अपने यहां मुखर और सामने दिखने वाले पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच-समझ अमेरिका से प्रभावित होती है। इसलिए उन्हें समझाने के लिए अमेरिकी उदाहरण देना ही उचित है। अगर नगरीय चुनावों के परिणामों की तुलना उसी इलाके के राष्ट्रपति चुनावों के आंकड़ों से करें तो वह बहुत हद तक हास्यास्पद ही होगा। कारण बहुत साफ है, प्रतिनिधित्व वाले लोकतंत्र में हम जैसे-जैसे नीचे के स्तर पर जाते हैं, राजनीति में ज्यादा गलाकाट स्पद्र्धा होती है जबकि केंद्रीकरण की बात कम होती जाती है। यह जितना अमेरिका के लिए सच है, उतना ही भारत के लिए भी। लोकसभा चुनावों में चुनाव क्षेत्र काफी बड़े होते हैं और स्थानीय मुद्दे काफी कम भूमिका निभाते हैं जबकि स्थानीय संगठनात्मक ढांचा न भी हो, तब भी 'राष्ट्रीय' पार्टियां लाभ की स्थिति में होती हैं। लोकसभा और यहां तक कि विधानसभाओं-दोनों के चुनाव 'राष्ट्रपति' चुनाव-जैसे होते जा रहे हैं, तो इसका संबंध चुनाव क्षेत्र के आकार से है। ग्रामीण पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों में ज्यादा पहुंच की जरूरत और कम हो गई है। यह बात इसको साफ करती है कि निचले स्तर के चुनावों में उम्मीदवारों, खास तौर से निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या आखिरकार क्यों बढ़ती जा रही है।

इस प्राथमिक आकलन को रखने की जरूरत नहीं होती, अगर यह तथ्य सामने नहीं आता कि पिछले हफ्ते कुछ अखबारों और टीवी चैनलों ने राजस्थान में पंचायत चुनावों के परिणामों की तुलना पिछले लोकसभा चुनाव परिणामों से की। उद्देश्य साफ था, यह बताना कि भाजपा की स्थिति तेजी से गिर रही है और यह सिर्फ कुछ समय की बात है जब कांग्रेस जल्द ही प्रमुख स्थान पर आ जाएगी। गांधी परिवार के नेतृत्व वाले संगठन कांग्रेस में आस्था के नजरिये से यह उचित ही काम है, लेकिन चुनाव विश्लेषण की दृष्टि से इसमें गंभीर खामी है। राजस्थान और मध्य प्रदेश के नगरीय चुनावों के परिणाम बताते हैं कि इन दो राज्यों में भाजपा का प्रभुत्व कुल मिलाकर यथावत है, लेकिन इससे भी अधिक ये परिणाम बताते हैं कि कांग्रेस (और उसी तरह मीडिया) का यह सोचना गलत है कि संसद में अवरोध की छाया विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ रही है और यह वोट देने के तौर-तरीके को प्रभावित कर रही है। इनके परिणाम यह बताते हैं कि कांग्रेस की तुलना में भाजपा जमीनी स्तर पर संगठनात्मक रूप से अधिक मजबूत है। यह बात महत्व की है, क्योंकि कुछ मुद्दे हैं जो स्थानीय कारणों से प्रभावित होते हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान के परिणाम यह भी बताते हैं कि जिन मुद्दों को मीडिया बहुत तवज्जो देता है, स्थानीय स्तर पर उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। आशा है, नरेंद्र मोदी सरकार का राजनीतिक मृत्युलेख लिखने की आकांक्षा रखने वाले लोग इस अंतर को समझेंगे।

पिछले हफ्ते ही इंडिया टुडे-सिसरो का वह सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ है जिसमें देश का मिजाज बताया गया है। मीडिया किस तरह जनता की क्षमता को तवज्जो नहीं देता, यह उसका उदाहरण है। यह महत्वपूर्ण जनमत संग्रह है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इसे दबे ढंग से छापा गया। इसकी वजह यह थी कि इससे वैसे चौंकाने वाले शीर्षक नहीं निकल रहे हैं जैसी कि संपादकों को आशा थी। यह जनमत संग्रह बताता है कि पिछले साल गर्मियों के वक्त वोटिंग के समय की प्राथमिकताएं बहुत बदली नहीं हैं और आज अगर अचानक चुनाव हो जाएं तो ज्यादा संभावना यही है कि राजग फिर से जीत जाए। इसमें यह भी बताया गया है कि मोदी की लोकप्रियता संसद और टीवी स्टूडियो में तमाम गुबारों के बावजूद अप्रभावित रही है।

असल में कोई भी मध्यावधि ओपीनियन पोल जनता का मूड भांपने का सबसे सटीक तरीका होता है। चुनाव के दौरान प्रचार अभियान मतदाताओं के अंतिम फैसले को प्रभावित करने का काम करता है। पिछले दिल्ली चुनावों में भाजपा की शुरुआती बढ़त आम आदमी पार्टी के जोरदार प्रचार और अल्पसंख्यकों की सुनियोजित वोटिंग की भेंट चढ़ गई थी। इन परिस्थितियों में भाजपा अगर सोचती है कि वह चुनावी वैतरणी आसानी से पार कर जाएगी या फिर चुनाव के ये नतीजे बिहार चुनाव पर भी पूरी तरह लागू होंगे तो यह उसकी मूर्खता होगी। स्थानीय निकायों के चुनावों और ओपीनियन पोल को एक साथ देखने की प्रासंगिकता तभी है जब इससे सही-सही निष्कर्ष निकाले जाएं। पहला निष्कर्ष यह है कि मीडिया पंडितों के विपरीत मतदाता आकस्मिक फैसले नहीं लेता। राजनीतिक उठा-पटक से प्रभावित हुए बिना मतदाता सरकार को काम करने का पूरा मौका देना चाहता है। वह धैर्य से प्रतीक्षा कर रहा है। लगता है कि कांग्रेस ने हड़बड़ी में सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई छेड़ दी है, जबकि मतदाताओं का मानना है कि मोदी सरकार का कार्य प्रगति पर है और उन्हें अधिक बेहतर काम के लिए और समय दिया जाना चाहिए। इस संदर्भ में दूसरा निष्कर्ष यह भी है कि ओपीनियन पोल से कुछ चिंताजनक पहलू भी उभरते हैं, जिन पर अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो मोदी सरकार के लिए यह बातें खतरा भी बन सकते हैं और आने वाले समय में उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। सरकार के समक्ष मौजूद चुनौतियों में सबसे प्रमुख है अर्थव्यवस्था में सुधार और गति लाने की। यह सही है कि मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार के सत्ता में आने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज गिरावट देखने को नहीं मिली है, परंतु भारी बदलाव की उम्मीद, जिसने 2014 में नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव में जीत दिलाई थी, अब धूमिल पड़ गई है और लोगों को चिंता के साथ बेचैनी हो रही है। लोगों की यह चिंता अभी हताशा में इसलिए नहीं बदली है, क्योंकि प्याज के अपवाद को छोड़कर महंगाई में अधिक इजाफा नहीं हुआ है। परंतु आम लोगों ने भाजपा को अच्छे दिनों के वादे के कारण चुना था, इसलिए मोदी से जनअपेक्षाएं कहीं अधिक हैं। दूसरे शब्दों में मोदी सरकार को सावधान और सतर्क रहना होगा, क्योंकि अगर उसके आर्थिक फैसलों से जमीनी धरातल पर सही नतीजे नहीं निकलते, खासतौर पर रोजगार और संपन्नता बढ़ाने के मामले में, तो इसका शब्दाडंबर ही इसे ले डूबेगा।

हालांकि यह सब अभी भविष्य के गर्त में है। बिहार विधानसभा चुनाव में संकेत मिल रहे हैं कि इसका परिणाम स्थानीय मुद्दों, स्थानीय अवधारणाओं और स्थानीय चुनाव अभियान पर निर्भर करेगा। राष्ट्रीय स्तर पर तो भारत अभी शांति के दौर का आनंद उठा रहा है। हां, टीवी देखते समय शायद आपको ऐेसा न लगे, लेकिन आने वाले समय में भी सब कुछ ऐसा ही रहेगा यह नहीं कहा जा सकता। इसलिए बेहतर यही होगा कि मोदी सरकार आर्थिक दिशा में और अधिक तेजी से काम करे और राष्ट्रीय हित के साथ साथ आम लोगों की भावनाओं को भी ध्यान में रखे।

[लेखक स्वप्नदास गुप्ता, वरिष्ठ स्तंभकार हैं]

Posted By: Bhupendra Singh