[ डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव ]: इतिहास में पहली बार पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चीन लगभग सभी पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद में उलझा हुआ है। कोरोना महामारी में उसकी संदेहास्पद भूमिका के कारण कई देशों ने उससे एक अघोषित दूरी बनानी शुरू कर दी है, जिसके कारण चीनी अर्थव्यवस्था संकट के दौर में है। इस सबके बीच चीन अपने आंतरिक मामलों में भी कई मोर्चों पर एक साथ जूझ रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग अपनी आक्रामक नीतियों के चलते न सिर्फ वैश्विक, बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी संकट में घिरते जा रहे हैं। कई महीनों से हांगकांग में चल रहे लोकतांत्रिक आंदोलन ने वैश्विक स्तर पर चीन के लिए संकट खड़ा कर दिया है। नए सुरक्षा एवं प्रत्यर्पण कानून के खिलाफ हांगकांग में चल रहे लोकतांत्रिक आंदोलन को चीन ने बड़ी क्रूरता से दबाने का प्रयास किया।

चिनफिंग के तानाशाही रवैये ने हांगकांग की संप्रभुता पर किया आक्रमण

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत हांगकांग एक अलग राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था के साथ विकसित हुआ था। 1997 की संधि के अनुसार 2047 तक वह अपनी वर्तमान स्थिति-एक देश दो व्यवस्था-के तहत ही रहता, परंतु शी चिनफिंग के तानाशाही रवैये ने उसकी संप्रभुता पर आक्रमण कर दिया। तिब्बत एवं शिनजियांग प्रांत में रह रहे गैर-हान अल्पसंख्यकों के साथ अमानवीय व्यवहार ने भी चीन के अलोकतांत्रिक चरित्र को उजागर किया है। चीनी सरकार एक सुनियोजित तरीके से तिब्बत के बौद्ध समुदाय तथा शिनजियांग के उइगर मुसलमानों की पहचान और संस्कृति समाप्त करने की नीति पर काम कर रही है, जिस पर विश्व के कई देशों ने अपनी आपत्ति दर्ज की है। इस क्षेत्र के लोग भी चीन सरकार का विरोध कर रहे हैं।

तिब्बत में उठ रही आजादी की मांग आंतरिक आक्रोश को दे रही बढ़ावा

तिब्बत में उठ रही आजादी की मांग आंतरिक आक्रोश को बढ़ावा दे रही है, जिससे चीन की वन चाइना पॉलिसी पर गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है। ताइवान के प्रति भी चीन का आक्रामक रवैया विश्व समुदाय का ध्यान खींच रहा है। इसके अलावा चीन ने अपनी भाषा नीति से अपने यहां के मंगोल समुदाय को क्षुब्ध कर दिया है। यह समुदाय अपनी भाषा के दमन के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहा है। भले ही चीन खुद को महाशक्ति के तौर पर पेश कर रहा हो, लेकिन वहां आई हालिया बाढ़ ने उसके महाशक्ति होने के दावे पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। बाढ़ ने न सिर्फ खाद्यान्न संकट खड़ा किया, बल्कि पारिस्थितिकी के मुद्दे पर भी नई बहस को जन्म दे दिया है।

विश्व का सबसे बड़ा खाद्यान्न आयातक देश में खाद्यान्न संकट

चीनी विशेषज्ञों की हालिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि थ्री जार्जेस डैम यानी तीन दर्रों के बांध के कारण ही बाढ़ की विभीषिका आई और उससे खाद्यान्न संकट की स्थिति उत्पन्न हुई। ध्यान रहे कि चीन विश्व का सबसे बड़ा खाद्यान्न आयातक देश है। शी चिनफिंग आजकल अपने नागरिकों से खाद्य पदार्थों को बर्बाद न करने की अपील कर रहे हैं। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने जून में एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें बताया गया था कि ब्राजील, कनाडा, थाइलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, रूस एवं अन्य प्रमुख अन्न उत्पादकों ने स्वयं के स्टॉक को सुरक्षित रखने के लिए गेहूं, सोयाबीन और चावल सहित सभी प्रकार के निर्यात में कटौती की है। इसका असर चीन पर पड़ा है।

अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध के कारण चीन का विदेशी मुद्रा भंडार कम होता जा रहा

बीजिंग इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के अर्थशास्त्री हू शिंदोउ ने लिखा है कि अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध के कारण चीन का विदेशी मुद्रा भंडार कम होता जा रहा है। ऐसे में वह अपने देश के 1.4 अरब लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन की व्यवस्था कैसे करेगा? कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था में आई शिथिलता ने भी चीन को आंतरिक रूप से परेशान किया है। बीजिंग अपने नागरिकों से आग्रह कर रहा है कि वे कोविड-19 के कारण आई आर्थिक गिरावट को देखते हुए देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए अधिक से अधिक खर्च करें और यात्रा करें। हालांकि बीजिंग स्थित एक वित्तीय फर्म द्वारा किए गए सर्वेक्षण में लगभग 65 प्रतिशत लोगों ने यह बताया कि कोरोना कहर के बाद उन्होंने अपने खर्च करने की आदतों को संयमित करने की योजना बनाई है। चीन में कई स्टोर एवं दुकानें बंद हो रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन के प्रति भरोसे में कमी आई है। कई देशों द्वारा चीनी परियोजनाओं को बंद किया जा रहा है। उनके मोबाइल एप्स को प्रतिबंधित करना भी लगातार जारी है।

भारत के साथ सीमा विवाद ने चीन-संबंधों को सबसे खराब दौर में पहुंचा दिया

कोरोना काल में चीन ने अपने पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद को भी हवा दी है। 2017 के डोकलाम विवाद के बाद लद्दाख में भारत के साथ सीमा विवाद ने भारत चीन-संबंधों को सबसे खराब दौर में पहुंचा दिया है। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर और सेनकाकू द्वीप में चीन की विस्तारवादी नीति के कारण उस क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल उत्पन्न हुआ है। चीन नाइन डैश लाइन के अंदर जल सीमा में अपनी विस्तारवादी नीति के तहत उस पर अपनी संप्रभुता का दावा कर रहा है, जिससे कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की जलीय सीमा का अतिक्रमण हो रहा है। दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता को रोकने के लिए अमेरिका ने अपने जंगी बेड़ों को इस क्षेत्र में खड़ा किया। भारत-जापान-अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया यानी क्वॉड द्वारा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य सहयोग को विस्तृत करना चीन के लिए कड़ा संदेश है। 

चीन की विस्तारवादी नीति के कारण ब्रिटेन के पीएम ने डी-10 संगठन बनाने का किया आह्वान 

वहीं कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर विश्व के कई देश अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग कर चुके हैं, परंतु चीन द्वारा लगातार जांच के लिए मना करना संदेह को और गहरा रहा है। चीन की विस्तारवादी नीति के कारण ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने विश्व के दस बड़े लोकतांत्रिक देशों को साथ आकर डी-10 संगठन बनाने का आह्वान किया है। इन सब घटनाओं के बीच बीते दिनों संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद के सदस्यों के चुनाव में भारत ने चीन को कूटनीतिक स्तर पर करारी शिकस्त दी। 54 सदस्यों वाले इस संगठन में चीन को आधे वोट भी नहीं मिले। यूरोप में चीन के महत्वपूर्ण सहयोगी जर्मनी ने भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को झटका दिया है। कुल मिलाकर यदि चीन ने अपनी आक्रामकता नहीं छोड़ी तो आने वाले दिनों में उसकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

( लेखक जेएनयू में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं )

[ लेखक के निजी विचार हैं ]

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