वाइ एस बिष्ट। India China Border Tension: लद्दाख में भारतीय जमीन पर कब्जा करने की कोशिश में लगे चीन को अपने कदम पीछे हटाने पड़े हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हजारों सैनिकों की तैनाती के बाद अपने मंसूबों में कामयाबी नहीं मिलने पर चीनी सेना करीब दो किमी पीछे हट गई है। लद्दाख समेत भारतीय सीमा के सभी प्रमुख स्थानों पर चीन धीरे-धीरे आगे बढ़ने की रणनीति पर काम कर रहा था। चीन को डोकलाम की तरह इस बार भी उम्मीद थी कि वह भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लेगा, लेकिन तीन प्रमुख कारणों से इस बार ऐसा होता नहीं दिख रहा।

चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच झड़प : पहला, भारतीय सेना अपनी ओर से जोरदार जवाबी तैयारी कर रही है। लद्दाख में बीते माह चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। गलवान और प्योंगयांग लेक के पास एलएसी पर चीन ने आक्रामकता दिखाई और दबाव की रणनीति के तहत अपने सैनिक बढ़ाने शुरू कर दिए। जवाब में भारत ने भी एलएसी पर अपने सैनिक बढ़ा दिए और चीन की बराबरी में हथियार, टैंक और युद्धक वाहनों को भी इलाके में तैनात कर दिया। इसके बावजूद भारत ने दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता भी खुला रखा।

चीन की अर्थव्यवस्था भीषण मंदी के दौर से गुजर रही : दूसरा कारण चीन का आंतरिक संकट है। कोरोना वायरस की वजह से चीन की अर्थव्यवस्था भीषण मंदी के दौर से गुजर रही है। चीन से निर्यात कम हो गया है, इससे वहां के नागरिकों में बेरोजगारी और असंतोष बढ़ रहा है। इसे दबाने के लिए चीनी नेतृत्व राष्ट्रवाद का कार्ड खेल रहा है और भारत के लद्दाख क्षेत्र में अपनी सेना भेजकर अपने देश के नागरिकों को वह राष्ट्रवाद के नाम पर भारत के खिलाफ भड़का रहा है। दूसरी ओर वह अमेरिका की वजह से ताइवान और साउथ चाइना सी में कुछ कर नहीं पा रहा है। इसके अलावा चीन ने अरबों डॉलर खर्च करके बेल्ट एंड रोड परियोजना शुरू की, लेकिन उससे उसे कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है, इससे भी वहां अंसतोष पैदा हो रहा है। तीसरा कारण चीन पर बढ़ता वैश्विक दबाव है। व्यापार के मुद्दे पर अमेरिका के साथ उसकी व्यापक जंग चल रही है।

चीन भारतीय बाजार को भी नहीं खोना चाहता : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के ताकतवर देशों के समूह जी-सात का विस्तार कर भारत को शामिल करने के संकेत दिए हैं। हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस संबंध में बातचीत भी की है और दोनों ने इसे सकारात्मक बताया है। यही नहीं जापान, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान जैसे देश चीन की विस्तारवादी नीति का लगातार विरोध कर रहे हैं। चौतरफा घिरा चीन इस समय दुनिया की सबसे बड़ी सेना रखने वाले भारत से युद्ध का खतरा मोल नहीं ले सकता है। चीन भारतीय बाजार को भी नहीं खोना चाहता है, इसी वजह से उसे लद्दाख में अपने रुख में नरमी लानी पड़ी है।

आश्वासनों की आड़ में विश्वासघात : अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो हमारे पड़ोसी सदाचरण के आश्वासनों की आड़ में विश्वासघात के लिए बदनाम रहे हैं। यह बात और है कि सीमाओं का अतिक्रमण करने की दशा में भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने समय समय पर अपना साहस प्रदर्शित करते हुए शत्रुओं को अपनी सीमा के बाहर कर दिया है। पाकिस्तान ने जब करगिल सेक्टर में अतिक्रमण किया था तब भारत को यह सबक मिला कि उसे सुनिश्चित करना होगा कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में कहीं भी खराब मौसम की आड़ में इस प्रकार की घुसपैठ फिर कभी न हो। उसके बाद की अनेक घटनाओं से भारत सरकार और हमारी सेना यह सबक सीखे कि किसी भी दशा में अपनी सीमा की सुरक्षा को सर्वापरि मानना है और उससे किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना है।

कुछ वर्ष पहले लद्दाख सेक्टर और सिक्किम सीमा पर फिंगर फीचर में चीनियों के अक्सर तथा खुल्लम-खुल्ला अतिक्रमण हुआ करते थे। उस समय लद्दाख में करीब बीस किमी भीतर तक घुस आने के बाद चीनी मांग कर रहे थे कि भारत को इस इलाके में अपनी रक्षा व्यवस्था को मजबूत नहीं करना चाहिए। चीनियों ने उस समय पुराने बंकरों को नष्ट कर दिया था और इस बात पर जोर दिया था कि इस इलाके में गश्ती दलों को आश्रय देने वाले टीन के ढांचों को भी भारत गिरा दे।

इसके अलावा इलाके पर नजर रखने के लिए भारतीय सेना द्वारा लगाए गए कैमरों को भी नष्ट कर दिया गया था और उनके टुकड़े भारतीय अधिकारियों को सौंप दिए गए थे। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि उस समय इलाके में भारत की स्थायी मौजूदगी नहीं थी। लेकिन अब भारत ने इन इलाकों में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर दी है। इस बीच दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों की बीते दिनों हुई बैठक में भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध चाहता है, लेकिन अगर कोई देश हमारी सीमाओं की ओर बुरी नजर से देखेगा तो उसे इसके बुरे परिणाम भुगतने होंगे।

-अडनी

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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