लखनऊ, सद्गुरु शरण। सियासत अपनी सत्ता लोलुपता के लिए कितने गहरे कुएं में गिर सकती है, देश देख रहा है। हिंदुस्तान को बर्बाद, बल्कि टुकड़ा-टुकड़ा कर देने की आकांक्षा जताने वाले नारे, पुलिस पर पथराव, सार्वजनिक और निजी संपत्ति को आग के हवाले करके देखने का सुख, राहगीरों पर हमला... और भी बहुत कुछ। हर तरफ धुआं। मानो उन्मादी भीड़ इस मुल्क को ही मिटा देना चाहती हो। अपने कौमी सद्भाव पर इतराने वाले लखनऊ को यह सब कुछ ज्यादा ही भोगना पड़ा, यद्यपि कानपुर, गोरखपुर, मेरठ, गाजियाबाद, बहराइच और बरेली समेत शायद ही कोई शहर बचा होगा जिसके ऊपर अराजकता का गहरा धुआं न छाया हो।

वाह री मारीच-सियासत! जो लोग नागरिकता कानून और एनआरसी का मतलब नहीं जानते, उन्हें अपने कारोबार में लगा दिया और खुद पर्दे के पीछे मुंह छिपाकर बर्बादी के मंजर पर अट्टहास करती रही। एक के बाद एक चुनावों में मुल्क द्वारा नकार दिए जाने का इतना क्रूर बदला। यह भी नहीं सोचा कि जलते लखनऊ की ये तस्वीरें दुनिया में हिंदुस्तान की कैसी छवि बनाएंगी। मान लिया कि सूबे के लोग भोले-भाले हैं। जाति-धर्म में बंटे हुए हैं, पर सामाजिक सद्भाव के प्रति बेपरवाह कतई नहीं हैं। अपने दिल पर हाथ रखकर विचार करिए... लखनऊ को आग के हवाले करने वाली भीड़ में लखनऊ के कितने लोग थे? गला फाड़कर हिंदुस्तान को राख कर डालने के जिहादी नारे लगा रहीं जींस-टॉपधारी बालिकाएं लखनऊ की थीं? मदिरा के नशे में लड़खड़ा रहे लड़के लखनऊ के थे? पुलिस अधिकारियों पर पत्थर बरसा रहे युवक-युवतियां लखनऊ के थे? बिल्कुल नहीं।

सियासत के उकसावे पर हर वक्त हिंदुस्तान को टुकड़े-टुकड़े करने का सपना देखने वाले दिल्ली और अलीगढ़ के विवादास्पद शिक्षा संस्थानों के युवाओं के जत्थे आयात करके लखनऊ के सीने में इतना गहरा जख्म देने की साजिश शहर याद रखेगा। बेशक कई वाहन राख हो गए, पुलिस चौकियां जला दी गईं, पुलिस अधिकारियों ने पत्थर खाए, राहगीरों ने डंडे खाए, पर इससे लखनऊ मिट नहीं गया। अगली सुबह उसके आसमां पर फिर कबूतर उड़े। मस्जिदों में जुमे की अजान हुई और मंदिरों में घंटे घनघनाए। क्रिसमस की तैयारी में मग्न गिरजाघरों में रौनक लौट आई। गुरुद्वारों में लंगर लगे।

दरअसल लखनऊ उस उत्तर प्रदेश की गर्वित राजधानी है जिसने करीब डेढ़ महीने पहले को देश के सर्वाधिक जटिल अयोध्या विवाद के फैसले को पूरे सम्मान के साथ स्वीकार किया था। चुनाव के बाद से ही खार खाए बैठे कुछ सियासी दलों को आम आदमी की इस समझदारी पर बहुत खिसियाहट हुइ थी जिसका हिसाब उन्होंने अब बराबर कर लिया। उम्मीद है कि हर तरफ धुआं देखकर इन दलों के कलेजे में ठंडक पड़ गई होगी। सियासत के कारोबार के लिए ऐसे मंजर शायद जरूरी होंगे, पर किसी को नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता वास्तविक जनार्दन है।

आपकी हरकतों पर जनता चुप रहती है तो आप इसे उसकी अज्ञानता, कायरता और तटस्थता मान लेते हैं। यही गलतफहमी आपको बार-बार पराजित कर रही है। हिंदुस्तान, खासकर उत्तर प्रदेश के कम पढ़े-लिखे मतदाताओं ने कई बार राष्ट्रहित में अपने लोकतंत्रीय विवेक का परिचय देकर चौंकाया है। राज्य में 2014 से 2019 के बीच हुए चुनावों में मतदाताओं ने जाति-धर्म की बंदिशों को तोड़ जो जनादेश दिया, उससे भुक्तभोगी दलों में छटपटाहट स्वाभाविक है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पुलिसबल की सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने धैर्य नहीं खोया। यह साजिशकर्ताओं की सबसे बड़ी विफलता रही। यूपी पुलिस की छवि के आधार पर शायद ही कोई अपेक्षा करेगा कि उपद्रवियों द्वारा पथराव के वक्त पुलिस अधिकारी पत्थर खाते रहेंगे। अपने साथियों के सर से खून बहता देखकर भी शांत रहेंगे। पुलिस बल धैर्य की अग्निपरीक्षा में डिस्टिंक्शन के साथ उत्तीर्ण हुआ। इसका वास्तविक श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जाता है जो अपने आक्रामक स्वभाव के विपरीत न सिर्फ खुद कूल रहे, बल्कि अपनी मशीनरी को भी संयमित रखा।

सरकार के पास असीमित शक्ति होती है। वह किसी से निपटने पर उतारू हो जाए तो उससे पार नहीं पाया जा सकता। बहरहाल, सरकार ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल हालात नियंत्रित करने में किया। यह सरकार का जनपक्षीय चेहरा है, क्योंकि आम आदमी यही चाहता है। जो दल या नेता सूबे में आग और धुआं देखना चाहते हैं, वे अपना कारोबार जारी रखें और अगले जनादेश का इंतजार करें। उधर, योगी सरकार की शक्ति का असली इम्तिहान अभी बाकी है। सरकार के सामने चुनौती है कि इस साजिश के सारे मास्टरमाइंड बेनकाब किए जाएं, अराजकता फैलाने वाले सलाखों के पीछे भेजे जाएं और सबसे बड़ी बात कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह संकल्प पूरा हो कि उपद्रव में संपत्ति के नुकसान की भरपाई उपद्रवियों की संपत्ति नीलाम करके की जाएगी। राष्ट्रहित के फैसलों में जनता हमेशा राजनीतिक नेतृत्व के साथ खड़ी रहती है, मोदी और योगी सरकार को इस विश्वास से डिगना नहीं चाहिए।

[स्थानीय संपादक, लखनऊ]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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