[प्रकाश सिंह]। नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA को लेकर देश में तूफान सा मचा हुआ है। देश के कुछ हिस्सों में अभी भी विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शन को देखने वाले को यही लगेगा कि भारत के अधिकांश नागरिक इस कानून को लेकर उद्वेलित हैं। कम से कम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो ऐसी ही धारणा बनती जा रही है, परंतु अगर हम गहराई में विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होगा कि ऐसा नहीं है और सीएए के विरोध की चिंगारी तीन चरणों में सुलगी। प्रथम चरण में तो सीएए के विरुद्ध कुछ लोगों के मन में वास्तव में संशय था।

वे इससे नाराज थे कि इस कानून के तहत अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भागकर भारत आए केवल हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी, मुसलमानों को नहीं। ऐसा भ्रम भी हुआ कि इस कानून के बाद यदि एनआरसी की कवायद हुई तो भारी संख्या में मुसलमान अवैध प्रवासी करार दिए जाएंगे और कालांतर में उन्हें देश से बाहर भी भेजा जा सकता है। परिणामस्वरूप विरोध का सिलसिला तेज हो गया।

छात्रों का पुलिस के विरुद्ध आक्रोश अहम पहलू 

असम में सीएए का विरोध इसलिए हुआ, क्योंकि वहां के लोगों को लगा कि बड़ी संख्या में शरणार्थी उनके यहां बस जाएंगे। उत्तर भारत में विरोध की शुरूआत जामिया मिल्लिया विवि एवं अलीगढ़ मुस्लिम विवि में उग्र प्रदर्शनों से हुई। प्रशासन की तरफ से पुलिस कार्रवाई में अनावश्यक बल प्रयोग का आरोप लगाया गया और इसी के साथ सीएए विरोध के दूसरे चरण की शुरुआत देखने को मिली। इस चरण में छात्रों का पुलिस के विरुद्ध आक्रोश अहम पहलू था। सीएए का मुद्दा पृष्ठभूमि में चला गया, यद्यपि वह आक्रोश के कारण के रूप में था। अधिकांश छात्रों को शायद सीएए के प्रावधानों का भी समुचित ज्ञान नहीं था और न ही इसका कि किन हालात में यह कानून बनाया गया।

विरोध का तीसरा चरण तब शुरू हुआ जब सरकार विरोधी विभिन्न गुटों ने देखा कि यह उनके लिए अच्छा मौका है। उन्होंने विरोध को हर संभव तरीके से हवा दी। इन गुटों में विपक्षी दल तो थे ही, कट्टरपंथी और असामाजिक तत्व भी उसमें शामिल हो गए। आज सीएए विरोध के रूप में हम जो कुछ देख रहे हैं वह सरकार और उन विभिन्न गुटों का टकराव है जो अलग-अलग कारणों से सरकार को घेरना चाहते हैं। सीएए तो केवल एक बहाना है। सरकार ने भी सीएए को लेकर शायद समस्त पहलुओं पर अच्छी तरह से मंथन नहीं किया।

तीनों मुद्दों पर सरकार के रुख-रवैये को देखकर खड़ा हुआ आंदोलन

हाल के समय में तीन ऐसे घटनाक्रम हुए जिससे मुस्लिम समुदाय में रोष बढ़ा। सबसे पहले तो सरकार ने तत्काल तीन तलाक पर जो कानून बनाया उसे लेकर कट्टरपंथी लामबंद हुए। इसके बाद अनुच्छेद 370 की समाप्ति और जम्मू-कश्मीर राज्य के विभाजन ने भी मुस्लिमों के एक तबके को कुपित किया। उन्हें लगा कि एक मुस्लिम बहुल राज्य का दर्जा घटाकर उसे एक केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। उनके हिसाब से यह जख्म पर नमक छिड़कने जैसा रहा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या मामले पर फैसला आया। अयोध्या की विवादित भूमि का हिंदुओं को आवंटन मुसलमानों के एक वर्ग को रास नहीं आया। इन तीनों मुद्दों पर सरकार के रुख-रवैये को देखकर तमाम मुसलमानों को लगा कि अगर सरकार के विरुद्ध खड़ा न हुआ गया तो उन्हें आगे और मुश्किल होगी। ऐसे में उन्हें सीएए विरोध के रूप में आवाज उठाने का अवसर हाथ लग गया। उनके साथ विभिन्न संगठन भी कूद पड़े।

विरोध में दी जा रही दलीलों पर कोई बल नहीं

सीएए के विरोध में जो दलीलें दी जा रही हैं उनमें कोई बल नहीं है। एक दलील यह है कि सरकार ने अन्य देशों जैसे श्रीलंका से तमिल, पाकिस्तान से अहमदिया और बलूच जैसे शरणार्थियों के लिए प्रावधान क्यों नहीं किया? पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे के अनुसार, कोई ऐसा कदम जो कई समस्याओं का समाधान करता हो उसे इस आधार पर गलत या असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता कि उससे सभी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा।

दूसरी दलील यह दी जा रही कि नागरिकता का आधार धर्म नहीं हो सकता। यह दलील प्रथमदृष्टया सही है, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से मुस्लिम बहुल देशों के मुसलमानों के भारत में शरण लेने की बात तर्कसंगत नहीं लगती। एक विधि विश्वविद्यालय के कुलपति ने दलील दी कि 31 दिसंबर, 2014 की तारीख मनमानी लगती है। अगर यह मनमानी है तो वही बताएं कि सही तारीख क्या होनी चाहिए? 

सीएए विरोधियों से पूछा जाए सवाल

एक आकलन के अनुसार सीएए से केवल 31,313 व्यक्ति ही लाभान्वित होंगे, जिसमें 25,447 हिंदू, 5,807 सिख, 55 ईसाई, दो बौद्ध और दो पारसी होंगे। इतनी कम संख्या पर इतना बवाल? सीएए विरोधियों से पूछा जाना चाहिए कि जब 1.5 करोड़ (गोडबोले समिति के अनुसार) घुसपैठिये भीरत आ गए तब आप चुप रहे और अब कुछ हजार लोगों पर इतना हंगामा क्यों कर रहे हैं?

हम अपने देश में अल्पसंख्यकों के लिए हमेशा चिंतित रहते हैं। सरकार उनके कल्याण के लिए समय-समय पर योजनाएं भी बनाती रहती है, लेकिन अगर सरकार पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों के लिए कोई पहल करती है तो लोगों को तकलीफ हो रही है। आखिर क्यों? हाल में संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक समिति ने ‘पाकिस्तान रिलिजियस फ्रीडम अंडर अटैक’ शीर्षक से जारी अपनी रिपोर्ट में इस पर गहरी चिंता व्यक्त की कि पाक में हिंदू और ईसाई अल्पसंख्यकों की लड़कियों और महिलाओं पर बहुत अत्याचार हो रहे हैं। बड़ी संख्या में उनका अपहरण कर उनका धर्मांतरण कराया जाता है। इसके बाद मुस्लिम युवकों से उनकी जबरन शादी करा दी जाती है।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों से होता है दोयम दर्जे का बर्ताव 

समिति ने यह भी लिखा है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा बर्ताव होता है। सीएए पर यदि किसी क्षेत्र की शिकायत सही हो सकती है तो केवल असम की। असम समझौता 1985 के तहत भारत सरकार ने यह आश्वासन दिया था कि वह असम के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषाई पहचान और विरासत को संरक्षित एवं प्रोत्साहित करेगी।

असम के लोग चिंतित हैं कि उनकी संख्या घटती जा रही है। 1991 में असमिया भाषा बोलने वालों का प्रतिशत 57.8 था। वह 2001 में गिरकर 47.8 हो गया। वहीं बांग्लाभाषियों की संख्या 21.7 से बढ़कर 27.5 प्रतिशत हो गई। असम की तार्किक आपत्ति को देखते हुए उचित होगा सरकार शरणार्थियों का पुनर्वास पूर्वोत्तर राज्यों के अलाव अन्य ऐसे राज्यों में करे, जिन्हें इस पर आपत्ति न हो और जो अतिरिक्त आबादी लेने की स्थिति में हो। सीएए विरोध का आधार या तो अज्ञानता है या राजनीतिक पूर्वाग्रह। जहां तक एनआरसी की बात है तो सरकार उस पर पुनर्विचार कर सकती है। वह यह भी कह सकती है कि एनआरसी वहीं लागू किया जाएगा जहां इसे राज्य सरकारों का समर्थन प्राप्त होगा। इससे विरोध की हवा निकल जाएगी।

 

(लेखक उत्तर प्रदेश और असम के पुलिस महानिदेशक रह चुके हैं)

Posted By: Dhyanendra Singh

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