अशोक श्रीवास्तव। बीते तीन दशकों में कई बार श्रीनगर आना हुआ, पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि एयरपोर्ट पर टैक्सी नहीं मिली। लेकिन इस बार हवाई अड्डे से सेना के एक डॉक्टर की कार में लिफ्ट मांग कर जाना पड़ा। एक दिन पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में अनुच्छेद 370 को लेकर जो एलान किया था, उससे जम्मू और लद्दाख में तो जश्न का माहौल था, लेकिन कश्मीर ने जैसे रहस्यमय चुप्पी ओढ़ ली थी। पिछले सप्ताह जब एक बार फिर श्रीनगर पहुंचा तो एयरपोर्ट पर खासी चहल-पहल थी। स्वास्थ्यकर्मियों और डॉक्टरों की टीम श्रीनगर पहुंचने वाले हर यात्री का कोरोना टेस्ट कर रही थी। यह आशंका जरूर थी कि पता नहीं कोरोना की रिपोर्ट में क्या निकले, लेकिन सच कहूं तो पहली बार कश्मीर के माहौल को लेकर मन में कोई डर या आशंका नहीं थी।

सबसे बड़ा बदलाव ये है कि यहां दशकों से अटकी पड़ी विकास परियोजनाओं ने रफ्तार पकड़ ली है। जिस जम्मू-कश्मीर में बरसों से दिल्ली से जाने वाला पैसा चंद नेताओं और अधिकारियों की तिजोरियों में पहुंच जाता था, अब वह जमीन पर बदलाव लाता दिख रहा है। अनुच्छेद 370 को हटाने के एलान के कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा था कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के कारण इसे विकास से वंचित रखा गया। इसके कुछ दिन बाद मीडिया के एक हिस्से ने बिहार व उत्तर प्रदेश के कुछ आंकड़े उठाए और जम्मू-कश्मीर के साथ उनकी तुलना करते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि विकास के पैमाने पर जम्मू-कश्मीर कई राज्यों से कहीं आगे है और अनुच्छेद 370 का विकास से कोई लेना-देना नहीं है।

पर सच तो यह है कि कश्मीर को आंकड़ों के चश्मे से देखने वाले यहां की सच्चाई को या तो जानते नहीं या जानबूझकर सच से मुंह चुरा रहे हैं। सच यह है कि अनुच्छेद 370 और इससे मिले विशेषाधिकारों ने जम्मू-कश्मीर को भ्रष्टाचार और कभी न खत्म होने वाले इंतजार के सिवाय कुछ नहीं दिया। दरअसल अनुच्छेद 370 हटने के बाद केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि विकास परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए। प्रधानमंत्री स्वयं अधिकांश विकास परियोजनाओं की प्रगति पर नजर बनाए रहते हैं। इसका असर यह है कि उड़ी के पहाड़ी इलाकों में मैंने रात आठ बजे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़कें बनती हुई देखीं। दरअसल सरकार ने एलान किया है कि अगले एक से दो वर्षों में जम्मू-कश्मीर की 11 हजार किमी लंबी सड़कों को पूरी तरह से दुरुस्त कर दिया जाएगा।

दो बड़े उदाहरण और हैं। कश्मीर जाने वाला हर व्यक्ति श्रीनगर की डल झील के शिकारे में बोटिंग का आनंद जरूर लेता है। पर कम ही लोग वुलर झील के बारे में जानते हैं। बांदीपुरा में स्थित वुलर झील ताजे पानी की एशिया की सबसे बड़ी झील है। करीब 130 वर्ग किमी में फैली इस झील में डल से भी ज्यादा पर्यटकों को लुभाने की संभावनाएं हैं। पर वर्षों पहले वुलर झील लगभग मृतप्राय हो गई। वर्ष 1990 में ही इसे जल संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय महत्व की झील माना गया और तब से लेकर अब तक इसकी साफ-सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए गए हैं, पर नतीजा ढाक के पात रहा। अब जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद वुलर के संरक्षण के लिए चल रहे काम में गंभीरता आई, जिम्मेदारी तय की गई। परिणामस्वरूप बीते दो माह में झील के करीब 1.6 वर्ग किमी क्षेत्र में गाद को पूरी तरह से निकाल कर पानी भर दिया गया है।

अंत में बात केसर की। कश्मीर को कभी केसर की क्यारी कहा जाता था, क्योंकि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ केसर यहीं उगती है। लेकिन कई कारणों से कश्मीर में केसर का उत्पादन लगातार कम होता गया। बीते करीब तीन दशकों में कश्मीर में केसर के उत्पादन में 80 प्रतिशत की कमी आई। वर्ष 2010 में केंद्र सरकार ने केसर का उत्पादन बढ़ाने के लिए करीब 400 करोड़ की पूंजी के साथ चार वर्षीय नेशनल सैफरन मिशन शुरू किया। इसके तहत करीब 150 बोरवेल लगाने थे जिनमें से आधे भी नहीं लगे हैं, जो लगे हैं वे सूखे पड़े हैं। हालात ये हैं कि कश्मीर के कई किसानों ने केसर के खेतों में सेब के बगीचे लगा लिए हैं।

पर बीते एक साल में केंद्र सरकार ने केसर की खेती को फायदेमंद बनाने के लिए एक के बाद एक बड़े कदम उठाए हैं। हाल ही में कश्मीरी केसर को -जीआइ टैग- मिल गया है जो यहां के किसानों की बहुत पुरानी मांग थी। जल्द ही पुलवामा में एशिया के सबसे आधुनिक और बेहतरीन स्पाइस पार्क का उद्घाटन होने जा रहा है, जहां केसर की खेती करने वाले किसानों के लिए हर तरह की सुविधाओं के साथ-साथ मार्केटिंग का भी इंतजाम किया गया है।

करीब एक सप्ताह तक उत्तर से दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों का दौरा करने के बाद मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि इसी जज्बे और रफ्तार के साथ राज्य की विकास परियोजनाओं पर काम चलता रहा तो बहुत जल्द हम नया जम्मू-कश्मीर देखेंगे।

[वरिष्ठ पत्रकार, डीडी न्यूज]

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