[ ए. सूर्यप्रकाश ]: कोविड-19 महामारी के संकट में भले ही यहां-वहां कुछ बेसुरे राग सुनाई पड़े हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि भारतीयों ने अनुशासन और एकजुटता के साथ इस आपदा का सामना किया है। इस गाढ़े वक्त में जिस किस्म का नियोजन और आत्मविश्वास दिखाई पड़ रहा वह हमारे विविधता भरे और बहस प्रिय समाज में दुर्लभ ही दिखता है। कोरोना जैसे अदृश्य दुश्मन का सामना करने के लिए एक संयुक्त कमान बनाने की प्रतिबद्धता ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, केंद्र और राज्य स्तर के सभी संस्थानों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और स्वास्थ्यर्किमयों को एकजुट कर दिया है, जिसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अग्रिम मोर्चे से कमान संभाले हुए हैं। हालांकि कहने का अर्थ यह नहीं कि सब कुछ ठीक-ठाक है।

कोरोना पर पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों का केंद्र के साथ तालमेल सही नहीं

पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र से कुछ ऐसे स्वर उभरे जिनसे लगा कि इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों का केंद्र के साथ तालमेल सही नहीं। स्थिति को सुगम बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्रियों के साथ कई बार ऑनलाइन बैठकें कर उनकी समस्याएं समझने का प्रयास किया। यह उस सहकारी संघवाद की भावना को ही रेखांकित करता है जिसकी यदाकदा चर्चा होती रहती है।

किसी संकट से निपटने के मामले में संविधान केंद्र सरकार को विशेष अधिकार प्रदान करता है

यह बात अवश्य याद रखी जानी चाहिए कि किसी संकट से निपटने के मामले में एकरूपता कायम रखने के लिए संविधान केंद्र सरकार को विशेष अधिकार प्रदान करता है। इस दृष्टि से देखें तो हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने बहुत दूरदर्शिता दिखाई। हालांकि इन अधिकारों पर बहुत बहस भी हुई। संविधान शिल्पी डॉ. बीआर आंबेडकर ने संविधान सभा में अपने समापन भाषण में कहा था कि संविधान को लेकर ऐसे आरोप हैं कि इसमें केंद्र को बहुत अधिक शक्तियां देकर राज्यों को महज म्युनिसिपैलिटी की भूमिका तक सीमित कर दिया गया है, लेकिन यह न केवल अतिरेकपूर्ण है, बल्कि संविधान के लक्ष्यों को लेकर नासमझी को भी दर्शाता है।

आंबेडकर ने कहा था- केंद्र विशेष अधिकार का प्रयोग केवल आपातकाल में ही कर सकता है

तसकता हैब एक और आरोप यह था कि केंद्र को शक्ति इसलिए दी गई कि वह राज्यों पर अपने फैसले थोप सकता है। इस आरोप की चर्चा करते हुए आंबेडकर ने समझाया था कि यह संविधान का सामान्य प्रावधान नहीं है और इसका उपयोग केवल आपातकाल में हो सकता है। यह कहते हुए उनके दिमाग में केवल आपातकाल की उद्घोषणा को लेकर संविधान में शामिल अनुच्छेद ही नहीं थे, बल्कि सातवीं अनुसूची में संघ सूची एवं समवर्ती सूची में आपातस्थिति को लेकर केंद्र द्वारा कानून बनाने की शक्तियों का भी भान था।

समवर्ती सूची- केंद्र विषाणुओं की रोकथाम के लिए कानून बना सकता है

जैसे कि समवर्ती सूची में आइटम 23 केंद्र को यह अधिकार देता है कि वह एक राज्य से दूसरे राज्य में संक्रमण रोकने या मनुष्य, पशु और वनस्पतियों को प्रभावित करने वाले विषाणुओं की रोकथाम के लिए कानून बना सकता है। मौजूदा कोरोना संकट में आपदा प्रबंधन अधिनियम (डीएमए) को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।

आपदा प्रबंधन एक्ट महामारी के दौरान राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए केंद्र को अधिकार प्रदान करता है

आपदा प्रबंधन अधिनियम महामारी के दौरान राष्ट्रीय नीति बनाने एवं उनके समन्वय के लिए केंद्र को अधिकार प्रदान करता है। इसके तमाम प्रावधान किसी राष्ट्रीय आपदा के समय केंद्र को ऐसी शक्तियां देते हैं। इन्हीं के आधार पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लॉकडाउन और फिर अनलॉक से संबंधित आदेश जारी किए। ऐसे ही एक आदेश में प्रवासी मजदूरों के बड़े पैमाने पर पलायन को देखते दुए शारीरिक दूरी सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को सौंपी गई। इसमें जिला अधिकारियों और जिला पुलिस अधीक्षकों को लॉकडाउन से जुड़े नियमों को लागू कराने के लिए जवाबदेह बनाया गया। यह इसलिए किया गया, क्योंकि डीएम और एसपी अमूमन केंद्रीय सेवाओं से आते हैं और वे इससे भलीभांति परिचित होते हैं कि इन नियमों को न मानने के क्या नतीजे हो सकते हैं? डीएमए के अलावा एपिडेमिक डिजीज एक्ट, 1987 भी किसी महामारी के नियंत्रण में केंद्र को शक्तियां प्रदान करता है।

केंद्र ने संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों की पड़ताल के लिए टीम भेजी थी

हालांकि पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में कोरोना के लिहाज से संवेदनशील कुछ जिलों की पड़ताल के लिए केंद्र द्वारा भेजी गई टीमों पर आपत्ति जताई और कुछ अन्य दलों ने भी इससे सुर मिलाते हुए केंद्र के खिलाफ तान छेड़ी, लेकिन केंद्र ने संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही ये कदम उठाए, जिसकी बुनियाद सात दशक पहले डॉ. आंबेडकर और उनके साथियों ने रखी थी। संविधान के अनुसार अवशिष्ट शक्तियां केंद्र के पास हैं और वह आपातकाल में राज्यों पर भी अपने निर्णय बाध्यकारी बना सकता है। यह केंद्र को अर्ध संघीय सरकार जैसे तंत्र के रूप में पेश करता है। वरिष्ठ संविधान विशेषज्ञ केसी वाघमारे के अनुसार भारत संघीय चरित्र वाला केंद्रीय राज्य है न कि केंद्रीय चरित्र वाला संघीय राज्य।

आपात स्थिति में नागरिकों की अवशिष्ट निष्ठा राज्यों के बजाय केंद्र में होनी चाहिए- आंबेडकर

अपने समापन भाषण में कतिपय आपात स्थितियों में शक्तिशाली केंद्र को लेकर डॉ. आंबेडकर ने कुछ दलीलें भी पेश की थीं। उन्होंने कहा था कि अधिकांश लोगों का यह मानना है कि किसी आपात स्थिति में नागरिकों की अवशिष्ट निष्ठा राज्यों के बजाय केंद्र में होनी चाहिए। देश के समग्र और साझा हितों में केंद्र ही काम कर सकता है। आपात स्थिति में राज्यों की तुलना में केंद्र को वरीय शक्तियां देने का यही आधार है। इसमें राज्यों के लिए भी ताकीद है कि आपातकाल में राज्यों को समग्र राष्ट्र हितों और धारणाओं पर गौर कर अपने स्थानीय हितों पर भी विचार करना चाहिए। जो समस्या को नहीं समझेंगे, केवल वही इसे लेकर शिकायत कर सकते हैं।

कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में मजबूत केंद्रीय शक्ति ही निपटने में मददगार हो सकती है

डॉ. आंबेडकर अपने देश और उसकी जनता को भलीभांति समझते थे और उन्हेंं अनुमान था कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान कैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। फिलहाल राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के शासन-संचालन से 42 विभिन्न दल जुड़े हुए हैं। कोविड-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई में कुछ के प्रयास विपरीत दिशाओं में जाते प्रतीत हो रहे हैं। केंद्र और राज्यों के बीच पर्याप्त परामर्श के साथ एक मजबूत केंद्रीय शक्ति ही इस समस्या से निपटने में मददगार हो सकती है।

महामारी और आपातकाल से निपटने के लिए हमें एक सशक्त संवैधानिक ढांचा मिला

प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्रियों के साथ कई दौर की वार्ता से ऐसा किया भी है। हम अपने राष्ट्र निर्माताओं के प्रति कृतज्ञ हैं जिन्होंने इस महामारी और राष्ट्रीय आपातकाल से निपटने के लिए हमें एक सशक्त संवैधानिक ढांचा प्रदान किया।

( लेखक लोकतांत्रिक विषयों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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