चंदन कुमार चौधरी। कोरोना वायरस का असर सिर्फ इंसानों के स्वास्थ्य पर ही नहीं पड़ रहा, बल्कि यह दुनिया भर में रोजगार के लिए भी खतरनाक साबित होने वाला है। संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी के मुताबिक कोरोना वायरस के कारण दुनिया भर में लगभग 2.5 लाख नौकरियां खत्म हो सकती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो कोरोना वायरस के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी नहीं, महामंदी की चपेट में आ सकती है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को 3.6 लाख करोड़ डॉलर का झटका लग सकता है। ऐसे में हमें इस संकट से बचने के लिए श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने, अर्थव्यवस्था को मदद, रोजगार एवं आमदनी बनाए रखने में सहायता (यानी कम अवधि का काम, वैतनिक अवकाश, अन्य सब्सिडी) के लिए फौरन बड़े पैमाने पर मिले-जुले उपाय करने होंगे। साथ ही छोटे एवं मझोले उद्योगों के लिए वित्तीय और कर राहत जैसी सुविधाएं मुहैया करानी होगी। इसकी तस्दीक अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट भी करती है। उसने एक अध्ययन में कहा है कि वैश्विक स्तर पर गर एक समन्वित नीति बनती है तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

कोरोना संकट से भारत भी अछूता नहीं है। भारत में इस बीमारी से संक्रमित होने वालों की संख्या हर दिन बढ़ रही है, जबकि इसका तीसरा चरण शुरू होना बाकी है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी कोरोना का व्यापक और गंभीर प्रभाव पड़ने लगा है। हालांकि सरकार कील-कांटा दुरुस्त करने में लगी हुई है, लेकिन कोरोना वायरस का असर इतना व्यापक है कि इसका प्रभाव अभी से ही दिखने लगा है। भारत में रोजगार और खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को लेकर विपक्ष पहले से ही सरकार पर हमलावर रहा है। भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार के. सुब्रमण्यम के मुताबिक रोजगार के मोर्चे पर आने वाले दिन काफी महत्वपूर्ण हैं। अप्रैल बीत जाने के बाद ही हम कोरोना संकट का सही-सही आकलन कर सकते हैं। अगर दुनिया भर में रोजगार में कमी आएगी तो देर-सबेर इसका असर भारत पर भी पड़ना लाजिमी है। हमें समझना होगा कि कोरोना के आर्थिक दुष्प्रभाव के कारण अकेले चीन में जनवरी-फरवरी में 50 लाख लोगों ने नौकरी गंवा दी।

भारत में सबसे ज्यादा खतरा स्वरोजगार, ठेके पर काम करने वाले लोगों और दिहाड़ी मजदूरों को है। भारत में अगर नौकरियों पर संकट मंडराता है तो सबसे ज्यादा असर रेस्टोरेंट, रियल स्टेट, विमानन, सिनेमा एवं मनोरंजन, पर्यटन, ड्राइविंग आदि पर पड़ना लाजिमी है। एक अनुमान के मुताबिक देश में कार्यरत 41 लाख अस्थायी कर्मचारियों पर अगली दो तिमाही सबसे ज्यादा भारी पड़ने वाली है। एसोचैम और ग्लोबल हंट इंडिया का मानना है कि कोरोना का सबसे अधिक नकारात्मक असर सर्विस सेक्टर और खास तौर पर दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ रहा है। अगर हालात जल्दी नहीं सुधरे तो संगठित क्षेत्र की हायरिंग में भी 15 से 20 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। 

कोरोना वायरस से उपजा संकट निश्चित रूप से बहुत बड़ा है। इसवायरस के कारण लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है और साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था भी गंभीर संकट से जूझ रही है। कोरोना वायरस का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर हुआ इसकी पूरी तस्वीर आने वाले समय में ही स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल इतना तो तय है कि अगर विश्व श्रम संगठन के सुझावों पर अमल किया जाए तो इस संकट को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। रिपोर्ट में कहा भी गया है कि साल 2008 में जैसा आर्थिक संकट देखा गया था, अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित नीतिगत कार्रवाई पर गंभीरता से अमल करें तो वैश्विक बेरोजगारी पर प्रभाव काफी कम हो सकता है।

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Posted By: Kamal Verma

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