[ ब्रह्मा चेलानी ]: मानव विज्ञान के दृष्टिकोण से सेंटिनलीज दुनिया की सबसे एकाकी और विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई जनजातियों में से एक है। सेंटिनलीज करीब 60,000 वर्षों से भी अधिक समय से शेष दुनिया से कटे हुए हैं। सेंटिनलीज और उनके पूर्व-नियोलिथिक पूर्वज जो अफ्रीका से आए थे, के बीच अनुवांशिक रूप से प्रत्यक्ष संबंध हैं। अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के सेंटिनलीज और अन्य आदिवासी समुदाय एशियाई आबादी के अनुवांशिक उद्भव एवं विकास को समझने के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण हैं। कुछ अध्ययनों में अंडमान के आदिवासियों और मलेशिया के मूल निवासियों में अनुवांशिक समानता मिली है।

एक अध्ययन में एशिया की 73 नस्लीय एवं नृजातीय आबादी को शामिल किया गया। इसमें यह कहा गया कि इस महाद्वीप में लोगों की बसावट अफ्रीका से एक बड़े विस्थापन के जरिये हुई जिसमें लोगों ने हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर के दक्षिणी मार्गों का सहारा लिया। उनका अस्तित्व पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत पर निर्भर है। 2004 में हिंद महासागर में आई प्रलयंकारी सुनामी में भी प्रकृति को लेकर उनकी अद्भुत समझ नजर आई थी। सुनामी की शक्तिशाली लहरों ने तटीय क्षेत्रों में भयंकर तबाही मचाई, लेकिन अंडमान के विलुप्तप्राय मूल निवासी उसकी मार से बचने में इसलिए सफल रहे, क्योंकि प्रकृति के संकेतों को समझकर वे समय रहते ऊंचे स्थानों पर चले गए थे।

आज एशिया के आदिवासी समुदाय संकट में हैं। उनकी संख्या लगातार सिकुड़ रही है। बाहरी अतिक्रमण और उनके प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन इसकी प्रमुख वजह हैं। अपनी जमीन और संस्कृति की रक्षा करने में आदिवासी समुदायों का संघर्ष इसलिए कमजोर पड़ रहा, क्योंकि खनन कंपनियां, बांध निर्माता, पाम आयल लॉबी और सुरक्षा बलों के आगे वे कमजोर साबित हो रहे हैं। ध्यान रहे कि दुनिया की तकरीबन दो-तिहाई आदिवासी आबादी एशिया में ही रहती है। बीते कुछ दिनों से एक युवा अमेरिकी ईसाई धर्मप्रचारक जॉन एलन चाउ का दुस्साहस पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोर रहा है। वह सेंटिनलीज को ईसाई बनाने के मकसद से गैर-कानूनी तरीके से इस निर्जन द्वीप में गया था। उसने भारत के सुरक्षा तंत्र की कलई खोलकर इन आदिवासी समुदायों को घुसपैठियों के लिहाज से जोखिम भरा बना दिया है।

चाउ के पिता ने चीन में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान अपना देश छोड़कर अमेरिका में शरण ली थी और ईसाई धर्म अपना लिया था। चाउ की गैर-कानूनी गतिविधि ने सेंटिनलियों के भविष्य को संकट में डाल दिया है। अमेरिका की ऑल नेशन मिशनरी एजेंसी ने चाउ को भारत भेजा था। उसने स्वीकार किया कि चाउ को भारत भेजने के लिए उसने भारतीय वीजा नियमों का उल्लंघन किया। उसने चाउ को पर्यटक वीजा पर भारत भेजा, क्योंकि मिशनरी वीजा मिलना मुश्किल होता है, फिर भी भारतीय एजेंसियों ने ऑल नेशंस एजेंसी के खिलाफ अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं किया जिसने चाउ को मौत के मुंह में भेजने के लिए भारतीय कानूनों को ताक पर रख दिया। सेंटिनल वासी शिकार पर निर्भर रहने वाला समुदाय है। वह उत्तरी सेंटिनल द्वीप के वर्षा वनों में रहता है। यह समुदाय अब अवसान की ओर है। अंग्रेजी राज के दौरान अंडमान और निकोबार द्वीप के मूल निवासियों का एक तरह संस्थागत रूप से सफाया हुआ। परिणामस्वरूप अब कुछ गिने-चुने समुदाय ही वहां बचे हैं।

अधिकांश आकलन यह कहते हैैं कि अब 100 से भी कम सेंटिनलीज बचे हैं। पड़ोसी द्वीप पर रहने वाली जारवा जनजाति इसकी मिसाल है कि मूल निवासियों के लिए बाहरी लोगों के संपर्क में आना कितना विनाशकारी होता है। जारवा जनजाति ब्रिटिश घुसपैठ की पहली शिकार थी। यह जनजाति भी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। एकाकी रूप से रहने वाली इन जनजातियों में बाहरी लोगों की सामान्य बीमारियों से भी बचने के लिए पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता नहीं होती। यहां तक कि मामूली सा फ्लू भी पूरे के पूरे समुदाय को लील सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि उनका उन रोगाणुओं से कोई वास्ता नहीं पड़ा जो आधुनिक जीवन में बेहद आम हो गए हैं। बीमारियों के बदलते स्वरूप और एंटीबायोटिक्स दवाओं के अत्यधिक इस्तेमाल से यह स्थिति उपजी है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में जनजातियों के लिए आरक्षित जिन द्वीपों पर कानूनी रूप से भारतीयों तक का प्रवेश भी वर्जित है वहां चाउ ने बार-बार जाने की कोशिश की ताकि वह वहां के निवासियों को ईसाई बना सके, लेकिन मीडिया का एक हिस्सा इस घटनाक्रम को ‘पाषाण युग’ के रूप में रेखांकित कर सेंटिनल वासियों की गलत तस्वीर पेश कर रहा है। उन्र्हें ंहसक हत्यारा बताया जा रहा है। जबकि धनुष-बाण रखने वाले सेंटिनलीज आत्मरक्षा में ही उनका इस्तेमाल करते हैं। चाउ के मामले में भी उन्होंने चेतावनी देकर उसे अपने द्वीप से चले जाने का संकेत दिया था, लेकिन चाउ पर तो यह उन्माद सवार था कि वह उनकी धरती को ‘जीसस का साम्राज्य’ बनाएगा, भले ही उसे अपनी जान ही क्यों न जोखिम में डालनी पड़े।

अजनबियों से निपटने में जरा सेंटिनली लोगों के उदार रवैये की तथाकथित सभ्य दुनिया से तुलना भी कर लीजिए। जब चाउ ने पहली बार उनकी शांत दुनिया में प्रवेश किया तो उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘गिरफ्तारी एवं पूछताछ’ वाली नीति नहीं अपनाई। ध्यान रहे कि अमेरिका में अवैध रूप से प्रवेश करने वालों से ऐसे ही निपटा जाता है। उन्होंने चाउ को चेतावनी दी, फिर भी वह नहीं माना और उसने फिर अवैध तरीके से घुसने की कोशिश की। इसके बाद सेंटिनली लोगों का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने तीरों से उस पर हमला कर दिया। आदिवासियों ने उसके शरीर को वैसे ही दफनाया जैसे वे अपने लोगों का अंतिम संस्कार करते हैं। त्रासदी यह है कि मरने के बाद भी चाउ सेंटिनली लोगों के लिए खतरा बन गया, क्योंकि उसके साथ शायद कुछ रोगाणु भी सेंटिनलियों तक पहुंच गए हों।

भारतीय कानूनों को धता बताते हुए चाउ जिस तरह सेंटिनल पहुंचा उससे भी कई सवाल खड़े होते हैं। भारतीय तटरक्षक दल उत्तरी सेंटिनल द्वीप के आसपास गश्त लगाते हैं, फिर भी उन्हें चकमा देकर चाउ आसानी से बार-बार इस द्वीप में घुसता रहा। अपने माता-पिता के लिए छोड़ी 13 पन्नों की चिट्ठी में उसने लिखा है कि अंधेरे का फायदा उठाकर वह सुरक्षा बलों की नजर से बचने में सफल रहा। भारत की आंतरिक सुरक्षा में जिन खामियों को चाउ ने उजागर किया उससे विलुप्त होते जनजाति समुदायों की सुरक्षा के लिए बने तंत्र की क्षमता भी संदिग्ध हो जाती है।

वर्तमान में दुनिया की कुल आबादी में मूल आदिवासियों की संख्या महज पांच प्रतिशत से भी कम है, लेकिन धरती की 80 प्रतिशत से अधिक जैव-विविधता का ख्याल यही लोग रख रहे हैं। एक ऐसे वक्त जब पर्यावरणीय और जलवायु परिवर्तन की चुनौती मानवता के लिए एक बड़े खतरे के रूप में उभर रही है तब इंसानी जरूरतों और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन के लिहाज से आदिवासियों की प्रकृति के अनुकूल जीवन शैली शेष विश्व के लिए मिसाल है।

[ लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं ]

Edited By: Bhupendra Singh