोग ही नहीं हैं, तो यह सब निगरानी कौन करता है?

ताजा घटना यह है कि चंद्रनगर कानपुर के दो भाई भी बद्दी में दवाओं का कारखाना संचालित कर रहे थे। इनके पास लाइसेंस फूड का था, लेकिन दवाइयां बन रही थीं। इनकी अंग्रेजी दवाइयों पर जिन कंपनियों का नाम दर्शाया जा रहा था, उन्हें भी जानकारी नहीं थी, ऐसा बताया जा रहा है। जाहिर है, इसमें भी हिमाचल की बदनामी हो रही थी। सिलसिला कई माह से चल रहा था, लेकिन सरकारी अमले को खबर अब मिली। अच्छी बात है कि भंडाफोड़ तो हुआ।

प्रचलन यह है कि बड़ी कंपनी को जब निश्चित अवधि में सामान तैयार कर भेजना होता है, वह अपना काम किसी छोटी कंपनी को सौंप देती है। लेबल, बैच, लॉट सब पहली कंपनी के होते हैं। उससे भी काम न संभले तो दूसरी कंपनी तीसरी कंपनी को काम सौंप देती है। इसी प्रक्रिया में मानक ध्वस्त होते हैं। प्रोपेलीन ग्लाइकोल के स्थान पर डाई एथेलीन ग्लाइकोल आ जाता है। इसी प्रकार की और गलतियां होती हैं।

इसी प्रक्रिया में ऐसी कंपनियां भी उग आती हैं जो दो कमरों में चलती हैं जिनके पास फूड लाइसेंस पर ही दवा बनाने का कातिल हुनर होता है। ऐसे तत्वों पर नकेल कसने की जरूरत है क्योंकि बात जिंदगी की है। जिंदगी ऐसी शय है जो मौत के आखिरी द्वीप तक तैरना नहीं छोड़ती। बीमारी में तो दवा पर ही भरोसा होता है। नक्श लायलपुरी ने यूं ही नहीं कहा था : जहर देता है कोई, कोई दवा देता है जो भी मिलता है मेरा दर्द बढ़ा देता है।

[राज्य संपादक, हिमाचल प्रदेश]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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