मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

[ संजय गुप्त ]: मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय वित्त एवं गृहमंत्री पी चिदंबरम भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गए थे। उनकी मुश्किलें तब और बढ़ीं जब शीना वोरा हत्याकांड में आरोपित इंद्राणी मुखर्जी आइएनएक्स मीडिया मामले में सरकारी गवाह बन गईं। जांच एजेंसियों की मानें तो 2007 में जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे तब उन्होंने पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी की कंपनी आइएनएक्स मीडिया में विदेशी निवेश की अनुचित मंजूरी एफआइपीबी से दिलाई।

कार्ति चिदंबरम भी गंभीर आरोपों से घिरे हैैं

चिदंबरम के साथ ही उनके बेटे कार्ति भी कई गंभीर आरोपों से घिरे हैैं। चिदंबरम की पत्नी भी शारदा घोटाले में जांच का सामना कर रही हैैं। चिदंबरम सीबीआइ और ईडी की गिरफ्तारी से बचने के लिए हर संभव कोशिश करते रहे। उन्हें रह-रहकर अग्रिम जमानत मिलती रही, लेकिन पिछले दिनों उनकी अग्रिम जमानत नामंजूर हो गई। उन्हें सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली और सीबीआइ की गिरफ्त में जाना पड़ा। सीबीआइ की पूछताछ से मुक्त हुए तो ईडी की पूछताछ का सामना करने के पहले उन्हें तिहाड़ जेल जाना पड़ा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अग्रिम जमानत देने से इन्कार करते हुए कहा कि आर्थिक अपराध के मामले में ऐसा करना सही नहीं होगा। संप्रग शासनकाल में चिदंबरम प्रभावशाली नेता माने जाते थे। वह वित्त मंत्री के साथ गृह मंत्री भी रहे। उनका भ्रष्टाचार में इस तरह गिरफ्तार होना और जेल जाना न केवल उनके, बल्कि कांग्रेस के लिए भी शर्मनाक है।

चिदंबरम समेत कई कांग्रेसी नेताओं पर हैं भ्रष्टाचार के आरोप
चिदंबरम के अलावा अन्य कई कांग्रेसी नेता भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैैं। जहां चिदंबरम तिहाड़ में हैैं वहीं कर्नाटक के कांग्रेस के बड़े नेता डीके शिवकुमार ईडी की गिरफ्त में हैैं। एक अन्य मामले में अहमद पटेल के बेटे से पूछताछ चल रही है और कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी से भी। इसके अलावा खुद राहुल गांधी और सोनिया गांधी नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैैं। राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के प्रवक्ता इन सब मामलों पर यही कह रहे हैैं कि उनके नेताओं की गिरफ्तारी और पूछताछ का जो सिलसिला कायम है वह बदले की राजनीति का नतीजा है।

कांग्रेस भ्रष्टाचार को लेकर बैकफुट पर

कांग्रेस के नेता जिस तरह अपने नेताओं पर लगे गंभीर आरोपों पर चर्चा करने से बच रहे हैैं उससे पूरी पार्टी भ्रष्टाचार के सवाल पर बैकफुट पर दिख रही है। शायद यही कारण है कि ज्वलंत मसलों पर उसकी बोलती सी बंद है। कांग्रेस इसकी अनदेखी नहीं कर सकती कि आज क्रोनी कैपिटलिज्म के जो तमाम आरोप सामने हैैं उनके पीछे संप्रग शासन का वह दौर है जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे। उसी दौरान बैैंकों ने संदिग्ध इरादों वाले कारोबारियों को अनाप-शनाप कर्ज दिया। इसी कारण बैैंकों का एनपीए बढ़ना शुरू हुआ। इस एनपीए का ही बुरा असर अब अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। यह किसी से छिपा नहीं कि संप्रग शासन के समय बैंकों ने अव्यावहारिक परियोजनाओं को मनमाने तरीके से कर्ज दिए। कुछ मामलों में तो संकटग्रस्त कंपनियों को भी बार-बार नए कर्ज दिए गए। इसके अलावा ऐसे लोगों को भी कर्ज दिए गए जो उसे लौटाने का इरादा ही नहीं रखते थे।

चिदंबरम, डीके शिवकुमार को लेकर कांग्रेस मुश्किल में
यह सही है कि चिदंबरम, डीके शिवकुमार आदि पर लगे आरोपों से कांग्रेस मुश्किल में दिख रही है, लेकिन अगर जांच एजेंसियां इन नेताओं पर लगे आरोपों को साबित नहीं कर पाईं तो न केवल उनकी, बल्कि सरकार की भी किरकिरी होगी और कांग्रेस की बदले की राजनीति का आरोप भी पुख्ता होगा। जो भी हो, कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि घपले-घोटाले और क्रोनी कैपिटलिज्म के तमाम मामले संप्रग शासन के दौर के ही हैैं। कुछ मामले की जांच तो उसी समय शुरू भी हो गई थी। जिस एयरसेल-मैक्सिस मामले में चिदंबरम फंसे हैैं उसे लेकर भी विवाद पहले ही उभर आया था।

बदले की राजनीति का शोर मचा रही कांग्रेस

आखिर संप्रग काल की अनियमितताओं की जांच-पड़ताल के आधार पर यह कैसे कहा जा सकता है कि बदले की राजनीति हो रही है? बीते पांच सालों में न जाने कितने ऐसे घपले उजागर हुए हैैं जो संप्रग शासन के दौरान हुए। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि जो मामले अभी तक सामने आए हैैं वे इने-गिने ही हैैं। शायद संप्रग काल के इन्हीं मामलों के कारण कुछ समय पहले राहुल गांधी राफेल सौदे को उछालकर प्रधानमंत्री को चोर तक कहने लगे थे। अब वह शांत हैैं तो इसीलिए कि उनके आरोपों में कोई सच्चाई नहीं थी। इसके विपरीत संप्रग शासन के दौरान शायद ही कोई शीर्ष भाजपा नेता रहा हो जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों और वे साबित हो सके हों। बदले की राजनीति का शोर मचा रही कांग्रेस को यह याद होना चाहिए कि संप्रग काल में अमित शाह को फर्जी मुठभेड़ के एक मामले में गिरफ्तार भले किया गया हो, लेकिन जांच एजेंसियां उन पर लगे आरोप साबित नहीं कर सकीं। आज अगर यह माना जा रहा है कि अमित शाह की गिरफ्तारी बदले की राजनीति के तहत और भाजपा को बदनाम करने के लिए थी तो इसके लिए कांग्रेस ही जवाबदेह है।

भ्रष्टाचार के आरोपों को अदालत में साबित करना मुश्किल होता है
अपने देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि भ्रष्टाचार के आरोपों को अदालत में साबित करना मुश्किल होता है। नेताओं के मामले में यह मुश्किल कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। लालू यादव और ओम प्रकाश चौटाला के अलावा चंद नेता ही ऐसे हैैं जिन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप अदालतों में साबित किए जा सके हैैं। हमारी जांच एजेंसियां राजनीतिक भ्रष्टाचार की तह तक जाने और दोषी लोगों को सजा दिलाने में नाकाम रहने के लिए ही अधिक जानी जाती हैैं। जिस 2जी घोटाले के कारण मनमोहन सरकार बुरी तरह बदनाम हुई उसमें किसी को सजा नहीं हुई। सीबीआइ विशेष अदालत ने इस मामले में आरोपित ए राजा, कनीमोझी और अन्य अनेक लोगों को बरी कर दिया। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन अभी तक उसकी सुनवाई नहीं हुई।

राजनीति में भ्रष्टाचार चुनावी राजनीति के लिए होता है
आम तौर पर राजनीति में भ्रष्टाचार चुनावी राजनीति के लिए किया जाता है। इसके अलावा अपनी और अपने परिजनों की जिंदगी में शानो-शौकत लाने के लिए भी भ्रष्ट तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। पी चिदंबरम को लेकर जांच एजेंसियां जो दावा कर रही हैैैं उनकी मानें तो उन्होंने और उनके बेटे ने बहुत सारा धन विदेश में संपत्ति खरीदने में खर्च किया है। अगर यह दावा सही है तो बहुत गंभीर बात है।

पैसे के दम पर लड़े जाते हैं चुनाव

आज पंचायत से लेकर लोकसभा के चुनाव जिस तरह पैसे के दम पर लड़े जा रहे वह किसी से छिपा नहीं। यह भी जगजाहिर है कि चुनावों में पैसा खर्च करने की जो सीमा तय की गई है उसका उल्लंघन होता है। यह सीमा बढ़ाने की बात तो होती है, लेकिन कोई ठोस मांग का रूप नहीं ले पा रही तो शायद इसीलिए कि नेताओं को लगता है कि कहीं देश के गरीबों को यह संदेश न जाए कि राजनीति में बहुत पैसा है। अगर राजनीतिक भ्रष्टाचार से मुक्ति पानी है तो चुनाव के लिए जो धन एकत्रित किया जाता है उसमें पारदर्शिता लाने के उपाय करने ही होंगे।


[ लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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