मनीष तिवारी। CAA Protest: नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए पर हिंसक प्रदर्शनों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के आसपास दर्जनों बसों में आग लगाई गई, एएमयू में आगजनी के साथ ही कैंपस के भीतर से बम फेंकने की खबरें आईं, बंगाल में तोड़फोड़ करने वालों ने हदें पार कर दीं, बिहार में भी उपद्रवियों ने मनमानी की। इसी तरह की आगजनी-तोड़फोड़ अन्य क्षेत्रों में भी हुई। पूरे घटनाक्रम में नया अनोखा कुछ भी नहीं है। विरोध के नाम पर हिंसा और सब कुछ मिटा देने की चाहत के किस्से पुराने हैं।

सीएए के विरोधियों ने बस ऐसा ही एक और अध्याय रचा है, जिसमें नेताओं की शह है और अधिकारों की वकालत करने वाले संगठनों की ढाल। जो लोग यह मान चुके हैं कि अपने देश की नियति ही यह है कि कभी फिल्म के नाम पर, कभी आस्था के नाम पर, कभी आरक्षण की मांग पर, कभी किसानों की चिंता के नाम पर दुकानें फूंकीजाएं और कोर्ट-सरकारें तमाशा देखती रहें, उनके लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ और सोचने का मौका दिया है। एक दिन खबर आई कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा- ‘हम उपद्रवियों से नुकसान की वसूली करेंगे। यह वसूली उनकी संपत्ति नीलाम करके की जाएगी।’ योगी तेजतर्रार नेता हैं। ऐसे संबोधनों के लिए ही जाने जाते हैं। एक सामान्य सवाल यह था कि क्या राजनीतिक बाध्यताएं ऐसी किसी वसूली की राह नहीं रोकेंगी? जब बिजनौर में एक समूह ने अपनी तरफ से नौ लाख रुपये का चेक प्रशासन को सौंपा तो यह मुख्यमंत्री राहत कोष में दी जाने वाली सहायता राशि नहीं थी।

दरअसल नुकसान का प्रशासनिक आकलन भी लगभग इतना ही था। यानी क्षति की पहली वसूली। खबर सुर्खियां बनीं। अब पूरे प्रदेश में सात दिनों के अल्टीमेटम के साथ ऐसे ही नोटिस तमाम अन्य जगहों पर भी दिए गए हैं। अल्टीमेटम का वक्त गुरुवार को ही बीता है। जाहिर है, पता चलेगा कि उपद्रव और तोड़फोड़ क्या वाकई महंगा पड़ेगा? इसके बाद अदालतें भी यह देख सकती हैं कि इस प्रकरण में कानूनी स्थिति क्या है, प्रशासन के अधिकार क्या हैं, वसूली का तरीका क्या होना चाहिए? विरोध और प्रदर्शन के लिए लोगों के अधिकारों की क्या सीमा है? वैसे कोर्ट के संभावित रुख को जानने की दिलचस्पी हो तो इलाहाबाद हाई कोर्ट की इस टिप्पणी पर ध्यान दिया जा सकता है, जिसमें कहा गया है कि विरोध ऐसा नहीं हो सकता जो किसी के अधिकारों को बाधित करे। सरकारी बसें लोगों का अधिकार हैं। इन्हें जलाने का हक किसी को नहीं है।

हाई कोर्ट एएमयू में हुई हिंसा पर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। कोर्ट ने इसमें दखल देने से इन्कार कर दिया और योगी सरकार की कार्रवाई को एक तरह से सही ठहराया। जिन लोगों ने सीएए के विरोध के नाम पर पुलिस चौकी जला दी गई, वे हाई कोर्ट के रुख से सूत्र ग्रहण कर सकते हैं- इसलिए और भी, क्योंकि आरक्षण की तमाम मांगों के दौरान हुई हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट इससे कहीं ज्यादा सख्त रुख दिखा चुका है। सीएए पर जब तमाम याचिकाएं शीर्ष अदालत पहुंचीं तब भी यही संदेश दिया गया कि पहले हिंसा रुके, उसके बाद ही होगी सुनवाई। सड़कों पर मनमानी और अदालतों में अधिकारों की दुहाई ठीक नहीं है। जिन्हें सबसे अधिक अधिकारों की चिंता है, जो कुछ कानूनी प्रावधानों के कारण देश के सेक्युलर ढांचे को कथित तौर पर संकट में पा रहे हैं, अभिव्यक्ति की आजादी का ढोल पीट रहे हैं वे यह समझने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं कि हिंसक प्रदर्शन, तोड़फोड़, उपद्रव, बंद और विश्वविद्यालयों में पठन-पाठन का माहौल ठप करके वे खुद अधिकांश आबादी के अधिकारों का हनन कर रहे हैं।

अब आगे क्या...

नुकसान की वसूली के लिए जारी नोटिस पर प्रशासनिक सक्रियता आगे बढ़े। वे उपद्रवी प्रशासन द्वारा बताई गई राशि भरने के लिए मजबूर हों जिन्होंने कानून हाथ में लेने और सड़कों पर अराजकता दिखाने में कसर नहीं की। नोटिस के खिलाफ लोग अदालतों का रुख करें और उन्हें फौरी राहत मिले। प्रशासन को अपने पैर पीछे खींचने पड़ें। राजनीतिक दलों को इसमें सियासत करने का मौका मिले और वे यह वादा करने लगें कि अगर उनकी सरकार आई तो यह सब पैसा वापस किया जाएगा। कुछ भी हो, योगी सरकार ने एक ऐसी पहल की है जो अब तक नहीं हुई। यही रास्ता है जो सड़कों पर दिखाई जाने वाली अराजकता को थाम सकता है।

एक प्रसंग यह भी...

पिछले दिनों ही यह खबर भी आई कि सोनभद्र में 17 जुलाई को जमीन के एक विवाद में 11 आदिवासियों की हत्या के मामले में लापरवाही बरतने के लिए पांच पुलिसकर्मियों पर जुर्माना लगाया गया है। यह जुर्माना तीस दिन का वेतन होगा। प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करने के लिहाज से यह एक दुर्लभ मामला है। अगर ऐसे ही जवाबदेही तय की जाने लगी तो यकीन मानिए कि अपने यहां सिस्टम में बहुत कुछ दुरुस्त हो जाएगा। प्रशासनिक सुधार के लिए कई आयोगों ने अपनी रिपोर्टें दी हैं, बातें तमाम हुई हैं, लेकिन जब भी बात जवाबदेही की आती है तो सरकारें पीछे हट जाती हैं। नौकरशाही और खासकर पुलिस को भी राजनीतिक संरक्षण भाता है। योगी की सरकार अगर जवाबदेही की दिशा में आगे बढ़ती है तो वह एक नजीर हो सकती है। बस कोई यह तय करे कि कार्रवाई पॉलिटिकल करेक्टनेस के जुमले की आंच से बची हुई हो।

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