डॉ. महेश भारद्वाज। कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के उद्देश्य से राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के जरिये देश भर में 25 मार्च से कई तरह की पाबंदियां लगाई गई थीं। करीब पांच-छह सप्ताह के बाद इन पाबंदियों को चरणबद्ध रूप से खत्म करने की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे बहुत सी पाबंदियां खत्म कर दी गईं, लेकिन कुछ पाबंदियों को जरूरत के हिसाब से अभी भी जारी रखा गया है। वैसे तो ये पाबंदियां हमारे लिए एकदम से नई नहीं थीं, क्योंकि दुनिया के बहुत सारे कोरोना प्रभावित देश हमसे पहले इस तरह की पाबंदियां अपने यहां लगा चुके थे और मीडिया के प्रसार के साथ इंटरनेट सूचना के युग में हम सबको इसकी जानकारी मिल रही थी।

लेकिन करीब 135 करोड़ की आबादी वाले विशाल मुल्क में इस पैमाने पर देशव्यापी लॉकडाउन लगाना और उनकी अनुपालन कराना पाश्चात्य मुल्कों के मुकाबले बहुत ही मुश्किल काम था। देश की वर्तमान पीढ़ी के लिए तो इस तरह की पाबंदियां बिल्कुल नई चीज थीं। जहां तक बात वर्ष 1975-77 के बीच लागू रहे आपातकाल और फिर सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था की दृष्टि से देश के कुछ हिस्सों में यदा-कदा लगाई गई पाबंदियों आदि का सवाल है तो उनकी इस लॉकडाउन के दौरान लगाई गई एहतियातन बंदिशों से तुलना नहीं करनी चाहिए। इसका कारण यह है कि ये पाबंदियां सरकार ने हमारी अपनी जान बचाने के लिए लगाई थीं और इनका सीधा संबंध हमारे जीवन को सुरक्षित बनाए रखने से था।

सरकार को शायद इस बात का अंदाजा रहा होगा कि मजदूरों तथा कामगारों के समक्ष सबसे ज्यादा समस्या आ सकती है, लिहाजा उसने पहले ही यह कहा था कि जो भी व्यक्ति जहां है, वहीं पर रहे और लॉकडाउन के नियमों का पालन करे। इस बीच सरकार ने उन सभी के लिए भोजन आदि की व्यवस्था भी शुरू की। लेकिन व्यापक संख्या में मजदूर तथा कामगार अपने-अपने कार्यस्थलों से अपने गांवों की ओर जैसे-तैसे रवाना हो गए। इसके लिए जैसा कि अक्सर होता है, लोगों ने सरकार की ओर से की गई व्यवस्थाओं को तो जिम्मेदार ठहरा दिया, लेकिन बहुत कम लोगों का ध्यान उन परिस्थितियों की ओर गया, जिनकी वजह से ये कामगार अपने कार्यस्थलों से अपने गांवों की ओर चल पड़े थे।

जब सरकार की ओर से साफ-साफ निर्देश थे कि लॉकडाउन के दौरान इनके नियोक्ता इनको वेतन देना जारी रखेंगे, मकान मालिक किराया नहीं लेंगे और सरकार द्वारा इनके राशन की समुचित व्यवस्था की जाएगी तो फिर जिनकी यह जिम्मेदारी बनती थी, उन्होंने मानवजाति के लिए खतरा बनकर उभरे इस संकट के समय भी अमानवीय बर्ताव क्यों किया। यदि यह मान भी लिया जाए कि महामारी के खौफ के चलते कामगारों का अपने गांव जाने का फैसला भावनात्मक अधिक था तो भी इस स्तर के पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता था। विडंबना यह भी है कि इस स्थिति के लिए ज्यादा जिम्मेदार वे लोग हैं, जो इन कामगारों से बेहतर समझ और संसाधन रखते थे और इसलिए उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे इन्हें नौकरी और मकानों से निकालने से पहले सरकारी दिशा-निर्देशों के अलावा इनकी मानवीय पीड़ा को भी समङोंगे। उनसे विपरीत काम करने की उम्मीद तो बिल्कुल भी नहीं थी। लेकिन ऐसा हुआ भी और फिर सारा दोष सरकार के मत्थे मढ़ने के प्रयास भी हुए। आज जब फिर से काम शुरू किया जा रहा है तो इन्हीं लोगों के लिए कामगारों की वापसी का मुद्दा ज्यादा बड़ी चुनौती बनकर सामने आ खड़ा हुआ है। कामगारों की कमी के चलते इनके हाथ-पैर फूले हुए हैं।

यहां बात उन लोगों की भी कर लेनी चाहिए जो पहले तो लॉकडाउन लगाए जाने के फैसले को ही ठीक नहीं मान रहे थे और जब लग ही गया तो इसकी पाबंदियों को हटाने की मांग करने लगे थे। इन्हें यह क्यों नहीं समझ आया कि लॉकडाउन से सबसे ज्यादा परेशानी और आíथक नुकसान सरकार को ही हुआ है। भला इससे सरकार को क्या फायदा हो सकता है? एतराज करने वालों को यह क्यों समझ नहीं आया कि सरकार ने दुकान, मॉल, बाजार, फैक्टरी, कार्यालय, रेल, बस, हवाई जहाज इत्यादि को बंद करने का फैसला ‘जान है तो जहान है’ के वृहद ध्येय के मद्देनजर लिया था। किसी भी संवेदनशील सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने लोगों की जान को सलामत रखने की ही तो होती है, न कि आíथक लाभ-हानि की। इसलिए बड़ा आíथक नुकसान सामने देखकर भी लोगों की जान बचाने के उद्देश्य से सरकार ने ये पाबंदियां लगाई थीं।

वैसे तो ये बातें सामान्य समझ की हैं, लेकिन पता नहीं किन कारणों से कुछ लोगों ने इनको पेचीदा बनाने की कोशिश की। माना कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के सुख-दुख की जिम्मेदारी व्यापक रूप से सरकार की होती है। लेकिन हर बात के लिए सरकार की ओर टकटकी लगाना कहां तक ठीक है, इस मानसिकता के बारे में भी तो विचार होना चाहिए। संविधान के भाग तीन में वíणत अधिकारों की बात तो सब करते हैं। लेकिन राष्ट्र के प्रति जिन कर्तव्यों की व्याख्या भाग चार अ में की गई है, उनके बारे में भी तो उतनी ही गंभीरता से बात होनी चाहिए। असल में ऐसी विपत्तियों के समय ही तो जनता के राष्ट्रीय चरित्र की परख होती है और जब राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास रखने वाले लोग स्वेच्छा से तन, मन और धन से समाज और सरकार का साथ देने लगते हैं तो ऐसी स्थितियों से निकल पाना भी आसान हो जाता है।

देश की संसद ने अपने सदस्यों के वेतन में कटौती करके बाकी लोगों के सम्मुख नजीर पेश की है जिसके बाद चारों और से ऐसी कटौती और योगदान की पेशकश भी होने लगी है। अतएव संकट की इस घड़ी में सरकार के कामकाज पर टिप्पणी करने के बजाय हम सबको सरकार के हाथ मजबूत करने और उसका हाथ बंटाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

[भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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