[भूपेंद्र यादव]। सेक्युलरिज्म की बहस इस देश में अब कोई नई बात नहीं रही और राजनीति में तो बिल्कुल भी नहीं। सेक्युलरिज्म के शब्दार्थ को लेकर विद्वानों के बीच अनेक असहमतियां हैं, किंतु इसकी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह कम ही लोग लगाते हैं। इस बहस को यदि तटस्थ होकर देखें तो इसके अतीत और वर्तमान में दो पक्षों पर चर्चा जरूरी हो जाती है। पहला पक्ष इसकी ऐतिहासिकता को लेकर है और दूसरा वर्तमान में इसके राजनीतिक औचित्य का है। इन दोनों पक्षों पर विचार से पहले हमें यह मानना होगा कि कोई भी लोकतांत्रिक राज्य और मानवतावादी समाज तभी श्रेष्ठ और सफल होता है जब उसके चरित्र में समता, समानता, समरसता, सौहार्द, सहिष्णुता और अपने सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गौरव का भाव प्रबल हो।

वसुधैव कुटुंबकम का दृष्टिकोण

भारत के संदर्भ में अगर इन मानदंडों को देखें तो हमारा आध्यात्मिक चिंतन देश और समाज के चरित्र में नैसर्गिक रूप से नजर आएगा। इतिहास साक्षी है कि प्राचीन युग से लेकर मध्ययुगीन कालखंड और आधुनिक काल तक, भारत का दुनिया को देखने का नजरिया ‘साम्राज्यवादी विस्तार’ के लिए हुए संघर्षों से अलग आत्मरक्षा करते हुए ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की दृष्टि वाला रहा है। यह दृष्टि हमारे आध्यात्मिक चिंतन से हमें विरासत में मिली है। सेक्युलरिज्म का प्रयोग सत्ता की निष्पक्षता के संदर्भ में ही ठीक है, परंतु हमारे यहां इसका प्रयोग अल्पसंख्यक समुदाय के तुष्टीकरण के लिए अधिक हुआ। सत्ता की मजहब के प्रति निष्पक्षता एक बहुलतावादी संस्कृति में वांछनीय है, परंतु इसका यह अर्थ भी नहीं है कि बहुसंख्यकों के प्रति दुर्भाव रखा जाए।

'सेक्युलरिज्म' शब्द को लाया गया बहस में

पिछले कुछ दशकों से देश की राजनीति में ‘सेक्युलरिज्म’ शब्द को कुछ इस तरह बहस के केंद्र में लाया गया, जिसने इसके मूल भावार्थ को विद्रूप बना दिया। कुछ राजनीतिक संगठनों, खासकर कांग्रेस और वामदलों द्वारा प्रचारित सेक्युलरिज्म की इसी विद्रूपता को दशकों पहले लालकृष्ण आडवाणी ने ‘छद्म-सेक्युलरिज्म’ का नाम दिया था, क्योंकि वह इसके खतरे को भांप गए थे। सेक्युलरिज्म शब्द का कालांतर में तुष्टीकरण और वोटबैंक का हथकंडा बन जाना, तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले कुछ दलों को भले ही फायदेमंद लगा हो, किंतु इसने देश और समाज के व्यापक हितों का भारी नुकसान किया है। व्यापक चर्चा के बावजूद हमारे संविधान निर्माताओं को प्रस्तावना में ‘सेक्युलरिज्म' शब्द के उल्लेख की जरूरत नहीं महसूस हुई। मूल प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के साथ-साथ विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता को समता के अवसर के आलोक में उल्लिखित किया गया था।

'सर्व धर्म समादर' का भाव

ऐसा नहीं है कि ‘सेक्युलरिज्म’ शब्द की जरूरत इसलिए नहीं महसूस हुई, क्योंकि तब परिस्थितियां बहुत आदर्श थीं। याद रखें कि जब यह सब हो रहा था तब देश का विभाजन भी मजहब के नाम पर हुआ था। बावजूद इसके हमारे संविधान निर्माताओं को यह भरोसा था कि ‘सर्व धर्म समादर’ का भाव हमारे देश और समाज की चिंतन शैली का नैसर्गिक चरित्र है और प्रत्येक परिस्थितियों में देश ने इस भावना को कायम रखा। जब हम उस कालखंड के आलोक में ‘सेक्युलरिज्म’ के मूल अर्थ और इसके राजनीतिक औचित्य की बात कर रहे हैं तो उस दौर के नेताओं की जीवन शैली में बहुत कुछ देखने को मिलेगा।

जैसे कि भारत और भारतीयता का महान आध्यात्मिक चिंतन गांधी जी की जीवन शैली में दिखता है। गांधी जी दिन की शुरुआत ही ‘वैष्णव जन’ से करते। आंबेडकर ने भी सामाजिक विभेद के खिलाफ संघर्षों के लिए ‘बुद्ध’ के आध्यात्मिक चिंतन को चुना। समाजवादी विचारक लोहिया ने रामायण मेले की शुरुआत की थी। इसका अर्थ यह तो नहीं कि इन नेताओं के विचारों में सेक्युलरिज्म का भाव नहीं था, अथवा ये कम्युनल थे!

सकारात्मक नीयत से उठाए कदम को किया स्वीकार

जो सेक्युलरिज्म हमारे चिंतन में अचिन्हित, किंतु नैसर्गिक भाव में था, उसका राजनीतिकरण कांग्रेस द्वारा 1975 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की प्रस्तावना में बदलाव करके ‘सेक्युलरिज्म’ शब्द जोड़कर किया गया। तब लोकतंत्र बंधक था। आगे किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाए, क्योंकि सभी ने इसे सकारात्मक ‘नीयत’ से उठाया कदम मानकर स्वीकार किया।

आज भी वही यथास्थिति कायम है, किंतु धीरे-धीरे कांग्रेस ने ‘सेक्युलरिज्म’ के उस नैसर्गिक अर्थ को नष्ट करके उसे विद्रूप अर्थों में इस्तेमाल करना शुरू किया, जो भारत की एकता और सौहार्द के लिए उचित नहीं है। कभी राष्ट्रगीत पर सवाल करना, कभी राम-मंदिर की न्यायिक प्रक्रिया पर अवरोध उत्पन्न करना, राम के अस्तित्व पर सवाल खड़े करना, ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर सामने आते रहे हैं। ‘छद्म-सेक्युलरिज्म’ के नाम पर तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति करने की अप-संस्कृति राजनीति में बढ़ने लगी। वाजपेयी सरकार में भाजपा पर सांप्रदायिक दल होेने के आरोप लगते थे, किंतु जब यह आरोप नहीं टिका तो इससे एक कदम आगे ‘सेक्युलरिज्म’ की बहस को ‘भय और असुरक्षा’ की झूठी राजनीति तक लाने का प्रयास किया गया।

पीएम मोदी ने दिया सबका साथ, सबका विकास का नारा

मोदी सरकार आने के बाद जब प्रधानमंत्री ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा पहली बार दिया, तो वह सिर्फ नारा नहीं था, बल्कि नीयत थी। जन कल्याण की योजनाएं बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों, वर्गों और समुदायों तक पहुंचीं। सभी वर्गों को योजनाओं का लाभ मिला और बात छह वर्षों के दौरान ‘सबका साथ, सबका विकास’ से आगे बढ़कर ‘सबका विश्वास’ तक पहुंची है। राजनीतिक रूप से कांग्रेस सहित कुछ दलों को सरकार की सर्वस्पर्शी नीतियों में उनके द्वारा गढ़े गए खोखले नैरेटिव की हार नजर आई। इस असफलता की वजह से वे सेक्युलरिज्म के सही अर्थों को बिगाड़ने के प्रयास में जुटे हैं।

मोदी सरकार को अपनी नीति, नीयत और निर्णयों से यह संदेश देने में सफलता मिली है कि भाजपा का सेक्युलरिज्म संविधान की प्रस्तावना में अंतर्निहित समतामूलक समाज की स्थापना और बंधुत्व की भावना के विकास पर केंद्रित ‘सबका-साथ, सबका-विकास और सबका विश्वास’ वाला है, जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का सेक्युलरिज्म तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति के लिए विकास विरोधी रुख वाला है।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सदस्य हैं) 

Posted By: Dhyanendra Singh

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