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केंद्रीय विद्यालयों में मौजूदा जर्मन भाषा की जगह संस्कृत पढ़ाए जाने का विवाद तूल पकड़ता जा रहा है। देश की मौजूदा भाषा और शिक्षा नीति के संदर्भ में यह अच्छा ही हुआ, क्योंकि इससे कई सबक सीखे जा सकते हैं। पूरे विमर्श में सत्ता, संस्कृति और समाज की कई दरारें भी झांकती हैं। देश में लगभग ग्यारह सौ केंद्रीय विद्यालय हैं, जिनमें अस्सी हजार छात्र पढ़ते हैं। इनमें से सत्तर हजार तीसरी भाषा के रूप में छठी से आठवीं तक जर्मन भाषा पढ़ रहे हैं। जर्मन पढ़ाने का फैसला 2011 में हुआ था। यह क्यों और किन परिस्थितियों में हुआ, इसके लिए एक समिति का गठन किया गया है। लेकिन क्या ऐसे फैसले हमारी शिक्षा व्यवस्था में उस राष्ट्रीय भाषा नीति के खिलाफ नहीं है जिसकी सिफारिश पहली बार कोठारी आयोग ने 1964-66 की अपनी रिपोर्ट में की थी और इसे फिर 1986 की शिक्षा नीति और 2005 की शिक्षा नीति में भी दोहराया गया। जाने-माने शिक्षाविद, वैज्ञानिक, प्रशासक डॉ. दौलत सिंह कोठारी ने उपशीर्षक 'नई भाषा नीति' में त्रिभाषा सूत्र की सिफारिश की थी। यानी एक मातृभाषा, दूसरी अंग्रेजी जो बाकी दुनिया से जुडऩे का माध्यम है और तीसरी कोई और प्रादेशिक भाषा जैसे उत्तर भारत के लिए कोई दक्षिण की और दक्षिण के लिए हिंदी। अपनी सिफारिश में उन्होंने यह भी कहा था कि राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क भाषा के रूप में हिंदी को बढ़ावा दिया जाए। फिर किन कारणों से त्रिभाषा सूत्र में दो विदेशी भाषाएं अंग्रेजी और जर्मन आ गईं? और जब तीन वर्ष का अनुबंध सितंबर 2014 में समाप्त हो गया तो इतना बवाल क्यों?

दूसरी दरार मध्यवर्गीय मानसिकता की है। केंद्रीय विद्यालयों में पढऩे वाले ज्यादातर बच्चे उन सरकारी कर्मचारियों के होते हैं जिनका जगह-जगह स्थानांतरण होता है। ये अमीर वर्ग तो नहीं, लेकिन देश की मौजूदा गरीबी को देखते हुए अच्छा खासा संपन्न वर्ग है। यही कारण है कि इनमें से नब्बे प्रतिशत ने भारतीय भाषाएं सीखने के बजाय अंग्रेजी के साथ-साथ जर्मन सीखना शुरू किया। इसके कुछ कारण यह भी हो सकते हैं कि जर्मन, जापानी या दूसरी भाषाओं में संख्या बढ़ाने के प्रयोजन से नंबर खूब लुटाए जाते हैं। जिस सरकार ने 2011 में संघ लोक सेवा परीक्षा की सिविल सेवा परीक्षा के सी-सैट में भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी लाद दी उसी ने न जाने किन प्रलोभनों में केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन की शुरुआत करा दी। यदि इसकी जगह संस्कृत या दूसरी देसी भाषा अनिवार्य की जाती तो शायद देश में कोहराम मच जाता। महात्मा गांधी, टैगौर से लेकर दुनिया भर के शिक्षाविद शिक्षा और समझ के लिए अपनी भाषाओं की वकालत करते रहे हैं।

गांधीजी का कहना था कि विदेशी भाषा एक खिड़की की तरह है और ज्ञान जहां से भी आ सकता हो उसे आने देना चाहिए। ज्ञान और समझ के बारे में सभी इस बात से सहमत हैं कि जितनी भाषाएं हैं उतने ही विस्तृत ज्ञान। इसलिए अंग्रेजी या जर्मन सीखना कोई गलत नहीं है, गलत है उसका असमय बच्चों पर लाद देना। प्रोफेसर यशपाल ने 1992 में 'बस्ते के बोझ' की अपनी प्रसिद्ध रिपोर्ट में किताबों और परीक्षा के दबाव की बात कही थी। उसमें भी यदि देखा जाए तो जितना वजन अंग्रेजी सिखाने का होता है उतना किसी और विषय का नहीं। कम से कम हिंदी पट्टी के राज्यों के सर्वेक्षणों से यह बात बार-बार जाहिर होती है कि अंग्रेजी सीखना उनके लिए कितना मुश्किल है। अब इसमें एक और जर्मन भाषा भी लाद दी जाए तो आप समझ सकते हैं कि बस्ते का वजन कितना बढ़ जाएगा। एक और महत्वपूर्ण पक्ष भाषा की उपयोगिता और बच्चे के विकास का है। क्या सिर्फ नंबरों की होड़ के लिए संस्कृत अथवा जर्मन पढ़ी जाए? या क्या इसकी रोजाना की जिंदगी में भी कोई प्रासंगिकता है? इस कसौटी पर दोनों ही भाषाएं भारतीय संदर्भ में बहुत कमजोर लगती हैं। भाषा हम समाज से सीखते हैं और वही समाज उसके विकास में सहायक होता है। आप जर्मन, रूसी या जापानी किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत पढ़ते भी हैं लेकिन यदि उसका उपयोग नहीं कर पाते तो उसे भूलने में भी देर नहीं लगती। यही बात संस्कृत के साथ है। रोजाना की जिंदगी में शायद ही आपको कोई संस्कृत बोलता नजर आए। बावजूद इसके संस्कृत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि संस्कृत यदि पढ़ाई गई तो भविष्य में देश की सभी भाषाओं के साथ जुडऩे का आधार बनता है। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यन ने अपनी नई किताब 'द टर्निग प्वाइंट' में लिखा है कि शुरू की शिक्षा बांग्ला भाषा में हुई और फिर माध्यमिक शिक्षा में संस्कृत पर जोर रहा। कॉलेज स्तर पर अंग्रेजी माध्यम। इस पृष्ठभूमि में जब उन्होंने उत्तर प्रदेश में एक आइएएस अधिकारी के रूप में काम किया तो हिंदी सीखने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। हिंदी के इसी संपर्क भाषा की कल्पना तो हमारे संविधानविदों ने की थी। यानी संस्कृत समेत भारतीय भाषाओं को इस ढंग से आगे बढ़ाया जाए कि पूरा देश अंग्रेजी के कुछ दशकों के बाद हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में अपना ले, लेकिन ऐसा सपना लगातार बिखरता गया। हिंदी या हिंदुस्तानी को समृद्ध करने की जरूरत है और मौजूदा प्रधानमंत्री के कामों से यह स्पष्ट भी है।

जर्मन, जापानी, चीनी के विभाग विश्वविद्यालयों में हों, स्कूली पाठ्यक्रम में नहीं। यहां तक कि अंग्रेजी भी धीरे-धीरे विदा होनी चाहिए। बौद्ध धर्म भारत में पैदा हुआ, लेकिन क्या यह हमें चीन के साथ संबंधों में कोई मदद कर पा रहा है? या एक ही विरासत पाकिस्तान से सतत तनाव को कम कर पा रही है? नए राजनयिक संबंधों का आधार नए आर्थिक-सांस्कृतिक समीकरण ज्यादा हैं, अतीत की बातें नहीं। एक और भी विचाराधीन प्रश्न है कि यदि कल जापान, चीन या फ्रांस भी अपनी भाषाओं को भारतीय स्कूलों में पढ़ाए जाने के लिए जिद करें तो क्या यह हमारी शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के साथ अन्याय नहीं होगा? भारतीय संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सबक सीखने की जरूरत यह है कि अपनी भाषा और संस्कृति के लिए यूरोप का एक देश जर्मनी जिस स्तर पर संवाद, विमर्श में पूरी ताकत झोंक रहा है, क्या भारत ने भी कभी भारतीय भाषाओं के लिए इस स्तर पर आवाज उठाई? भारत में तो और उल्टा हो रहा है। भारतीय भाषाएं न शिक्षा में बची हैं न नौकरियों में।

(प्रेमपाल शर्मा: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Posted By: Rajesh Niranjan

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