अमिय भूषण। चीन की ओर से नेपाल भले ही बीते दिनों काफी हद तक आश्वस्त नजर आ रहा था और उसका पूरा फोकस भारतीय सीमा पर लगा हुआ था, लेकिन चीन की विस्तारवाद की मंशा को नेपाल के नेतृत्व ने समय रहते भांप लिया और हाल ही में उस अनुरूप कदम उठाने का निर्णय भी लिया है। दरअसल चीन एक ओर विवादित नक्शे के मसले पर नेपाल को भारत से उलझा रहा था, वहीं दूसरी तरफ नेपाल में चीन अपने नापाक मंसूबों को कामयाब भी कर रहा था। इसकी पहली निशानी विश्व प्रसिद्ध एवरेस्ट पर देखी गई।

चीन की विस्तारवादी रणनीति : एवरेस्ट को जबरिया अपना हिस्सा बताने के बाद चीन की दूसरी चहलकदमी नेपाल के उत्तर पश्चिम के सुदूरवर्ती जिले गोरखा में भी देखी गई। चीन के खूनी पंजों की निशानी जाहिर करती तीसरी महत्वपूर्ण घटना हुमला जिले के लिमि उपकात्या से जुड़ा हालिया विवाद है। चीनी विश्वासघात की गवाही दे रही ये घटनाएं अपने आप में एक सिलसिला है। यह सब चीन की विस्तारवादी रणनीति पर आधारित है। यह पूरी तरह से धूल झोंको और विस्तार करो की रणनीति है।

सीमा पर खंभे गायब करने की साजिश : वर्ष 1961 में नेपाल के राजा महेंद्र के चीनी दौरे के वक्त चीन के राजनेता माओ और राजा महेंद्र के बीच सीमा को लेकर आपसी सहमति बनी थी। इस आधार पर सीमाई क्षेत्रों से जहां एक ओर भारतीय सैनिकों की वापसी हुई थी, वहीं कई स्थानों की पहचान कर पिलर खड़े किए गए थे। वर्ष 1989 में पता चला कि उनमें से कई खंभे गायब हो गए हैं। यह क्षेत्र ऊंचे ऊंचे पर्वत मालाओं से घिरा है, जहां उन दिनों दूर दूर तक किसी तरह का निर्माण कार्य नहीं हुआ था। बाद के वर्षो में चीन ने खंभों के गायब होने को आधार बनाकर इमारतों का निर्माण शुरू किया और आज जो यहां चीन की सेना द्वारा निíमत दर्जन भर ढांचा खड़ा किया हुआ दिख रहा है, उसका निर्माण चीन के राष्ट्राध्यक्ष शी चिनफिंग के नेपाल दौरे के बाद हुआ है।

तकनीक की मदद से भौगोलिक सीमांकन : हाल की घटना के बाद काठमांडू में बैठे नेपाली प्रबुद्ध जनों के एक तबके ने सरकार की चोरी को सामने लाते हुए सीमा पर कई खंभों का ब्यौरा जारी कर यहां का जीपीएस डाटा मांगा है। दरअसल आधुनिक तकनीक के युग में किसी भी स्थान का अक्षांश, देशांतर और ऊंचाई के आधार पर वहां से संबंधित अनेक जानकारियों को सटीक तौर पर हासिल किया जा सकता है। अभी तक नेपाल में चीन विरोधी प्रदर्शन छिटपुट और बिखरा हुआ था। किंतु पहली बार मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस के छात्र संगठन नेपाली विद्यार्थी संघ के कूदने और राष्ट्रीय एकता अभियान जैसे कई सारे अप्रचलित छोटे और नए संगठनों द्वारा देशभर में प्रदर्शनों द्वारा चीन के वास्तविक एजेंडे से नेपाली जनमानस को जगा दिया गया है।

स्थानीय समाज में चीन को लेकर बढ़ रही आशंका और वर्तमान की चीन समर्थक सरकार की मंशा पर उठे सवाल और आक्रोश के बाद से चीन द्वारा नेपाल में बनाए जाने वाले रेल की चर्चा आजकल सुर्खियों में है। वैसे तो नेपाल में रेल कोई नई बात नहीं है। औपनिवेशिक शासन के दौर में ही नेपाल में रेल आ चुकी थी। वर्ष 1927 में रक्सौल सिरसिया अमलेखगंज रेल पटरी पर 1965 तक ट्रेनें चला करती थीं। वहीं दूसरी महत्वपूर्ण रेल रूट 1937 में बनी जयनगर जनकपुर रूट थी जो बिजलपुर तक थी। इसे 2001 में ब्रॉडगेज में परिवर्तित करने के लिए बंद कर दिया गया। यह अब पूरी तरह से तैयार है और जल्द ही भारतीय रेल के सहयोग से इस रेलमार्ग पर परिचालन शुरू किया जा रहा है।

चीन ने काठमांडू तक रेल की चर्चा को फिर एक बार हवा दे दी : इस बीच नेपाल में अपनी छवि को चमकाने के लिहाज से चीन ने काठमांडू तक रेल की चर्चा को फिर एक बार हवा दे दी है। वैसे तो इस रेल की चर्चा नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली के 2016 में चीन दौरे पर उठी थी। तब उन्होंने चीन सरकार को इसका प्रस्ताव दिया था। वर्ष 2017 में एक चीनी प्रतिनिधिमंडल के नेपाल दौरे के बाद फिर 2018 में यह प्रस्ताव एक बार फिर से चर्चा में आया। आश्वासन समझौतों और सुíखयों में तो यह खूब रहा, किंतु इसके बावजूद जमीन पर अभी तक कुछ भी नहीं है। वैसे चीन अक्सर इस रेलवे का मुलम्मा तब तब देता रहा है, जब जब उसे नेपाल को मुद्दों से भटकाना और भारत से उलझाना या भारत को दबाव में लाना होता है।

नेपाल में चीनी रेल परिचालन की बात उस बहुप्रतीक्षित योजना का हिस्सा है जिसकी घोषणा चीन ने 2008 में ही की थी। इसमें तिब्बत की राजधानी ल्हासा से जोड़ते हुए नेपाल सीमा तक रेल लाना है। वैसे अगर नेपाल के लिए चीन से रेल संपर्क की बात करें तो यह अभी एक लुभावने ख्याल से कुछ अधिक नहीं है, क्योंकि अभी तिब्बत में सिगासे तक ही चीनी रेल पहुंची है, जिसे यहां से सागा तक करीब 400 किमी, फिर ताईको लेक तक करीब 100 किमी और फिर यहां से केरुंग तक करीब 175 किमी और रेल लाइन बिछाना होगा। अगर आगे की बात करें तो केरुंग से काठमांडू के बीच माला के निकट एक ऐसा भी स्थान है, जहां इस ट्रेन को दुर्गम चढ़ाई को पार करते हुए काठमांडू की ओर बढ़ना होगा। ऐसा निर्माण इंजीनियरिंग के लिए एक बड़ी चुनौती है। फिर धरती का यह हिस्सा खासे भूकंप प्रभावित क्षेत्र में आता है। ऐसे में सुरक्षा के क्या उपाय हैं? वहीं अगर भारतीय सहयोग से नेपाल में रेलवे के विकास की बात करें तो यहां कहीं ज्यादा अनुकूलता है।

नेपाल को चीन के कर्ज में फंसाने की योजना : विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी रेल, रेल से कहीं अधिक एक शोर भर है। यह नेपाल में भारत विरोधी और चीन समर्थकों का एक रूमानी ख्याल एजेंडा भर है, क्योंकि सारी प्रतिकूलताओं के बावजूद अगर यह रेल अगले डेढ़-दो दशकों में नेपाल सीमा तक आ भी गई तो इसका नेपाल में आखिर क्या प्रयोजन है? नेपाल के बुद्धिजीवियों ने इसको लेकर कई आशंकाएं भी जताई हैं। नेपाल में करीब साढ़े पांच अरब डॉलर खर्च कर चीन आखिर भारत की सीमा तक क्यों ट्रेन लाना चाहता है? इसकी लागत अभी कई गुना बढ़ने की संभावना है। क्या यह केवल नेपाल के उपभोग के लिए है या फिर नेपालियों की जरूरत को ध्यान में रखकर सोचा जा रहा है? अपेक्षाकृत कम आबादी के पर्वतीय क्षेत्र और सीमित जरूरत वाले देश को इसकी क्या जरूरत है? कहीं यह चीनी कर्ज जाल में फंसाने की कोई चाल तो नहीं है, जैसा श्रीलंका मालदीव और ऐसे कई छोटे मुल्कों के साथ हुआ है।

[भारत-नेपाल मामलों के जानकार]

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