[ विकास सारस्वत ]: सभ्यताओं एवं साम्राज्यों ने सदा से ही अपनी श्रेष्ठता और उत्कर्ष का प्रदर्शन स्थापत्य और वास्तुकला के माध्यम से भी किया है। इस स्थापत्य ने न सिर्फ विशिष्ट शैलियों को जन्म दिया, बल्कि अपने जातीय संस्कार, र्धािमक कल्पनाओं और जीवन दर्शन को मूर्त रूप देकर भावी पीढ़ियों के अवलोकन तथा समीक्षा के लिए ठोस विरासत भी दी। इस प्रयास ने हमारे लिए किले, परकोटे, शहर, महल, रंगमंच और मंदिरों आदि के रूप में यूनान से लेकर चीन तक और पेरू से लेकर भारत तक ऐसी विरासत छोड़ी जिस पर समस्त मानवता गर्व कर सकती है, परंतु इसी बीच पश्चिम एशिया से कुछ ऐसी सभ्यताओं का भी उदय हुआ जिनमें सृजन की जगह विध्वंस हावी रहा। अरब के मरुस्थल और कठोर जीवन से निकली इन सभ्यताओं में न तो स्थापित मानव मूल्यों का महत्व था और न ही दूसरी सभ्यताओं की र्धािमक भावनाओं का लिहाज। उनके लिए मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर अपने धर्मस्थल बना लेना पूर्ण विजय एवं मजहबी श्रेष्ठता का प्रतीक बन गया। कई बार विधर्मियों के पूजा स्थलों में मामूली परिवर्तन करके उन्हें कब्जा लिया गया।

सीरिया के पामायरा मंदिर से शुरू हुआ विध्वंस बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को तोड़ने तक चलता रहा

चौथी शताब्दी में सीरिया के पामायरा मंदिर से शुरू हुआ विध्वंस का यह सिलसिला अब तक बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को तोड़ने तक चलता रहा है। यदि कहीं कोई संशय था कि बामियान में बुद्ध की मूर्तियां तोड़ने वाला तालिबान किसी सभ्यता की विचारगत मुख्यधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करता तो यह भ्रम भी हाल में टूट गया। पिछले सप्ताह प्रगतिशील यूरोपियन यूनियन के सदस्य और एक जनतांत्रिक देश तुर्की ने छठी शताब्दी के विश्वविख्यात बाइजेंटाइन चर्च हागिया सोफिया को मस्जिद में बदल दिया।

मस्जिद में तब्दील हुई हागिया सोफिया को एक संग्रहालय बना दिया था 

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने कमाल अतातुर्क सरकार के 1934 के उस फैसले को पलट दिया, जिसके तहत 1434 में इस्तांबुल पर कब्जे के बाद उस्मानी सल्तनत द्वारा मस्जिद में तब्दील हुई हागिया सोफिया को एक संग्रहालय बना दिया था। अपने निर्णय के प्रति प्रतिबद्धता जताने के लिए एर्दोगन ने वहां जुमे की नमाज भी पढ़ी। अद्भुत पच्चीकारी, महाकाय मध्यकक्ष, सुनहरी छतों और विराट मेहराब वाली हागिया सोफिया, जिसे तुर्की में ‘आया सोफिया’ बुलाते हैं, न सिर्फ बाइजेंटाइन संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक है, बल्कि एशिया माइनर (आज के तुर्की), पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के स्थापत्य पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।

कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार ने अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम चेतना को कभी उद्वेलित नहीं किया

इस इमारत को संग्रहालय में बदलते वक्त अतातुर्क सरकार ने बड़े जतन से उन ईसाई रूपांकनों को दीवारों से कुरेदकर निकलवाया था जिन्हें पंद्रहवीं शताब्दी में प्लास्टर से ढक दिया गया था, परंतु एर्दोगन शासन में तुर्की ने यह सिद्ध किया कि इस्लामी देशों में धर्मनिरपेक्षता और सर्व धर्म समभाव के प्रयोग चार छह दशक भले ही खिंच जाएं, परंतु वह कुछ देशों की मूल प्रकृति बदलने में नाकामयाब रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति कर्नल जमाल अब्दुल नासिर के बाद का मिस्न, शाह शासन के बाद का ईरान और मलेशिया, इंडोनेशिया में बदली राजनीतिक धारा भी इस बात की तस्दीक करती है। इस मूल प्रकृति में मजहबी प्रभुत्व और संकीर्णता इस प्रकार हावी रही है कि यजीदी या कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार ने अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम चेतना को कभी उद्वेलित नहीं किया, बल्कि धर्माभिमान और श्रेष्ठता के बोध ने मतावलंबियों की नजर में इस्लामी विस्तारवाद को अपना नैतिक दायित्व माना। हागिया सोफिया का मस्जिद बनना इसी विस्तारवाद का प्रतीक है।

वह यूरोप जो कभी इस्लामी विस्तारवाद का प्रतिस्पर्धी था, आज थक चुका है

चाहे वह तुर्की, पाकिस्तान या मलेशिया की आक्रामकता हो या यूरोप में पहुंचे शरणार्थियों की शरिया की जिद, किसी प्रभावशाली चुनौती के अभाव में यह विस्तारवाद निरंतर और निरंकुश रूप में जारी है। वह यूरोप जो कभी इस्लामी विस्तारवाद का प्रतिस्पर्धी था, आज थक चुका है। सामरिक या बौद्धिक-किसी भी प्रकार के मुकाबले के लिए उसकी हिम्मत टूट चुकी है। यहां तक कि यूरोप समेत पूरे पाश्चात्य जगत में इस्लामी अलगाव और चरमपंथ के बचाव ने बड़े उद्योग का रूप ले लिया है। इस परिप्रेक्ष्य में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण अंतरराष्ट्रीय महत्व का विषय बन जाता है।

प्राचीन सभ्यताओं में भारत ही वह एकमात्र सभ्यता है जिसने अपनी सांस्कृतिक अक्षुण्णता बनाए रखी

प्राचीन सभ्यताओं में भारत ही वह एकमात्र सभ्यता है जिसने विस्तारवादी ताकतों को चुनौती देते हुए अपनी सांस्कृतिक अक्षुण्णता बनाए रखी है। एक बड़ा भूभाग खोने के बावजूद और हजारों मंदिरों के तोड़े जाने के बाद भी समय-समय पर तुर्कों, ईरानियों, अरबों, डचों और पुर्तगलियों द्वारा कब्जाए गए पूजास्थलों को वापस पाने के लिए भारतीय सभ्यता ने निरंतर संघर्ष किया है। अपनी पुस्तक-‘द फ्लाइट ऑफ डेटीज’ में इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने मुल्तान से लेकर केरल के गुरुवायूर तक तोड़े गए मंदिरों के पुर्निनर्माण की कई कथाओं का वर्णन किया है। अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन इसी कड़ी का एक महत्वपूर्ण और समकालीन पड़ाव है। पांच शताब्दियों तक चले इस संघर्ष के बारे में विख्यात लेखक नीरद चौधरी का मानना था कि कोई भी आत्माभिमानी समाज गुलामी के प्रतीकों को इस प्रकार सहन नहीं कर सकता।

नोबेल विजेता वीएस नायपॉल ने अयोध्या आंदोलन को ऐतिहासिक जागरण बताया था

नोबेल विजेता लेखक वीएस नायपॉल ने अयोध्या आंदोलन को आहत भारतीय सभ्यता का ऐतिहासिक जागरण बताया था। किसी प्रकार के ग्लानिभाव को नकारते हुए नायपॉल ने मंदिर तोड़कर बनाई गई बाबरी मस्जिद के गिरने को ऐतिहासिक संतुलन की पुनस्र्थापना करने वाला एक रचनात्मक कृत्य बताया। नायपॉल का स्पष्ट मत था कि ‘अयोध्या में आक्रांताओं द्वारा पवित्र जन्मस्थान पर मस्जिद का निर्माण अपमान स्वरूप किया गया। यह उस प्राचीन विचार का अपमान था जो राम के रूप में (भारत में) दो-तीन हजार साल से विद्यमान है।’

पांच अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन जन-जन की धर्मनिष्ठा का सम्मान है

पांच अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन जन-जन की धर्मनिष्ठा का सम्मान और ऐतिहासिक अपमान का प्रतिकार भी है। साथ ही सभ्यताओं के द्वंद्व में यह विस्तारवाद से कभी हार न मानने का भारतीय संकल्प भी है। इस संकल्प और प्रतिबद्धता के अभाव में दुनिया कहां पहुंचेगी, हागिया सोफिया इसकी मिसाल है। अपनी सौम्यता और उदारता पर गर्व करने वाला यूरोप एर्दोगन की करतूत से सकते में है, परंतु उसके समक्ष असहाय सा है। भविष्य की दृष्टि से दोनों स्थापत्यों की तुलना जहां राम मंदिर को दासता से मुक्ति और एक सृजनात्मक सभ्यता के पुनरुत्थान के प्रतीक के रूप में याद रखेगी वहीं हागिया सोफिया लूटपाट, छीनाझपटी और परधर्मियों के प्रति इस्लामी असहिष्णुता की एक और मिसाल बन कर रह जाएगा।

( लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं स्तंभकार हैं )

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