[संतोष त्रिवेदी]। सरकार बिल्कुल बनते-बनते रह गई। इस बीच सियासी जानकारों ने कहा कि यदि मौसमी धुंध को समविषम मिलकर साफ कर सकते हैं तो सरकार बनाने की धुंध क्यों नहीं साफ की जा सकती? सत्ता के लिए यदि सम विषम बन सकता है तो विषम सम क्यों नहीं? फिर नए दोस्तों को पुराने दाग धोने का लंबा अनुभव है।

ताजा-ताजा लड्डू खाने वालों ने तो केवल कुर्सी के लिए ही पुरानी दोस्ती का ‘त्याग’ किया है। जब ‘उनके’ साथ थे तो भी कुर्सी के लिए थे। इसीलिए इन्होंने कुछ अजूबा नहीं किया। वैसे भी जो दोस्ती फायदा न दे, उसे बनाए रखने में नुकसान ही है। आखिर राज्य के ‘व्यापक हित’ को देखते हुए ‘नई दोस्ती’ में न्यूनतम सहमति यह बनी कि ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।’

राज्यहित में उड़ेला जा सकता है

इसमें वे नंबर एक, नंबर दो और नंबर तीन पर सहमत हुए। फिर सिद्धांत और नैतिकता को ‘फेंट’ कर ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ का विलयन बना जिसे कभी भी राज्यहित में उड़ेला जा सकता है। फिलहाल आपसी ‘सौदे’ सॉरी मसौदे का एक ‘अविश्वसनीय’ फुटेज हमारे हाथ लगा है।

‘जनहित’ में हम उसे यहां लीक कर रहे हैं। नंबर एक ने बड़ी और पायेदार कुर्सी की ओर अंगुली करते हुए कहा, ‘हम इस पर कोई समझौता नहीं कर सकते। रात की छोड़िए, दिन में भी दस बार हम इसी का सपना देखते हैं। हमारी ओर से न्यूनतम कार्यक्रम यही है कि सरकार की बागडोर हमारे हाथ में हो।

फिफ्टी-फिफ्टी खेलो

सत्ता से ऐसा भावनात्मक जुड़ाव जानकर नंबर दो ने सहानुभूतिपूर्वक सुझाया, ‘दरअसल हम चाहते हैं कि तुम हमारे साथ भी वही ‘फिफ्टी-फिप्टी’ खेलो। आखिर अपने पुराने साथी के साथ तो तुम इसके लिए तैयार ही थे। हम नए भी हैं और तुम्हारे हितैषी भी।

इससे यह भी साबित होगा कि तुम हमें उतना ही प्यार करते हो, जितना सत्ता से।’ नंबर एक ने तुरंत अपना दावा जारी रखा, ‘देखिए, राज्य के लोग चाहते हैं कि हमारे नेतृत्व में ‘सत्यवचनी सरकार’ बने। ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ में सत्ता के अलावा हम सब कुछ न्यूनतम करने का संकल्प लेते हैं। सिद्धांत और नैतिकता जैसी बाधाओं को हम पहले ही पार कर चुके हैं। हमारे मन में ‘पुराना प्यार’ उमड़े, इसके पहले ही इस लोकतंत्र का कुछ कर डालो।’  

जनसेवक को बांधकर नहीं रख सकते

लोकतंत्र का नाम सुनते ही नंबर तीन को थोड़ी कसमसाहट हुई। पहलू बदलते हुए उसने अपनी बात रखी, ‘लोकतंत्र के प्रति चिंतित होकर ही हम साथ आए हैं। वरना तुम्हारे साथ खड़े होने में भी हमें परेशानी है, पर क्या करें! होटलों में लंबे समय तक हम किसी जनसेवक को बांधकर नहीं रख सकते। 

वे सभी जनसेवा के लिए मचल रहे हैं। इसलिए हम चाहते हैं कि हमें उचित सेवा का हिस्सा मिले। साथ ही तुम थोड़ा 'हिंदुत्व’ हल्का करो, हम थोड़ा ‘सेक्युलरिज्म’ एडजस्ट करेंगे। इससे हमारे सेक्युलर चेहरे पर थोड़ी खरोंच तो आएगी, पर सत्ता सारे घाव भर देती है। हमारी ओर से यही न्यूनतम है। रही बात अधिकतम की तो उसका हिसाब ‘नंबर दो’ देखेंगे।

मुश्किल वक्त में हम तो ट्वेंटी-ट्वेंटी में भी खुश 

उनकी ‘बारगेनिंग पावर’ जबरदस्त है। वह चाहें तो टेस्ट खेलें या फिफ्टी-फिप्टी। ऐसे मुश्किल वक्त में तो हम ‘ट्वेंटी-ट्वेंटी’ में भी खुश हैं।’ सबकी नजरें अब ‘नंबर दो’ पर टिक गईं। तभी नंबर दो ने कहा, ‘अभी इसमें कुछ ‘मिसिंग’ है। थोड़ा किसान, थोड़ा नौजवान डालते हैं। फिर भी कुछ कमी है तो वह नंबर तीन बताएंगे।’ ‘हां, मुझे अभी याद आया कि जो भी मलाईदार विभाग हैं, उनका बंटवारा सेहत के हिसाब से हो। 

एक का 'हिंदुत्व', नंबर दो का ‘राष्ट्रवाद’ 

ऐसा न हो कि जिन्होंने कभी मलाई नहीं चखी, उनको ज्यादा मिल जाए। इससे उनकी सेहत बिगड़ सकती है। और हां, हमारी युति के बारे में एक जरूरी बात। हमारे पास अब नंबर एक का 'हिंदुत्व', नंबर दो का ‘राष्ट्रवाद’ और तीसरे नंबर की ‘धर्मनिरपेक्षता’ है। इससे एक ‘डेडली कांबिनेशन’ बनेगा। हम समय-समय पर इसमें संशोधन भी करते रहेंगे।’ 

इतना सुनते ही नंबर एक ने राहत भरी सांस ली। तब ‘फिर शपथ कब ग्रहण करें? ’ इस उत्साह पर नंबर दो ने पानी फेरते हुए कहा, ‘अभी केवल ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ बना है, सरकार नहीं। वह तभी बनेगी जब हमें निमंत्रण मिलेगा।’ इसी बीच हमें मालूम पड़ा कि सरकार बनाने के लिए ‘असली’ नंबर एक ने अपना दावा नहीं छोड़ा। उनका कहना है कि ‘प्रोग्राम’ किसी का बने, सरकार वही बनाएंगे।

Posted By: Dhyanendra Singh

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