[ प्रदीप सिंह ]: अयोध्या और कश्मीर में जो हुआ और जो होने जा रहा है वह कल्पनातीत था। अयोध्या में राम मंदिर बनने की शुरुआत और एक वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की विदाई जितने सहज ढंग से हुई उस पर सहसा विश्वास नहीं होता। इन दोनों मुद्दों पर लोगों की प्रतिक्रिया बताती है कि देश का जनमानस इसके लिए तैयार था, इंतजार कर रहा था, फिर भी मन में यह था कि शायद यह कभी न खत्म होने वाला इंतजार है।

अयोध्या में राम भक्तों का बलिदान, कश्मीर में गुरु तेग बहादुर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान

अयोध्या आंदोलन की नींव में राम भक्तों का बलिदान है तो कश्मीर में गुरु तेग बहादुर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और लाखों हिंदुओं का बलिदान है। अयोध्या और कश्मीर भारत की संस्कृति और सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा के लिए त्याग और बलिदान की लंबी कहानी समेटे हुए हैं।

अयोध्या का फैसला सुप्रीम कोर्ट से, कश्मीर का फैसला मोदी-शाह की सियासी इच्छा शक्ति से आया

अयोध्या का फैसला सर्वोच्च अदालत से आया। कश्मीर का फैसला प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति से। अनुच्छेद 370 हटाना जितना कठिन था उससे भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण था उसके बाद की स्थिति को संभालना। जिनकी राजनीति, रोजी-रोटी और पीढ़ियों का सत्ता सुख इस अनुच्छेद से जुड़ा था उसे निष्प्रभावी करना आसान नहीं था। 370 के सहारे खड़े ये सारे किले ध्वस्त हो गए। जम्मू-कश्मीर के अवाम ने इस बदलाव को स्वीकार कर लिया। इसका प्रमाण उमर अब्दुल्ला के इस बयान से मिलता है कि अब हमारी राजनीति का आधार क्या होगा, इसके बारे में हमें नए सिरे से सोचना पड़ेगा।

जो कर रहे हैं वह देशहित में कर रहे और देश के लोग हम पर भरोसा करते हैं

जो मोदी और शाह कर सके वह काम इससे पहले के लोग या सरकारें क्यों नहीं कर पाईं? इसे समझाना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसके बाद ही समझ में आएगा कि ये क्या करने वाले हैं, क्या कर सकते हैं? ऐसा नहीं है कि ये काम पहले मुश्किल थे और अब आसान। इसकी दो वजहें हैं। पहली, दोनों ने लीक पर चलने से इन्कार कर दिया। दूसरी, अपने पर यह विश्वास कि जो कर रहे हैं वह देशहित में कर रहे और देश के लोग हम पर भरोसा करते हैं। हर बड़ा सपना एक सपना देखने वाले से शुरू होता है। कर्म के बिना हर परिकल्पना महज सपना बन कर रह जाती है। नेतृत्व का गुण है आगे सोचने की कला।

अनुच्छेद 370 हटाने और राम मंदिर निर्माण के बाद आगे क्या?

सवाल है अनुच्छेद 370 हटाने और राम मंदिर निर्माण के बाद आगे क्या? आम धारणा है कि मोदी को चौंकाने की आदत है। वह अपने अगले कदम की हवा नहीं लगने देते। यकीन न हो तो उमर अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला से पूछ लीजिए। दोनों पांच अगस्त, 2019 से तीन दिन पहले प्रधानमंत्री से मिले और खुशी-खुशी गए कि कुछ नहीं होने वाला। पांच तारीख की सुबह भी जब जिसको जितना और जिस समय जानना था उसे उतना उसी समय बताया गया। क्यों? जिन्होंने चाणक्य को पढ़ा है वे आसानी से समझ सकते हैं।

चाणक्य ने लिखा है कि राजा को कछुए की तरह होना चाहिए

चाणक्य ने लिखा है कि राजा (शासक) को कछुए की तरह होना चाहिए। जैसे कछुआ जब जितना जरूरी होता है उतना ही अंग निकालता है। इसी तरह राजा को जब जितना जरूरी हो उतना ही बताना चाहिए। सवाल फिर वही है कि आगे क्या? इसका जवाब किसी को पता नहीं। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के अभी 14 महीने ही हुए हैं और भगवान राम का करीब पांच सौ साल का वनवास खत्म हो गया तथा अनुच्छेद 370 की बेड़ी टूट गई। यह काम उसी भाजपा की सरकार ने किया जो सत्ता के लिए इन दोनों मुद्दों को छोड़ने के लिए तैयार हो गई थी।

मोदी के इस कार्यकाल में अभी तीन पांच अगस्त और आने वाले हैं

जरा भाजपा और संघ के प्रमुख मुद्दों पर नजर डालें। समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण, पाक अधिकृत कश्मीर। ऐसे मुद्दों की बात करते हुए काशी और मथुरा को मत भूलिए। इन सब मुद्दों के मूल में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। ऐसे मुद्दे आते रहेंगे और उन पर काम होता रहेगा। मोदी के इस कार्यकाल में अभी तीन पांच अगस्त और आने वाले हैं।

सोमनाथ मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा में राजेंद्र प्रसाद थे और राम मंदिर के भूमि पूजन में पीएम मोदी

अजीब संयोग है कि सोमनाथ मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद शामिल हुए थे और राम मंदिर के भूमि पूजन में प्रधानमंत्री मोदी। नेहरू के विरोध के बावजूद राजेंद्र बाबू सोमनाथ गए। नेहरू इसे हिंदू पुनर्जागरण के रूप में देख रहे थे। आज उसी कांग्रेस के लोग भविष्य के कदमों की आहट सुन नहीं पा रहे। सोमनाथ मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद राजेंद्र प्रसाद ने जो भाषण दिया वह दूसरे दिन सब अखबारों में छपा, लेकिन महान जनतांत्रिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पुरोधा नेहरू ने सुनिश्चित किया कि सरकारी माध्यम उसे सेंसर करें। मोदी सरकार ने फैसला किया कि राम मंदिर के कार्यक्रम का सरकारी संचार माध्यम दूरदर्शन से प्रसारण हो।

मोदी के अश्वमेघ के घोड़े को इस समय रोकने वाला कोई नहीं है

मोदी के अश्वमेघ के घोड़े को इस समय रोकने वाला कोई नहीं है। हिंदू विरोध की राजनीति का विकल्प समाप्त हो गया है। वीर सावरकर ने कहा था कि भारत को पितृ भूमि और पुण्य भूमि मानने की प्रवृत्ति ही हिंदुत्व का लक्षण है। तीन तलाक के खिलाफ कानून बनने, अनुच्छेद 370 हटने और अब अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद आगे क्या? यह सवाल भाजपा समर्थक और विरोधी दोनों पूछ रहे हैं। ये काम भाजपा, मोदी सरकार और संघ परिवार का लक्ष्य नहीं। ये लक्ष्य के रास्ते के मील के पत्थर हैं।

राम मंदिर का निर्माण भारत की गरिमा की पुनर्स्थापना का पर्व है

राम मंदिर का निर्माण भारत की गरिमा की पुनर्स्थापना का पर्व है। कहते हैं कि धर्म की रक्षा दो तरह से होती है, शास्त्र से और शस्त्र से, पर यह दौर बताता है कि धर्म की रक्षा उसके अनुयायियों की आस्था से भी होती है। 492 साल तक राम भक्तों की आस्था अडिग रही। अयोध्या में भव्य राम मंदिर उसी आस्था का प्रतिफलन है। सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के मौके पर राजेंद्र प्रसाद ने कहा था-विध्वंस से बड़ी ताकत निर्माण की होती है। पूरी दुनिया अयोध्या में निर्माण की इस शक्ति की साक्षी बन रही।

( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं )

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