[ डॉ. सुरजीत सिंह ]: वैश्विक भुखमरी सूचकांक, 2020 में भारत 107 देशों में 94वें स्थान पर दिखाया गया है। चूंकि इस सूचकांक में भारत को श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों से भी पीछे बताया गया है इसलिए उस पर खासी चर्चा हो रही है। 107 देशों में से केवल 13 देश ही कुपोषण के मामले में भारत से खराब स्थिति में दर्शाए गए हैं। वर्ष 2019 में भारत 117 देशों की सूची में 102वें स्थान पर था, जबकि 2018 में 103वें स्थान पर था। इस सूचकांक के साथ जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत की 14 प्रतिशत आबादी अल्पपोषित है एवं बच्चों में बौनेपन की दर 37.4 प्रतिशत है। इस रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में करीब 69 करोड़ लोग कुपोषित हैं। यद्यपि यह रिपोर्ट यह कहती है कि भारत में बाल मृत्यु दर में सुधार हुआ है, जो अब 3.7 प्रतिशत है, परंतु यह दर अन्य देशों की तुलना में बहुत अधिक है।

आजादी के 74 वर्षों के बाद भी भारत में कुपोषण की समस्या समाप्त नहीं हुई

प्रश्न यह है कि आजादी के 74 वर्षों के बाद भी भारत से कुपोषण जैसी समस्या को समाप्त क्यों नही किया जा सका है? यद्यपि आजादी के बाद से भारत में खाद्यान्न के उत्पादन में पांच गुना वृद्धि हुई है, परंतु कुपोषण का मसला चुनौती बना हुआ है। कुपोषण की समस्या खाद्यान्न की उपलब्धता न होने के कारण नहीं है, बल्कि आहार क्रय करने की क्रयशक्ति कम होने के कारण है। गरीबी के कारण क्रय शक्ति कम होने एवं पौष्टिक आहार की कमी के कारण कुपोषण जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। परिणामस्वरूप लोगों की उत्पादन क्षमता कम होने लगती है, जिससे लोग निर्धनता एवं कुपोषण के चक्र में फंसने लगते है। एनीमिया, घेंघा और बच्चों की हड्डियों के कमजोर होने की समस्या से शिशु मृत्यु की दर बढ़ जाती है।

पोषण एवं कुपोषण पर काबू पाने के लिए बनी नीतियों का सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हुआ

यद्यपि सरकार द्वारा पिछले दो दशकों में अल्प पोषण एवं कुपोषण पर काबू पाने के लिए उल्लेखनीय कदम उठाए गए हैं, जैसे मिड-डे मील, राष्ट्रीय पोषण मिशन, ई-पोषण व्यवस्था अभियान, समेकित बाल विकास सेवाएं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मनरेगा आदि। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 का उद्देश्य एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए लोगों को वहनीय मूल्यों पर अच्छी गुणवत्ता का खाद्यान्न पर्याप्त मात्रा उपलब्ध कराते हुए उन्हेंं समुचित खाद्यान्न एवं पोषण सुरक्षा प्रदान करना है। नि:संदेह ये सभी नीतियां बहुत अच्छी हैं, परंतु समस्या यह है कि उनका उचित क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप न सिर्फ र्आिथक विकास में रुकावट आती है, बल्कि विश्व स्तर पर भारत की छवि भी मलिन होती है। कुपोषण र्आिथक विकास की असमानताओं एवं विकास के असंतुलन का भी परिणाम है। इसके कारण मानव पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने में असमर्थ हो जाता है।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक, 2020 ने गरीबी, मातृ शिक्षा का निम्न स्तर, आहार के अभाव को जिम्मेदार माना

वैश्विक भुखमरी सूचकांक, 2020 में गरीबी, आहार की विविधता के अभाव, मातृ शिक्षा के निम्न स्तर आदि प्रमुख कारणों को कुपोषण के लिए जिम्मेदार माना गया है। इन पर ध्यान देने के साथ हमें जलवायु परिवर्तन से उपजी चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा। जलवायु परिवर्तन न सिर्फ आजीविका, पानी की आर्पूित और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर रहा है, बल्कि खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती भी खड़ी कर रहा है। इसका सीधा असर कुपोषण पर पड़ता है। बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रत्येक को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध न हो पाना और साफ सफाई न होने के कारण कुपोषण की समस्या और अधिक गंभीर रूप ले लेती है। कुपोषण का एक अन्य प्रमुख कारण लैंगिक असमानता भी है। गरीब तबके की महिलाओं के निम्न सामाजिक स्तर के कारण उनके भोजन की मात्रा एवं गुणवत्ता पुरुष के भोजन की तुलना में कहीं अधिक निम्न होती है।

आर्थिक विकास के बावजूद भारत कुपोषण को दूर करने में कामयाब नहीं रहा

अपेक्षाकृत तेजी से आर्थिक विकास के बावजूद भारत कुपोषण की समस्या को दूर करने में कामयाब नहीं हो पा रहा है। इससे स्पष्ट है कि पोषण की स्थिति में सुधार की दिशा में किए जा रहे प्रयासों में संरचनात्मक बदलाव किए जाने की आवश्यकता है। ऐसा करके ही 2022 तक कुपोषण मुक्त भारत एवं 2030 तक गरीबी को समाप्त करने के लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा। इसके लिए कुपोषित परिवारों की पहचान कर उन्हेंं सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। इसके लिए भारत में पोषण के कार्यक्रमों को एक जन आंदोलन में बदलना होगा, जिसमें सबकी भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। इसके लिए स्थानीय निकायों, सामाजिक संगठनों, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों की व्यापक स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

केंद्र एवं राज्य मिलकर कुपोषण को जड़ से मिटा सकते हैं

केंद्र एवं राज्यों के महिला एवं बाल कल्याण, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, शिक्षा, खाद्य एवं अन्य विभागों के बीच आपसी समन्वय के साथ कुपोषण संबंधी कार्यक्रमों को एक साथ सामूहिक रूप से लागू करने पर ही कुपोषण रूपी दुश्मन को जड़ से मिटाया जा सकता है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा, एएनएम, प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों को पोषण योद्धा घोषित कर उन्हेंं गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं का पालन करने वाली महिलाओं, बच्चों एवं किशोरियों के पोषण के लिए जिम्मेदार बनाना होगा, जो उनकी साफ-सफाई, संतुलित आहार आदि के लिए कार्य करें एवं लोगों को पौष्टिक एवं गुणवत्तापूर्ण आहार के संबंध में जागरूक करें।

गरीबी से निपटने एवं कुपोषण की दर को कम करने का रास्ता कृषि क्षेत्र से होकर जाता है

समय-समय पर कुपोषण संबंधी डाटा का मूल्यांकन, उसे कम करने के प्रयासों की समीक्षा एवं जिम्मेदार व्यक्तियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। गरीबी से निपटने एवं कुपोषण की दर को कम करने का रास्ता कृषि क्षेत्र से ही होकर जाता है। नए कृषि कानूनों के माध्यम से कृषि एवं उससे जुड़े उत्पादों पर विशेष ध्यान दिए जाने से रोजगार सृजन में वृद्धि होगी, जिससे इस समस्या से मुक्ति का द्वार खुलेगा। नई शिक्षा नीति में कौशल विकास कार्यक्रम के द्वारा एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली में होने वाले नवीनतम सुधारों के द्वारा भी इस समस्या को समाप्त करने में सहायता मिलेगी। देश में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता को भी बढ़ाना होगा, क्योंकि भारत में 1700 लोगों पर एक ही डॉक्टर है। भारत को विश्व की महाशक्ति बनने के लिए कुपोषण को जड़ से खत्म करना होगा। आगामी पीढ़ियों को कुपोषण और उसके चलते होने वाली बीमारियों से बचाकर ही नए भारत के निर्माण की नींव रखी जा सकती है।

( लेखक अर्थशास्त्री हैं )

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