[सतीश सिंह]। Coronavirus भारत कोरोना के तीसरे चरण की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जो भारतवासियों के लिए चिंता का सबब है। इस विपत्ति के समय में स्वास्थ्य कर्मियों के अलावा भी अनेक योद्धा हमारी दिनचर्या को सरल और सामान्य बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। बैंकर्स भी उन्हीं में से एक हैं, लेकिन उनके योगदान की चर्चा न तो सरकार कर रही है और न ही आम आदमी। यह निश्चित रूप से दुखद स्थिति है। आज जरूरत इस लड़ाई में शामिल सभी लोगों की हौसला अफजाई करने की है।

कोरोना के बढ़ते खतरे के बीच भी सैकड़ों ग्राहक रोज बैंक आ रहे हैं। कस्बाई और ग्रामीण इलाकों में बैंक शाखाओं में सामान्य परिस्थिति वाले दिनों की तरह ग्राहकों की रोज भीड़ जुट रही है। नकदी की लेनदेन, पासबुक अपडेट कराने के आलावा वे अपने अन्य वित्तीय जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। कोई ग्राहक कोरोना से संक्रमित नहीं हो इसके लिए बैंक शाखाओं में सैनिटाइजर्स का इंतजाम किया गया है। बैंक शाखा में साफ-सफाई का ध्यान भी रखा जा रहा है। ग्राहकों को एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने के लिए भी कहा जा रहा है।

शहरों के लॉकडाउन होने के बाद भी बैंकर्स बैंक जा रहे हैं, जबकि वे जानते हैं कि उनके संक्रमित होने का बहुत ज्यादा खतरा है। अमूमन, कैशियर और सिंगल विंडो ऑपरेटर करेंसी का लेनदेन करते हैं। ग्राहक मुख्य तौर पर नकदी जमा करने और निकासी करने का काम कर रहे हैं। सिंगल विंडो ऑपरेटर पासबुक अपडेट करने और पैसों को अंतरित करने का काम भी कर रहे हैं। इन सारे कार्यों को करने में कोरोना से संक्रमित होने का डर बना रहता है, क्योंकि करेंसी में या पासबुक में कोरोना का वायरस चिपका हुआ हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बैंकर्स डॉक्टर नहीं हैं। उन्हें कोरोना से बचने के तरीके नहीं मालूम हैं। इस वजह से भी उनके संक्रमित होने का जोखिम ज्यादा रहता है। सच कहा जाए तो कभी भी बैंकर्स के योगदान की महत्ता को कभी स्वीकार नहीं किया गया है। लगता है लोगों की नजरों में वित्त से जुड़े कामकाज की कोई अहमियत नहीं है, जबकि दैनिक जीवन में वित्तीय जरूरतों को पूरा किए बिना हम एक भी कदम आगे नहीं बढ़ सकते हैं।

प्रधानमंत्री जनधन योजना को सफल बनाने के लिए बैंककर्मियों ने बिना अवकाश लिए रोज देर तक बैठकर लगभग तीस करोड़ खाते खोले हैं। डिजिटल लेन-देन को बढ़ाने के लिए सभी खाताधारकों को रुपे कार्ड दिए गए हैं। सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के खाते में सीधे पैसा अंतरित करने की संकल्पना को बैंककर्मियों ने ही साकार किया है, जिससे भ्रष्टाचार में कमी आई है और करोड़ों किसान, कामगार और मजदूर लाभान्वित हुए हैं। इसके आलावा बैंकर्स ग्रामीणों, मजदूरों और अन्य कमजोर तबके के लोगों को वित्तीय रूप से लगातार जागरूक करने का काम भी कर रहे हैं।

जब प्रधानमंत्री मुद्रा योजना का आगाज हुआ तब भी बैंककर्मियों ने दिन-रात एक करके सरकार द्वारा दिए गए लक्ष्यों को हासिल किया। आज भी इस योजना को सफल बनाने के लिए बैंककर्मी दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। बैंककर्मियों की मेहनत की वजह से ही देश में करोड़ों की संख्या में रोजगार सृजित हुए हैं। वर्ष 2016 के नवंबर में नोटबंदी की घोषणा के बाद बैंककर्मियों को गंभीर संकट का सामना करना पड़ा था। नोटबंदी की घोषणा के महीनों के बाद भी दिन-रात बिना सोए हुए बैंककर्मी आम जनता की जरूरतों को पूरा करते रहे थे। नोटबंदी को सफल बनाने का काम बैंककर्मियों ने ही किया था, लेकिन इसका श्रेय कभी भी उन्हें नहीं दिया गया। कोरोना के बारे में अभी भी जागरूकता प्रसारित करने की आवश्यकता है। बहुत सारे लोग, जिसमें पढ़े-लिखे लोग भी शामिल हैं, इसकी गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं।

मौजूदा समय में जरूरत है कि हम कस्बाई, गांवों और दूरदराज इलाकों में रहने वाले लोगों को इस आपदा के बारे में बताएं और जागरूक करें। सिर्फ सावधानी बरत कर ही हम इसकी धार को कुंद कर सकते हैं, क्योंकि देश में आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर आभाव है। आबादी के अनुसार देश में न तो पर्याप्त अस्पताल हैं और न ही जरूरी मेडिकल उपकरण आदि उपलब्ध हैं। इसमें दो राय नहीं है कि आज बैंककर्मी कोरोना के खतरे को जानने के बावजूद भी अपनी सेवा दे रहे हैं। इसलिए हमें उनका मनोबल बढ़ाने की जरूरत है। इनके साथ ही हमें स्वास्थ्य कर्मियों, सफाई कर्मियों, दूरसंचार क्षेत्र में काम करने वालों, पुलिस, प्रशासन, बिजली एवं जल आपूर्ति को सुनिश्चित करने वाले कर्मियों आदि का भी शुक्रिया अदा करना चाहिए, जो अपनी जान जोखिम में डालकर हमारी सेवा में दिन-रात लगे हैं।

[आर्थिक मामलों के जानकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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