डॉ. एके वर्मा
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा भाजपा और आरएसएस को जवाब देने के लिए गीता, उपनिषदों और तमिल-संस्कृति का अध्ययन करना बहुतों के लिए हास्य का विषय हो सकता है, लेकिन यह कांग्रेस और लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। यह न केवल कांग्रेसियों और सेक्युलरवादियों को भी ऐसा करने को प्रेरित करेगा, वरन हिंदू समाज को भी इस्लाम और ईसाई धर्मग्रंथों का अध्ययन करने की प्रेरणा देगा? इससे विभिन्न धर्मों के प्रति लोगों में चेतना पैदा होगी और उनके आचार-विचार को समझकर उनकी राजनीतिक रणनीतियों से निपटने का बौद्धिक ज्ञान भी मिलेगा। आज कांग्रेस का वज़ूद खतरे में है। किसी समय पूरे देश में उसकी तूती बोलती थी। समाज के सभी वर्गों ने कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। उस दौर में हर घर में कांग्रेस समर्थक हुआ करते थे। क्यों आज उस पार्टी को अस्तित्व-संकट से जूझना पड़ रहा है? क्यों कांग्रेस ने केंद्र में सत्ता खो दी? क्यों पांच राज्यों- पंजाब, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, मेघालय और मिजोरम को छोड़ अन्य सभी 25 राज्यों में पार्टी सत्ता से दूर हो गई? जिस तरह कांग्रेस का जनाधार सिमट गया है उससे ऐसा लगता है कि भविष्य में कहीं पार्टी का राष्ट्रीय चरित्र ही न खत्म हो जाए?
कांग्रेस मुक्त भारत का स्वप्न देखने वाली भाजपा और गैर-कांग्रेसवाद की नींव पर बनी सपा, बसपा, जदयू, राजद, बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्र्रेस और अन्य पार्टियां इससे ख़ुश हो सकती हैं, लेकिन क्या यह भारतीय लोकतंत्र के लिए ठीक है? संभवत: हमारे लोकतंत्र के लिए वह दिन बहुत ही अशुभ होगा जब कांग्रेस अप्रासांगिक हो जाएगी, क्योंकि लोकतंत्र को जीवंत रखने के लिए कम से कम दो मजबूत राष्ट्रीय पार्टियों का होना जरूरी है। देश में कांग्रेस के अलावा कोई ऐसी पार्टी नहीं जो भाजपा को टक्कर दे सके। यदि केवल भाजपा का ही वर्चस्व बचेगा तो लोकतंत्र कमजोर होगा और उससे भाजपा को भी नुकसान होगा, क्योंकि उसमें भी वही अधिनायकवादी प्रवृत्तियां घर कर जाएंगी जो स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस में घर कर गई थीं और जो कालांतर में उसके अवसान का कारण बनीं। इसलिए एक सशक्त कांग्रेस पार्टी न केवल खुद कांग्रेस, वरन स्वयं भाजपा और भारतीय संसदीय लोकतंत्र के हित में होगी।
कांग्रेस को पुनर्जीवित करना संभव तो है, लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस स्वयं को पुनर्जीवित करने की इच्छुक है? बहुतों को लगता है कि कांग्रेस में ऐसा करने की इच्छाशक्ति नहीं। कहा जाता है कि कांग्रेस में जो नेता राज्य स्तर पर पनपने की कोशिश करता है उसे पार्टी से बहिष्कृत होना पड़ता है। हेमवती नंदन बहुगुणा, नंदिनी सत्पथी, पीए संगमा, शरद पवार, ममता बनर्जी आदि ऐसे कांग्रेसियों की लंबी सूची है। कभी-कभी संदेह होता है कि कहीं कोई बाहरी शक्ति कांग्रेस को कमजोर करने पर आमादा तो नहीं? जिस तरह पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस का जनाधार घटा और राष्ट्रीय फलक पर उसकी उपस्थिति कम हुई है वह कोई शुभ संकेत नहीं।
कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की इच्छाशक्ति का अभाव शीर्ष नेतृत्व के निर्णयों में भी व्यक्त होता है। कहीं उसे ऐसा तो नहीं लगता कि पार्टी में किसी नेता का कद बढ़ना उसके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है और उसे पनपने से पहले ही काट देना चाहिए? क्या क्षेत्रीय नेताओं को उनकी सीमा रेखा बता दी जाती है कि इसके आगे उन्हें जाने की इजाजत नहीं?
आखिर जब तक स्थानीय नेता सशक्त नहीं होंगे तब तक पार्टी का जनाधार कैसे मजबूत होगा? केवल शीर्ष नेतृत्व के बलबूते कोई संगठन कैसे चल सकता है? वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को पार्टी में लंबा सफर तय करने के बाद प्राय: गंभीर मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। एसएम कृष्णा, रीता बहुगुणा जोशी, जयंती नटराजन और शीला दीक्षित आदि इसके ताजा उदाहरण हैं। लगता है कि कांग्रेस कभी यह समझ ही नहीं पाई कि जब तक पार्टी राज्य स्तर पर सशक्त नेताओं की फौज नहीं तैयार करेगी तब तक राज्यों में उसके संगठनात्मक विकास की कोई संभावना नहीं और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक पार्टी को उस राज्य की सत्ता में लाना संभव नहीं। कांग्रेस ने कभी दूसरी कतार के नेताओं के विकास को गंभीरता से लिया ही नहीं जिससे अनेक मेधावी और कर्मठ कांग्रेसी नेता कभी पनप ही नहीं पाए।
कांग्रेस धीरे-धीरे सिकुड़ती चली गई, लेकिन उसे हमेशा यह मुगालता रहा कि शासन करना और जनता का वोट पाना जैसे उसका कोई पैदाइशी हक हो। अब तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्रों अमेठी और रायबरेली में भी यह मिथक टूट रहा है और वहां भी कांग्रेस का जनाधार खत्म सा ही है। सोनिया और राहुल व्यक्तिगत निष्ठा के कारण जीत जाते हैं, लेकिन उनके संसदीय क्षेत्रों में विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की करारी हार हो रही है। कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं को हमेशा मायूस किया है। उन्हें शिकायत रहती है कि जीवन भर पार्टी के लिए दरी-चादर बिछाते और कुर्सियां लगाते ही कट जाता है, लेकिन जब पार्टी में पदों और चुनावों में टिकटों के आवंटन का वक्त आता है तब ऐसे बाहरी लोगों को उसका लाभ मिल जाता है जिनकी ‘आलाकमान’ तक पहुंच होती है। ऐसे हताश और निराश कार्यकर्ताओं को मजबूरी में अन्य दलों की तरफ रुख करना पड़ता है।
समझना कठिन है कि सोनिया गांधी 19 वर्षों से कांग्रेस की अध्यक्ष क्यों बनी हुई हैं। क्या कांग्रेस में सामंतवाद है? क्या पार्टी में कोई ऐसा नहीं जो अध्यक्ष पद के उपयुक्त हो? या पार्टी में कोई ऐसा बचा नहीं जो यह कह सके कि लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप पार्टी में अध्यक्ष पद सीमित अवधि का ही होना चाहिए? वर्ष 1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी ने वार्षिक चुनावों की परंपरा डाली जिसे 44 वर्षों के बाद जवाहरलाल नेहरू ने तोड़ा जब वह 1929 और 1930 में लगातार दो वर्षों के लिए अध्यक्ष रहे और फिर 1950 से 1954 तक पुन: अध्यक्ष रहे, लेकिन सोनिया गांधी ने तो इस पैमाने पर अति ही कर दी है। उन्हें तनिक भी संकोच नहीं कि 1998 से आज तक वह क्यों अध्यक्ष बनी हुई हैं? सवाल यह भी है कि वह क्यों अपने पुत्र राहुल को पार्टी अध्यक्ष बनाने पर तुली हैं? ऐसा क्या है राहुल में जो और कांग्रेसियों में नहीं?
इन तमाम दुष्प्रवृत्तियों के साथ-साथ कांग्रेस वंशवाद, आंतरिक लोकतंत्र के अभाव, चाटुकारिता, आलाकमान संस्कृति, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी है। ये सभी बुराइयां कांग्रेसवाद के रूप में मुखर हो गई हैं जिन्होंने पार्टी को दीमक की तरह चाट लिया है। पार्टी का नेतृत्व, पार्टी संगठन और पार्टी के कार्यकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए हैं। यदि उन्हें अपना, अपनी पार्टी और भारतीय लोकतंत्र का भविष्य बचाना है तो उन्हें कांग्रेसवाद को छोड़ना होगा। बिना कांग्रेसवाद का परित्याग किए कांग्रेस की जन-स्वीकृति नहीं हो सकेगी। राहुल को गीता और उपनिषदों की सीख मदद जरूर करेगी और उन्हें भाषा के हल्केपन और आत्मघाती नकारात्मक आलोचनात्मकता से बचा कर गंभीर सकारात्मक आलोचना की ओर प्रवृत करेगी जो सबके लिए लाभकारी होगा।
[ लेखक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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