नई दिल्ली [श्रीनिवास]। भारत के सांस्कृतिक प्राण रामायण में बसे हुए हैं। सहस्त्रों वर्षो से रामायण की कथा, उसके पात्र और उन पात्रों द्वारा गढ़े गए आदर्श भारतीय जनमानस में इतने भीतर इतनी गहराई में समाए हुए हैं कि उनके बिना भारतवासी पूर्णता का अनुभव नहीं कर सकते। रामायण की मूल कथा सभी जानते हैं।

लेकिन लॉकडाउन के दौरान विद्वानों के बीच यह फिर से चर्चा का विषय है कि 21वीं सदी में भी रामायण की लोकप्रियता का क्या कारण है? चूंकि भारतीय समाज राम को आदर्श पुरुष और सीता को आदर्श नारी मानता है, अत: भारत की संस्कृति के प्रति दुराग्रह रखने वालों ने रामायण को विशेष निशाना बनाया।

उन्होंने सुनियोजित ढंग से माता सीता के वनवास के प्रसंग को कुछ इस तरह प्रचारित किया कि पूरी रामायण ही महिला विरोधी लगे। उन्हें इस उपक्रम में कुछ समय के लिए आंशिक सफलता भी मिली। बीसवीं शताब्दी में जब पश्चिमी महिलावाद हमारे सामाजिक विमर्श में प्रवेश करता है तो उसकी आड़ में दुराग्रहियों का गिरोह सनातन आदर्शो की छवि धूमिल करने के प्रयास करता है।

सबल, स्वावलंबी और निर्भीक नारी के रूप में स्थापित सीता को एक निर्बल, निर्भर और असहाय महिला के रूप में दिखाने का प्रयास किया जाता है। जबकि मूल रामायण यानी वाल्मीकि रचित‘रामायण’पढ़ने पर यह समझ में आता है कि नारी को शक्ति के रूप में मानने वाले इस समाज की आदर्श सीता ही पूरी रामायण की धुरी हैं। उत्तर रामायण में सीता का पात्र और भी उभरकर सामने आता है।

रावण का वध करने के उपरांत राम-सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटते हैं। राम का राज्याभिषेक होता है और वह सीता के साथ सिंहासन पर बैठकर लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना करते हैं। कुछ समय बाद एक लोकोपवाद की ध्वनि जनता से उठती है। राजा राम को राजधर्म और पति धर्म में से किसी एक को चुनने की दुविधा आ खड़ी होती है। जब रानी सीता को प्रजा के एक हिस्से द्वारा अपने ऊपर उठाए जा रहे प्रश्नचिन्हों और राम की दुविधा के विषय में पता चलता है, तो सीता स्वयं ही रानी का पद और अयोध्या त्याग कर वन जाने का कठोर निर्णय करती है।

अयोध्या से निकलने के बाद यदि सीता चाहतीं तो अपने पिता मिथिला नरेश जनक के पास भी जा सकती थीं, परंतु उन्होंने वन में जाकर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में उनकी धर्मपुत्री ‘वनदेवी’ बनकर एक सामान्य वनवासिनी की भांति लव और कुश का पालन-पोषण किया। वाल्मीकि ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि रामायण में दोनों ही बार सीता के वनवास जाने का निर्णय स्वयं सीता ने ही लिया है।

सीता के लिए कोई और निर्णय ले भी कैसे सकता था? क्योंकि सीता तो स्वतंत्र थीं, अपने आदर्श गढ़ने के लिए और अपने स्वाभिमान को अपने संबल से जीकर दिखाने के लिए।सीता का जीवन सार्वजनिक जीवन में शुचिता, स्त्री धर्म की धर्म ध्वजा, संस्कृति की निष्कलंक प्रहरी यानी महिला के जीवन के सर्वोच्च आदर्शो को स्थापित किया है।

हमारी विडंबना यह है कि संस्कृत भाषा के ज्ञान का लोक में अभाव होने के कारण मूलग्रंथ हमसे दूर होते गए। इससे जो रिक्तता पैदा हुई है उसका कुत्सित और दुराग्रहपूर्ण मानसिकता वाली शक्तियों ने लाभ उठाने की कोशिश की है। वह तो भला हो कि रामानंद सागर ने ‘रामायण’ की शोधपरक कथा को टीवी के माध्यम से आधुनिक समाज के लिए सर्वसुलभ बना दिया।

इस बार के रामायण के प्रसारण से ही दुष्प्रचारियों द्वारा लोगों के मन में बोए गए अनेक भ्रम दूर हो गए, परंतु अब यह आवश्यक है कि हमारी युवा पीढ़ी अपनी प्राचीन जड़ों को अपनी स्वयं की आंखों से देखने का प्रयास करे। (लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री हैं) 

Posted By: Vinay Tiwari

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