अभिषेक कुमार सिंह। युद्ध के बारे में एक पुराना सर्वमान्य सिद्धांत यह कहता है कि असली जीत वह होती है, जो वास्तविक जंग लड़े बिना जीत ली जाती है। इस नजरिये से देखें तो जून 2020 में लद्दाख की गलवन घाटी में हुई मुठभेड़ में भारत के हाथों मुंह की खाने और भारत के मुकाबले दो गुना अधिक सैनिकों की जान गंवाने के बाद से चीन लगातार ऐसी कोशिशों में लगा है, जिससे वह भारत पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बना सके। इसके लिए कभी वह दुष्प्रचार फैलाने वाले अपने अखबार-ग्लोबल टाइम्स में चीनी सैनिक साजोसामान की झूठी तारीफ छाप रहा है, तो कभी लद्दाख में तैनात भारतीय सैनिकों को खराब भोजन देने का झूठ प्रचारित कर रहा है।

सूचना के इस युद्ध में वह दो हाथ बढ़कर जासूसी की कोशिशों में भी लगा है, जिसका खुलासा हाल में दो घटनाओं से हुआ है। पहली घटना एक टेक्नोलॉजी कंपनी के माध्यम से चीन की सरकार द्वारा भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, सांसदों, विधायकों, सेना प्रमुखों, खिलाड़ियों, उद्यमियों समेत हमारे देश के 10 हजार लोगों की निगरानी की है। दूसरी घटना चीनी खुफिया एजेंसी के लिए भारत स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार के अलावा एक चीनी महिला और नेपाली नागरिक द्वारा काम करने से संबंधित है, जिन्हें हाल में पकड़ा गया है।

चीनी और नेपाली नागरिक दो शेल (मुखौटा) कंपनियों की आड़ में जासूसी में संलग्न थे, जबकि पकड़े गए स्वतंत्र पत्रकार पर आरोप है कि वह उनकी मार्फत चीन के इंटेलिजेंस अफसरों को भारतीय सेना और रक्षा से जुड़े दस्तावेज भेजता था। यह घटना इसकी पुष्टि करती है कि चीन का खुफिया तंत्र हमारे देश में किस हद तक सक्रिय रहा है। निश्चित ही चीन की ये हरकतें बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं। इसी वजह से ये गिरफ्तारियां हुई हैं। सवाल है कि इस तरह की डिजिटल निगरानी या जासूसी करके चीन क्या हासिल कर पाता है और क्या चीन की भी ऐसी जवाबी डिजिटल जासूसी मुमकिन है? ताकि वहां शासन-प्रशासन के स्तर पर चल रही गतिविधियों की हमें भी सूचना मिल सके। यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि आखिर चीन ऐसा कैसे कर पा रहा था?

जहां तक चीन की ओर से छेड़े गए डिजिटल सूचना युद्ध की बात है, तो इसे खुद चीन ने ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ का नाम दिया है। दुनिया भर के अखबारों में इस डिजिटल जासूसी का खुलासा करते हुए बताया गया है कि विश्व की अहम हस्तियों से लेकर 25-35 लाख लोगों की गतिविधियां चीन की सरकार और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी जेनहुआ डाटा इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी नामक इस कंपनी की निगाह में थीं। इस हाइब्रिड वॉरफेयर के विस्तार का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इसमें राजनीति, कानून, खेल, फिल्म, उद्योग जगत की प्रभावशाली हस्तियों के अलावा देश के सभी क्षेत्रों के अहम लोगों और संस्थाओं पर नजर रखी जा रही थी।

साथ ही आर्थिक अपराध, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, ड्रग्स, सोना, हथियार या वन्यजीव तस्करी के सैकड़ों आरोपियों का भी पूरा डाटाबेस जुटाया जा रहा था। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जब भारत समेत पूरी दुनिया में चीनी कंपनियों के बनाए गए मोबाइल हैंडसेट, मोबाइल एप्स और दूरसंचार के उपकरणों को जासूसी के संदेह में प्रतिबंधित किया जा रहा है, तो चीन ने दूसरे रास्ते से जासूसी के प्रबंध कर लिए।

वैसे दावा है कि चीनी सरकार के कहने पर ही इस कंपनी ने पूरी दुनिया में डिजिटल जासूसी का जाल फैलाया था। आज की तारीख में जब सूचनाएं बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं और डाटा के जरिये बड़े-बड़े उद्देश्य हासिल किए जा रहे हैं, तब यह कहा जा सकता है कि भारत समेत दुनिया के विभिन्न देशों के लाखों लोगों की सूचनाएं जुटाकर चीन नए किस्म का सूचना युद्ध छेड़ना चाहता है। उल्लेखनीय है कि इस चीनी कंपनी ने घोषित तौर पर अपना उद्देश्य इस तरह के डाटा जुटाकर ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ का मकसद हासिल करना बताया है।

‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ शब्द से कई तरह के युद्ध साजोसामान होने का अहसास होता है, लेकिन इस चीनी कंपनी के संदर्भ में इसका उद्देश्य असैन्य तरीकों से किसी देश पर प्रभुत्व हासिल करना या उसे नुकसान पहुंचाना है। इस तरह के वॉरफेयर में कंपनी जिन लोगों और देशों की निगरानी कर रही थी, वह उनके समूचे ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ की जानकारी जुटा रही थी। इसका आशय उन व्यक्तियों की हर तरह की जानकारी है, जो इंटरनेट पर मौजूद होती है। उल्लेखनीय है कि कंपनी यह जानकारी भी इकट्ठा करती रही है कि इन लोगों और संगठनों के किन दूसरे लोगों और संगठनों के साथ संबंध हैं।

यह उन लोगों से संबंधित जगहों और उनकी आवाजाही संबंधी जानकारी भी जुटा रही थी। नियमित तौर पर इन सूचनाओं की निगरानी करते हुए यह कंपनी एक विशाल डाटाबेस तैयार कर रही थी, ताकि चीन सरकार के मांगने पर संबंधित व्यक्तियों या देशों से जुड़ी हरेक सूचना तुरंत मुहैया कराई जा सके। यह सारा कामकाज असल में लोगों और देशों की डिजिटल प्रोफाइलिंग से जुड़ा है, जिसकी मदद से उन लोगों और देशों को नुकसान पहुंचाने वाले उपाय किए जा सकते हैं और यही इस डिजिटल जासूसी का सबसे खतरनाक पहलू है।

यह भी उल्लेखनीय है कि कोई दूसरा देश चीन की सरकार और वहां के लोगों की गतिविधियों की सूचनाएं यानी डिजिटल फुटप्रिंट हासिल न कर सके, इसके लिए चीनी सरकार ने गूगल, फेसबुक और ट्विटर जैसी वेबसाइटों को या तो अपने यहां चलने ही नहीं दिया या चीन के लिए उनके सेंसर्ड संस्करण तैयार करवाए या उनके विकल्प ही अपने यहां तैयार करवा लिए। इनका परोक्ष फायदा यह भी है कि चीन में बैठकर विदेशी नागरिक भी आसानी से खुफिया सूचनाएं बाहर नहीं भेज सकते, लेकिन जब बात चीनी जासूसी के प्रपंच का मुकाबला करने की आती है, तो कई मुश्किलें हमारे सामने आ खड़ी होती हैं।

असल में, पहली समस्या तो यही है कि बाकी दुनिया समेत भारत भी इसका अंदाजा नहीं लगा पाया है कि चीनी दूरसंचार कंपनियां हमारे नागरिकों की हर डिजिटल गतिविधियों को न केवल दर्ज करती रही हैं, बल्कि वे सूचनाएं चीन की सरकार को मुहैया कराती रही हैं। दूसरी समस्या यह है कि जिस तरह चीन ने साइबर जगत को गुप्तचरी और निगरानी के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया है, न तो उसका तोड़ किसी देश के पास है और न ही कोई देश चीन की उसी तरह की निगरानी करने में सक्षम है।

ऐसे में अब ज्यादा अच्छा यही है कि हम अपनी सूचनाओं की रक्षा स्वयं करें। हालांकि इस मोर्चे पर हमारी तैयारियों का स्तर हाल में देश की सबसे बड़ी डाटा एजेंसी राष्ट्रीय सूचना केंद्र (एनआइसी) पर हुए साइबर हमले से पता चला, जहां डिजिटल सेंधमारी के जरिये प्रधानमंत्री और अनेक महत्वपूर्ण हस्तियों की सूचनाओं के अलावा राष्ट्रहित की कई जानकारियां उड़ा ली गईं।

इसके लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि एक तरफ हर किस्म की सूचनाओं की सुरक्षा को पुख्ता किया जाए, तो दूसरी तरफ मोबाइल समेत अन्य दूरसंचार उपकरण और एप्स बनाने वाली कंपनियों को भारत में तभी कामकाज करने की छूट मिले, जब वे यह सुनिश्चित करें कि उनके सर्वर भारत से बाहर स्थित नहीं होंगे। ऐसा करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि अभी यह नहीं पता चल पाता है कि इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले भारतीय नागरिकों का डाटा कहां जमा होता है और उसकी कोई चोरी तो नहीं कर रहा है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इंटरनेट कंपनियां मांगे जाने पर जमा की गईं सभी डिजिटल सूचनाएं सरकार को मुहैया कराएंगी। हालांकि इसमें नागरिकों की निजता का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है, लेकिन इसका एक उपाय यह है कि निजता को अक्षुण्ण रखने के कानून असरदार ढंग से देश में लागू किए जाएं।

जब बैन लगा भारत में 

इस प्रसंग में जो बात सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है, वह यह है कि चीन की ओर से की जा रही इस डिजिटल जासूसी की धरपकड़ तब हुई है, जब भारत ने चीनी कंपनियों के करीब 225 मोबाइल एप्स पर प्रतिबंध लगाया और चीन के मोबाइल हैंडसेट निर्माताओं के खिलाफ देश में एक लहर उठी। यही नहीं, भारतीय सेना के अधिकारियों और सैनिकों से चीन निर्मित मोबाइल हैंडसेट के इस्तेमाल में सावधानी बरतने और उनके एप्स मोबाइल से हटाने के निर्देश भी पिछले कुछ समय में दिए गए हैं। चूंकि इन सारी पाबंदियों के कारण चीनी सरकार की हमारी सूचनाओं तक पहुंच मुश्किल हो गई, इसलिए हाइब्रिड वॉर के लिए दूसरे रास्ते चीन ने निकाल लिए। 

इस डिजिटल चोरी का मकसद सूचनाओं को तोड़मरोड़ कर उनका इस्तेमाल अपने हित में करना है। यह इससे साफ होता है कि सूचनाएं चुरा रही चीनी कंपनी ने खुद इस प्रोग्राम का नाम ‘इन्फॉर्मेशन पलूशन, परसेप्शन मैनेजमेंट एंड प्रोपेगंडा’ रखा था। अप्रैल 2018 में कायम हुई इस कंपनी ने दर्जनों देशों एवं क्षेत्रों में डाटा के संसाधन के लिए 20 प्रोसेसिंग सेंटर स्थापित किए और चीनी सरकार और वहां की सेना को अपना मुख्य ग्राहक घोषित कर दिया। उसके लिए ऐसा करना जरूरी था, क्योंकि चीन ने इसके कानूनी प्रबंध कर रखे हैं।

एक सूचना के मुताबिक चीन ने वर्ष 2017 में ‘नेशनल इंटेलिजेंस लॉ’ लागू किया था, जिसके अनुछेद 7 और 14 में यह प्रावधान है कि जरूरत पड़ने पर चीन की सभी संस्थाओं, कंपनियों और नागरिकों को सरकारी गुप्तचर एजेंसियों के लिए काम करना पड़ सकता है। यही वजह है कि हुआवे जैसी दूरसंचार कंपनी को अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों में शक की निगाह से देखा जाता है, क्योंकि चीनी कानून से बंधे होने के कारण उसे अपने ग्राहकों-उपभोक्ताओं की गतिविधियों की सारी सूचनाएं चीनी सरकार से साझा करनी पड़ती हैं।

संभवत: इसी कारण कई कंपनियां चीन से अपना कोई संबंध होने से इन्कार करने लगी हैं, क्योंकि उन्हें इसका अहसास हो गया है कि चीन में पंजीकृत और चीन स्थित कंपनियों को चीन के इंटेलिजेंस कानून के प्रावधानों के कारण पूरे विश्व में शक की निगाह से देखा जाने लगा है। इतना ही नहीं, अमेरिका आदि देशों में तो चीन के शोधकर्ताओं तक को संदिग्ध की तरह देखा जाने लगा है, क्योंकि कानून से बंधे होने के कारण बहुत संभव है कि वे बाहरी देशों में जाने पर वहां की सूचनाएं चीनी सरकार के साथ साझा करते हों।

(लेखक संस्था एफआइएस ग्लोबल से संबद्ध हैं)

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