[ हर्ष वी पंत ]: पूरी दुनिया कोरोना महामारी के शिकंजे में है। हालात अभी भी भयावह दिख रहे हैं। तमाम चर्चाओं के बीच एक बड़ा सवाल चीन के रवैये को लेकर है। शुरुआती हफ्तों में कोरोना संकट से निपटने में कम्युनिस्ट पार्टी के संदिग्ध रवैये, महामारी के खिलाफ जागरूकता की अलख जगाने वालों पर ही सख्ती, सूचनाओं का अपने कूटनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल को लेकर तो चीन सवालों के घेरे में है ही, इसे लेकर भी है कि जब उसने इस आपदा पर एक बड़ी हद तक काबू पा लिया तो वह खुद को पीडि़त देशों के रहनुमा के रूप में पेश कर रहा है। ऐसे सवाल स्वाभाविक हैं, क्योंकि वैश्विक व्यवस्था दांव पर लगी हुई है।

अमेरिका का राजनीतिक नेतृत्व कोरोना से हो रही फजीहत को रोक पाने में नाकाम

विमर्श अमेरिका को लेकर भी हो रहा, क्योंकि वहां का राजनीतिक नेतृत्व कोरोना वायरस के संक्रमण से उपजे संकट और उससे हो रही फजीहत को रोक पाने में नाकाम दिख रहा है। जब पूरा संसार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है तब वह देश यानी अमेरिका खुद लड़खड़ा रहा है जिस पर किसी भी आपदा के समय दुनिया की उम्मीदें टिकी होती थीं। इस आपदा से निपटने के अमेरिकी रवैये से अमेरिका की साख और विश्वसनीयता भी दांव पर लग गई है। अब वह चीन, इटली और स्पेन को पछाड़कर कोविड-19 महामारी का वैश्विक केंद्र बन गया है। अगले एक महीने में वहां महामारी चरम पर पहुंच सकती है।

डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व पर उठे सवाल, कहा था, राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की जरूरत नहीं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक जिस तरह का नेतृत्व किया है उससे तमाम सवाल उठ खड़े हुए हैं। हफ्तों तक उन्होंने इस बीमारी को गंभीरता से लिया ही नहीं। कुछ हफ्ते पहले तक मृतकों के शुरुआती आंकड़ों को लेकर वह कह रहे थे कि यह तादाद अमेरिका में फ्लू या सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों से भी कम है। यह बात उन्होंने देशवासियों को यह आश्वस्त करने के लिए कही थी कि राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की कोई आवश्यकता नहीं। उन्होंने यह भी कहा था कि हमारा देश कभी बंद नहीं हुआ। वास्तव में वह तो आश्वस्त थे कि अमेरिका में मध्य-अप्रैल तक यानी ईस्टर की छुट्टियों तक सब कुछ सामान्य हो जाएगा और कारोबार फिर से जोर पकड़ेगा। साफ है कि वह दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ पाए।

ट्रंप प्रशासन की घोर लापरवाही

ट्रंप प्रशासन की घोर लापरवाही का पता तभी चल गया था जब अमेरिका में शुरुआती मामले सामने आने के बाद उसने कोई तात्कालिक कदम उठाना जरूरी नहीं समझा और कहा कि स्थिति नियंत्रण में है। उसने यह मुगालता भी पाल लिया कि तापमान बढऩे के बाद यह महामारी किसी चमत्कार की तरह गायब हो जाएगी। कोरोना संकट की गंभीरता को समझने के बजाय ट्रंप ट्विटर पर उन डेमोक्रेट गवर्नरों से उलझने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे थे जो अधिक ठोस कदमों की मांग कर रहे थे। इसके बाद जब महामारी ने अपना विकराल रूप दिखाना शुरू किया तो अपर्याप्त मेडिकल आपूर्ति और परीक्षण के मोर्चे पर अक्षमता को लेकर अमेरिका की कलई खुल गई।

कोरोना से अमेरिका में एक से दो लाख मौतों की आशंका

अब अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग देश भर में एक से दो लाख मौतों की आशंका जता रहा है। इस कड़वी हकीकत का आभास ट्रंप को हाल में तब हुआ जब उन्हें यह कहना पड़ा कि प्रत्येक अमेरिकी को मुश्किल वक्त के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि आने वाला समय बहुत पीड़ादायक होने वाला है।

कोरोना से बदहाल होती अमेरिकी अर्थव्यवस्था

कोरोना से बदहाल होती अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए अमेरिकी कांग्रेस ने हाल में 2 ट्रिलियन डॉलर का राहत पैकेज मंजूर किया है जो उसके इतिहास में अभी का सबसे बड़ा पैकेज है। इसमें अमेरिका के दोनों दलों ने एकजुटता दिखाई। इसके बावजूद वहां राजनीतिक तल्खी कायम है। प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी ने सदन की एक नई समिति गठित की है जो महामारी से मुकाबला करने की संघीय सरकार की नीतियों-कार्यक्रमों के सभी पहलुओं की समीक्षा करेगी। ट्रंप ने इसे बेवजह निशाना बनाने वाली कवायद करार दिया है।

इस साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव भी हैं, ट्रंप की स्वीकार्यता रेटिंग अच्छी है

अमेरिकी राजनीति में ऐसे तल्ख स्वरों का उभरना स्वाभाविक ही है, क्योंकि इस साल वहां राष्ट्रपति चुनाव होने हैं जिसमें ट्रंप और डेमोक्रेट्स दोनों का बहुत ऊंचा दांव लगा हुआ है। हालिया ओपिनियन पोल्स के नतीजों में यह झलकता भी है। करीब 94 प्रतिशत रिपब्लिकन मानते हैं कि ट्रंप इस आपदा से बखूबी निपट रहे हैं। वहीं ऐसा मानने वाले डेमोक्रेट्स का आंकड़ा महज 27 प्रतिशत है। ट्रंप की स्वीकार्यता रेटिंग भी इस समय 49 प्रतिशत है जो खासी ध्रुवीकृत राजनीति में उनके हिसाब से बहुत अच्छी है। बहरहाल आने वाले दिनों में यह आपदा किस प्रकार अपना असर दिखाती है और ट्रंप उससे कैसे निपटते हैं, इसका नवंबर में होने राष्ट्रपति चुनावों के नतीजों पर काफी असर पड़ेगा।

अमेरिका के वैश्विक नेतृत्व पर गंभीर सवाल

जहां तक अमेरिका के वैश्विक नेतृत्व का सवाल है तो उसे लेकर सवाल दिन-प्रतिदिन गंभीर होते जा रहे हैं। तमाम कमियों के बावजूद चीन वैश्विक नेतृत्व के लिए अपना एक मॉडल पेश कर रहा है जो दुनिया के एक बड़े हिस्से को लुभा सकता है। दुनिया में बहुत ही कम देश इस आपदा से निपटने और इस गाढ़े वक्त में विश्व का नेतृत्व करने के लिए अमेरिका से मनुहार कर रहे हैं। यह अमेरिकी नीति-निर्माताओं के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। यहां तक कि वाशिंगटन के करीबी दोस्त भी उससे उम्मीदें नहीं लगा रहे। असल में अमेरिका ने खुद को अलग रखने की जो कवायद शुरू की थी वह कोरोना संकट के समय प्रत्यक्ष दिखने लगी। वैश्विक व्यवस्था के साथ अमेरिकी रिश्ता एक दोराहे पर है, क्योंकि शेष विश्व ने भी नए समीकरणों की थाह लेना शुरू कर दिया है। इसके व्यापक निहितार्थ होंगे।

( लेखक लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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