[ अतुल कोठारी ]: चीन की धरती पर पनपे कोरोना विषाणु से पूरा विश्व संकट में है। पचास लाख से अधिक लोग उसकी चपेट में हैं। भारत में प्रभावित लोगों का आंकड़ा सवा लाख को पार कर गया है। कोरोना वायरस से उपजी महामारी कोविड-19 से आर्थिक एवं शिक्षा के क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। देश के लोगों की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अर्थ के बिना काम नहीं चल सकता। इस अर्थ का देश में अभाव एवं अति प्रभाव भी न हो, यह कार्य बिना शिक्षा के संभव नहीं। पिछले दो-ढाई माह से अधिक समय से देश के सभी शैक्षणिक संस्थान ठप हैं।

ऑनलाइन परीक्षा: परीक्षा की मात्र औपचारिकता 

10 एवं 12 वीं बोर्ड की अधिकतर परीक्षाएं संपन्न होने के उपरांत बाकी परीक्षाएं नहीं हो पाईं। अभी ऑनलाइन परीक्षा लेने की बात कही गई है। कुछ राज्यों ने अंतिम वर्ष या बोर्ड की परीक्षा को छोड़कर बाकी परीक्षाएं लिए बिना ही आगे के वर्ष में प्रमोशन करने की घोषणा कर दी है। वैसे ऑनलाइन परीक्षा भी मात्र परीक्षा की औपचारिकता ही होगी।

महामारी के प्रकोप के चलते विश्वविद्यालयों में शोध-अनुसंधान कार्य बंद

महामारी के प्रकोप के चलते विश्वविद्यालयों में शोध-अनुसंधान कार्य बंद हैं। छात्रों के व्यक्तित्व के समग्र विकास हेतु चलने वाली खेल, सांस्कृतिक गतिविधियां, कला संबंधी कार्यक्रम आदि भी रुके हुए हैं। कोरोना का यह संकट जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। विश्व में यह मत बन रहा है कि कोरोना भी चलेगा और्र ंजदगी भी। जहां चुनौती होती है वहां अवसर भी होते हैं, जहां समस्या होती है वहां उसके समाधान भी निहित होते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि जीवन में आए अवसरों को व्यक्ति साहस एवं ज्ञान की कमी के कारण समझ नहीं पाता। हमें साहस एवं ज्ञान, दोनों का परिचय देना होगा।

महामारी के कारण बड़े पैमाने पर ऑनलाइन शिक्षा प्रारंभ हुई

हमारे देश में शिक्षा क्षेत्र में लंबे समय से ऑनलाइन शिक्षा की बात चर्चा में थी। कुछ छुट-पुट प्रयास भी हुए थे, परंतु इस महामारी के कारण आज बड़े पैमाने पर ऑनलाइन शिक्षा प्रारंभ हो गई है। यूजीसी के अनुसार अगस्त के पहले कॉलेज प्रारंभ नहीं होंगे। यूजीसी को यह सुझाव दिया गया है कि जब भी शैक्षिक कार्य प्रारंभ हो तब दो दिन ऑनलाइन, दो दिन प्रत्यक्ष संस्थान में आकर पढ़ाई, एक दिन प्रोजेक्ट वर्क अर्थात व्यावहारिक अनुभव हेतु शिक्षा दी जाए। इससे हम वर्षों से रटन प्रक्रिया वाली पढ़ाई में परिवर्तन कर सकते हैं। दो दिन ऑनलाइन में व्याख्यान हो। उसमें से उठे प्रश्न एवं छात्रों को जो बातें समझ में नहीं आएं उसके लिए दो दिन प्रत्यक्ष क्लास हो और चार दिन की पढ़ाई का व्यावहारिक अनुभव एक दिन के प्रोजेक्ट वर्क से हो। इस प्रकार पढ़ाने की विधियों में हम आधारभूत बदलाव कर सकते हैं।

सभी महाविद्यालय और विवि दो पारी में चलाने चाहिए, हर रोज 20 फीसद छात्र संस्थान में आएं

सभी महाविद्यालय और विश्वविद्यालय दो पारी में चलाने चाहिए जिससे हर दिन 20 फीसद छात्र ही संस्थान में आएं। इससे शारीरिक दूरी की जरूरत भी पूरी हो जाएगी और ट्रैफिक भी कम होगा। वाहन कम चलने से प्रदूषण भी कम होगा। ऑनलाइन शिक्षा की जो समस्याएं हैं उनका समाधान दो माह में ढूंढना होगा। इस हेतु शिक्षकों का शिक्षण करना आवश्यक होगा। गांवों, जनजातीय क्षेत्रों में कनेक्टिविटी की समस्या होगी, गरीब छात्रों को मोबाइल डाटा खर्च की भी समस्या हो सकती है। इन सबके समाधान की तैयारी के साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि ऑनलाइन शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाए।

कोरोना संकट के चलते छात्र भी तनाव में हैं

कोरोना संकट के चलते छात्र भी तनाव में हैं। उनके सामने स्वास्थ्य का संकट भी है। इस हेतु स्वास्थ्य एवं योग शिक्षा को हर स्तर पर अनिवार्य करना होगा। प्रधानमंत्री ने देश के स्वावलंबन एवं स्थानीय उत्पादों को महत्व देने की बात कही है। इस हेतु हमारे अर्थशास्त्र के पाठ्यक्रम में स्वदेशी एवं स्वावलंबन का समावेश करना होगा। साइबर क्राइम के प्रति सावधान करने वाले पाठ्यक्रम को भी महत्व देना होगा। पाठ्यक्रम में बदलाव की तैयारी शीघ्रता से प्रारंभ करनी चाहिए ताकि अगस्त तक पाठ्य पुस्तकें तैयार हो सकें।

वर्तमान पाठ्यक्रमों में व्यापक बदलाव आवश्यक

वर्तमान पाठ्यक्रमों में व्यापक बदलाव आवश्यक है। पहली बात तो हर विषय के अनुसार कौशल शिक्षा के पाठ्यक्रम होने चाहिए, दूसरी बात राष्ट्रीय, सामाजिक एवं क्षेत्रीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम तैयार किए जाएं। जैसे कुछ आइआइटी एवं अन्य शैक्षिक संस्थानों ने छोटे आकार के वेंटिलेटर, हैंड सैनिटाइजर, संक्रमितों की पहचान करने वाले रोबोट, मास्क आदि बनाकर दिए हैं वैसे ही अन्य संस्थान भी ऐसा काम कर सकें, इससे संबंधित पाठ्यक्रम पर विचार करना होगा।

ऑनलाइन शिक्षा के लिए आज भी हम विदेशी एप पर निर्भर हैं

स्वावलंबन एवं स्वदेशी का महत्वपूर्ण आधार शोध-अनुसंधान है। आज अमेरिका सहित अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में ही महत्वपूर्ण शोध होते हैं। आज अवसर है कि हम अपने विश्वविद्यालयों को इस प्रकार की दिशा प्रदान करें कि वहां भी महत्वपूर्ण और अंतरराष्ट्रीय अहमियत वाले शोध हो सकें। ऑनलाइन शिक्षा हेतु आज भी हम विदेशी एप पर निर्भर हैं। क्या भारत के आइआइटी जैसे संस्थानों द्वारा भारतीय एप नहीं बनाए जा सकते? कोविड-19 महामारी के इलाज हेतु जैसे हमने अमेरिका सहित अनेक देशों को दवाएं उपलब्ध कराईं वैसे ही हमारे महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और उद्योगों के माध्यम से मास्क का व्यापक उत्पादन करके पूरे विश्व में निर्यात किया जा सकता है।

स्वदेशी सैनिटाइजर बनाने के केंद्र हमारे साइंस कॉलेज हो सकते हैं

गुणवत्ता युक्त स्वदेशी सैनिटाइजर बनाने के केंद्र हमारे साइंस कॉलेज और विश्वविद्यालयों के विज्ञान विभाग क्यों नहीं हो सकते? स्वदेशी एवं स्वावलंबन मात्र स्वदेशी वस्तुओं तक सीमित नहीं हैं। स्वदेशी का भाव एवं स्वाभिमान जगाने हेतु इसकी आवश्यकता निश्चित है। भारत को स्वावलंबी, समर्थ एवं शक्तिशाली राष्ट्र बनाना है तो इसका आधार शिक्षा ही हो सकती है। कोविड-19 महामारी ने शिक्षा के समक्ष व्यापक चुनौतियां पेश कर दी हैं, परंतु इस समय इन चुनौतियों को अवसर में बदलने पर ध्यान देना चाहिए। वर्तमान शिक्षा में आधारभूत बदलाव करके ही हम चुनौतियों को आसानी से अवसर में बदल सकते हैं।

( लेखक शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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