[ संजय गुप्त ]: विश्व की अग्रणी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच ने भारत की रेटिंग को जिस तरह 12 वर्ष बाद भी नहीं बदला उससे देश के नीति-नियंताओं को चिंतित होना चाहिए। मोदी सरकार को खास तौर पर इस पर विचार करना चाहिए कि जीएसटी जैसा व्यापक कदम उठाने और दीवालिया कानून बनाने के बाद भी फिच ने भारत की रेटिंग में बदलाव की जरूरत क्यों नहीं महसूस की? हालांकि फिच ने भारत के विकास में स्थायित्व देखते हुए यह आकलन किया है कि इस वित्त वर्ष में विकास दर 7.8 फीसद रहेगी, लेकिन रेटिंग न बदलने के पीछे उसने जो तर्क दिए उसकी सरकार के आर्थिक रणनीतिकार अनदेखी नहीं कर सकते।

फिच का मानना है कि भारत की राजकोषीय कमजोरी रेटिंग सुधार में बाधा बन रही है। उसके अनुसार चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में जीएसटी संग्रह कम रहने और आगामी चुनावों के मद्देनजर खर्च पर नियंत्रण में कठिनाई से राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 3.3 प्रतिशत पर रखने के लक्ष्य को हासिल करने में परेशानी आएगी। फिच का यह भी मानना है कि अन्य देशों की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था कुछ संरचनात्मक कमजोरी प्रदर्शित कर रही है। हालांकि मोदी सरकार के प्रयासों से भारत ने विश्व बैैंक की कारोबारी सुगमता संबंधी सूची में एक ऊंची छलांग लगाई है, लेकिन विदेशी निवेश में अभी भी अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पा रही है।

इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए कि एक बड़ा बाजार होते हुए भी विदेशी कंपनियां भारत में निवेश के लिए तेजी से आगे क्यों नहीं आ रही हैैं? यह विचार सरकार के साथ विपक्ष को भी करना चाहिए, क्योंकि निवेश के लिए उपयुक्त माहौल बनाने में उसकी भी भूमिका होती है। यह शुभ संकेत नहीं कि खुद भारतीय उद्यमी पैसा होते हुए भी पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे हैैं। निवेश के प्रति भारतीय उद्योगपतियों की बेरुखी का एक कारण यह है कि संप्रग शासन में उद्यमियों को बिना सोचे-समझे जो कर्ज बांटा गया उसके चलते हमारे बैैंक एनपीए की समस्या से जूझ रहे हैैं।

यह एक तथ्य है कि मोदी सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी एनपीए का संकट दूर होने का नाम नहीं ले रहा है। दीवालिया कानून प्रभावी अवश्य है, लेकिन उसके जरिये एनपीए की आंशिक वसूली ही हो पा रही है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि फिच का यह मानना है कि कर्ज कारोबार में वृद्धि कम होने से बैंकिंग और गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र के लिए समस्याएं बढ़ेंगी। सरकार को इन समस्याओं से पार पाना होगा और साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि देशी-विदेश निवेश में वृद्धि के बगैर न तो उद्योग-धंधों में तेजी आने वाली है और न ही रोजगार के उतने नए अवसर पैदा होने वाले हैैं जितने आवश्यक हैैं।

भारत मौजूदा विकास दर से संतुष्ट नहीं हो सकता, क्योंकि इस विकास दर से करोड़ों गरीबों को गरीबी रेखा से ऊपर नहीं लाया जा सकता। दरअसल यह बात सभी दलों को समझनी होगी कि भारत जैसे विकासशील देश जहां पर गरीब और मध्यम वर्ग की तादाद बहुत बड़ी है वहां आर्थिक क्षेत्र में हालात पूरी तरह बदलने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार को सामाजिक योजनाओं में कहीं अधिक पैसा खर्च करने की जरूरत है। बात चाहे शिक्षा के क्षेत्र की हो या स्वास्थ्य के क्षेत्र की हो या फिर कृषि या उद्योग-व्यापार के क्षेत्र की, इन सभी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है और पर्याप्त निवेश तब संभव होगा जब आर्थिक विकास दर नौ-साढे़ नौ प्रतिशत की दर से आगे बढ़े और वह लंबे समय तक कायम भी रहे। इसके लिए आर्थिक नीतियों पर राजनीतिक आम सहमति के साथ ही यह भी जरूरी है कि भारत और उसके आसपास शांति का माहौल रहे।

सिंगापुर में पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी र्ने ंहद प्रशांत क्षेत्र में शांति और सहयोग के माहौल की पैरवी की। उन्होंने इसे भारतीय दृष्टिकोण बताया। क्षेत्रीय और वैश्विक शांति तभी संभव है जब भारत के साथ अन्य देश भी उसके प्रति प्रतिबद्ध भी हों। इस मामले में केवल चीन का रवैया ही चिंताजनक नहीं है जिसकी विस्तारवादी नीतियों से उसके तमाम पड़ोसी देश त्रस्त हैैं। चीन की तरह ही अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश जिस तरह पाकिस्तान की आतंकवाद को पालने-पोसने वाली नीतियों की अनदेखी कर रहे हैैं उससे दक्षिण एशिया में शांति की उम्मीद नहीं की जा सकती और यदि दक्षिण एशिया में शांति नहीं आती तो उससे अन्य देशों के साथ भारत भी प्रभावित होगा और इसका असर देश के आर्थिक परिदृश्य पर भी पड़ेगा।

आज भारत को चीन और पाकिस्तान की ओर से पेश की जा रही चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने सैन्य साधनों पर कहीं अधिक धन खर्च करना पड़ रहा है। बेहतर हो कि विश्व के प्रमुख देश जो दक्षिण एशिया अथवा पूर्वी एशिया में शांति की वकालत करते हैैं वे उन देशों के प्रति सख्ती दिखाएं जो शांति के लिए खतरा हैैं। इस मामले में केवल बातें करते रहने या फिर चेतावनी देने से बात बनने वाली नहीं है। यदि संयुक्त राष्ट्र की तमाम कोशिशों के बाद भी दुनिया में गरीबी उन्मूलन का अभियान गति नहीं पकड़ पा रहा है तो इसके लिए प्रमुख राष्ट्र ही उत्तरदायी हैैं। वे खुद तो सैन्य साजो-सामान पर अपना खर्च बढ़ा ही रहे हैैं, विकासशील देशों को भी इसके लिए विवश कर रहे हैैं।

यह तेज गति से विकास का सिलसिला कायम न हो पाने का ही परिणाम है कि संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में भारत कहीं पीछे है। संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक के पैमाने को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो भारत अभी उन पैमानों को बमुश्किल छूता भर है। भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर अर्थात पश्चिमी देशों के पैमाने पर विकास हासिल करने के लिए अभी लंबा सफर तय करना है। यह सफर तब तय होगा जब सामाजिक सुधारों और निर्धनता निवारण की योजनाओंं में आज जितना धन खर्च हो रहा है उसका दो-तीन गुना खर्च करने की स्थिति बने। आज सामाजिक सुधारों और जन कल्याण के लिए जितना धन चाहिए उतना नहीं मिल पा रहा है तो इसीलिए कि भारत की आर्थिक विकास दर दुनिया में सबसे तेज होने के बाद भी वांछित जरूरतों को पूरा करने के हिसाब से कम है।

इस संदर्भ में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह सही कहा कि गरीबी निवारण के लिए उच्च विकास दर आवश्यक है। इस उच्च विकास दर की चिंता केवल सत्तारूढ़ दल को ही नहीं, अन्य राजनीतिक दलों को भी करनी होगी, क्योंकि तभी वह माहौल बन पाएगा जिसमें देश का तेजी से उद्योगीकरण भी संभव हो पाएगा और कृषि क्षेत्र का उत्थान भी। बेहतर हो कि भावी आर्थिक नीतियों को लेकर देश में राजनीतिक सहमति कायम हो। यह सहमति तभी कायम होगी जब आर्थिक मामलों में नारेबाजी की राजनीति से बचा जाएगा। यदि ऐसा हो जाए तो देश अपने आप दुनिया के लिए निवेश का पंसदीदा ठिकाना बन जाएगा।

[ लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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