[ प्रो. निरंजन कुमार ]: कोरोना वायरस संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 दिनों के लिए पूरे देश के लॉकडाउन का फैसला किया है। यह न केवल भारत, बल्कि दुनिया के इतिहास में 130 करोड़ जितनी बड़ी आबादी को एक साथ लॉकडाउन किए जाने की अभूतपूर्व घटना है। यह समझना जरूरी है कि मोदी के संबोधन के मायने क्या हैं? क्या हैं इस संकट के संदेश, सवाल और चुनौतियां और क्या हैं एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर हमारे कर्तव्य? मोदी के संबोधन में सबसे खास बात थी कोरोना को रोकने के लिए बार-बार सोशल डिस्टेंसिंग पर जोर देना। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि फिलहाल कोरोना का कोई इलाज नहीं है।

यदि इन 21 दिनों में सफलता नहीं मिली तो कोरोना भारत में विकराल रूप ले लेगा

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन 21 दिनों के दौरान हम इस महामारी को रोकने में सफल नहीं हुए तो यह भारत में कितना विकराल रूप ले लेगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल होगा। पीएम की इस बात में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। भारत जैसे सघन आबादी वाले देश में जहां स्वास्थ्य संसाधनों की एक सीमा है, वहां इससे न केवल लाखों की जान को खतरा है, बल्कि आर्थिक रूप से भी देश बहुत पीछे चला जाएगा। इसे पीएम ने भी यह कहकर स्पष्ट किया कि इस लॉकडाउन की आर्थिक कीमत देश को चुकानी पड़ेगी, लेकिन फिलहाल हर भारतीय की जान बचाना सबसे जरूरी है। 

सोशल मीडिया पर कुछ लोग इन कदमों की खिल्ली उड़ा रहे

अफसोस है कि सोशल मीडिया पर कुछ लोगों द्वारा उनके इस कदम की खिल्ली उड़ाई जा रही है। मजहब और अस्मितावादी राजनीति करने वाले लोग और तथाकथित बुद्धिजीवी भी इसमें शामिल हैं। एक अंग्रेजी दैनिक ने तो सोशल डिस्टेंसिंग पर इतना ज्यादा जोर देने को गैरजरूरी बताया, जबकि डब्ल्यूएचओ के साथ-साथ देश के प्रमुख स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च यानी आइसीएमआर ने लॉकडाउन और उसके माध्यम से सोशल डिस्टेंसिंग को कोरोना को रोकने का सबसे बड़ा उपाय बताया।

कोरोना के संक्रमण चक्र को तोड़ने के लिए 21 दिन जरूरी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार कोरोना के संक्रमण चक्र को तोड़ने के लिए कम से कम 21 दिन का समय बहुत जरूरी है। आइसीएमआर ने एक गणितीय मॉडल के आधार पर बताया है कि अगर सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन का पालन किया गया तो इससे संभावित मामलों की संख्या 60 से 89 फीसद तक कम हो जाएगी, लेकिन मोदी-विरोध में कुछ लोग सरकार के सही कदमों को भी मानने के लिए तैयार नहीं। संभवत: इसी के मद्देनजर पीएम ने देशवासियों को इस दौरान फैलने वाली अफवाहों को नजरअंदाज करने और दूसरों को जागरूक करने का आह्वान किया। पीएम मोदी की घोषणाओं के प्रति नकारात्मक लोगों की धारणा की एक मिसाल देखिए।

ताली-थाली बजाने का पीएम के आह्वान की सोशल मीडिया पर कुछ प्रोफेसरों ने खिल्ली उड़ाई 

22 मार्च को पांच बजे ताली-थाली बजाने का पीएम ने जो आह्वान किया था उसकी कुछ प्रोफेसरों ने सोशल मीडिया पर खूब खिल्ली उड़ाई। ऐसा व्यवहार कोरोना के खिलाफ देशव्यापी जंग को कमजोर करने वाला है, क्योंकि ताली-थाली बजाने के पीछे की मंशा को पीएम मोदी ने अपने संबोधन में साफ-साफ बता दिया था। यह डॉक्टर, नर्स, सफाईकर्मी, दवा-राशन दुकानदारों, बैंककर्मियों, पुलिस-प्रशासन और मीडिया की हौसला अफजाई और आभार व्यक्त करने के लिए तो था ही, साथ ही देश की संकल्प शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए भी था। इसका एक अन्य उद्देेश्य देश में एकजुटता का भाव जगाना था। संकट की इस घड़ी में एकजुटता जरूरी है।

संकट के समय देश का एकजुट हो जाना सकारात्मक संदेश है

यह सुखद रहा कि नकारात्मक लोगों को धता बताते हुए लगभग पूरे देश ने मोदी के सुर में सुर मिलते हुए कोरोना-वॉरियर्स का अभिनंदन किया। इस संकट के समय देश का एकजुट हो जाना एवं एकभाव में लयबद्ध हो जाना सकारात्मक संदेश है। यही संदेश लॉकडाउन के दौरान भी देना होगा। 22 मार्च के घटनाक्रम ने फिर से साबित किया कि मोदी पर देश की जनता का अटूट विश्वास है। जहां देश को भरोसा है कि कोरोना संकट से उबारने में मोदी सक्षम नेतृत्व देंगे वहींवैश्विक जगत भी मोदी में विश्वास जता रहा है। डब्ल्यूएचओ ने लॉकडाउन का स्वागत किया है। कुछ और देश भी इसकी जरूरत जता रहे हैं।

कोरोना से एक-एक भारतीय के जीवन को बचाने में पूरा सरकारें काम कर रही हैं- पीएम

मोदी ने पांच दिन के अंदर अपने दूसरे संबोधन में उन लोगों को भी जवाब दिया जो उन पर सत्ता के केंद्रीकरण और दूसरों को श्रेय न देने का आरोप लगाते हैं। उन्होने स्पष्ट कहा कि कोरोना से एक-एक भारतीय के जीवन को बचाने की दिशा में भारत सरकार के साथ-साथ सभी राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय काम कर रहे हैं। हालांकि एक बिंदु पर पीएम मोदी से थोड़ी अधिक उम्मीद थी।

कोरोना का सर्वाधिक असर गरीब और रोज कमाने-खाने वालों की रोजी-रोटी पर पड़ेगा 

कोरोना का सर्वाधिक असर गरीब और रोज कमाने-खाने वालों की रोजी-रोटी पर पड़ेगा। मोदी ने यह तो कहा कि प्रत्येक नागरिक ऐसे लोगों की यथासंभव मदद करे और राज्य सरकारें भी ऐसे लोगों को नि:शुल्क खाना मुहैया करवाएं, लेकिन केंद्र सरकार को भी इस दिशा में आगे आना चाहिए। उसे इसकी भी चिंता करनी होगी कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में कोई बाधा न आने पाए। इस आपूर्ति को लेकर जो अंदेशा पैदा हो गया है उसे दूर किया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार कोरोना से जुड़ी सुविधाओं-उपकरणों पर 15000 करोड़ खर्च करेगी 

केंद्र सरकार कोरोना से जुड़ी सुविधाओं-उपकरणों पर 15000 करोड़ खर्च करेगी, जबकि वह पहले से ही कई आर्थिक दबावों में घिरी है। अच्छा हो कि सभी सरकारी अधिकारी-कर्मचारी कम से कम एक दिन का वेतन प्रधानमंत्री राहत कोष में दान करें। यही अपेक्षा निजी क्षेत्र के मध्यम और उच्च वेतन भोगियों से है। इसके अतिरिक्त अन्य ‘आउट ऑफ बॉक्स’ उपायों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

देश में कोरोना संकट लाने-फैलाने के जिम्मेदार विदेशी पर्यटक और भारतीय भी हैं 

मिसाल के तौर पर यह हम सब जानते हैं कि भारत में कोरोना संकट लाने-फैलाने के जिम्मेदार विदेशी पर्यटकों के अतिरिक्त वे भारतीय भी हैं जिनका विदेश आना-जाना होता है। इनमें से अधिकांश अत्यंत संपन्न हैं। ऐसे संपन्न कोरोना मरीजों से उनकी एक माह की आय सरकारी कोष में जमा कराई जाए। जिन्होंने अपना मर्ज छिपाया उनसे कम से कम तीन महीने की आय वसूली जाए। इस तरह से प्राप्त धन को ‘जन-धन खातों’ के माध्यम से गरीब दिहाड़ी मजदूरों तक पहुंचाया जा सकता है। फिक्की जैसे उद्योग-संगठन ने भी जन-धन खातों का उपयोग कर एक बारगी भुगतान का सुझाव दिया है।

कोरोना आपदा एक विकराल चुनौती है, लेकिन भारत के पास है निपटने की क्षमता

बेशक कोरोना आपदा एक विकराल चुनौती है, लेकिन जैसा कि डब्ल्यूएचओ ने कहा कि भारत के पास इससे निपटने की क्षमता है। मोदी के शब्दों में जरूरत बस धैर्य, संयम और उदारता की है।

( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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