[उमेश चतुर्वेदी]। बेशक सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला राम मंदिर पर ही दिया है, लेकिन आने वाले दिनों में बाकी ऐतिहासिक और मिथकीय महत्व वाली विवादित जगहों के लिए भी उदाहरण के तौर पर पेश किया जाएगा। कम से कम वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर और मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ही बतौर नजीर पेश किया जाएगा। वैसे भी विश्व हिंदू परिषद ने जब राम मंदिर का आंदोलन छेड़ा था, तब उसके एजेंडे में अयोध्या की राम जन्मभूमि के साथ ही वाराणसी का विश्वनाथ मंदिर और मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि को भी अतिक्रमण से मुक्त कराना था।

हालांकि राम मंदिर पर सुप्रीम फैसला आने के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने दी है, उससे इन मामलों को तत्काल उठाने पर संशय है। संघ प्रमुख ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि राम मंदिर के फैसले को जय या पराजय के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए।

आर्थिक और सामाजिक मंच पर पूरी ताकत

सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही नहीं, दूसरे संगठनों की प्रतिक्रियाओं से भी जाहिर है कि अब वे भी मानने लगे हैं कि मौजूदा हालात में देश की सबसे बड़ी जरूरत आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर आगे बढ़ना है। दुनिया के किसी भी समाज को देखिए, वह अपने सांस्कृतिक गौरव की ओर तब और ज्यादा शिद्दत से बढ़ता है, जब वह आर्थिक और सामाजिक रूप से ज्यादा मजबूत होता है। हालांकि प्रगतिवादी मान्यता रही है कि आर्थिक और सामाजिक मंच पर पूरी ताकत से स्थापित हो चुके राष्ट्र और समाज सांस्कृतिक गौरव बोध को भुला देते हैं। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। प्रगतिवादी सोच मानती रही है कि जैसे-जैसे भारतीय समाज आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक रूप से आगे बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे वह अपने सांस्कृतिक गौरव से बेपरवाह होता जाएगा।

मीर बकी ने खाली जगह पर मस्जिद नहीं बनाई

सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खोदाई में मिले साक्ष्यों को ही आधार मानते हुए फैसला दिया है कि मीर बकी ने खाली जगह पर मस्जिद नहीं बनाई थी। विश्व हिंदू परिषद ही नहीं, व्यापक हिंदू समाज का भी तो यही आरोप है कि जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है, उसी मुगलिया सल्तनत काल में सनातन समाज पर राजकीय हमले हुए, उसकी आस्थाओं के केंद्रों को निशाना बनाया गया। उनके मंदिर तोड़े गए और वहां मस्जिदें बनाई गईं। इसके बाद इसी दौर में भक्तिकालीन कवियों- सूरदास, तुलसीदास आदि ने हिंदू समाज को जागृत किया।

कालांतर में आए तमाम बदलावों के बाद वर्ष 1986 के बाद आई नई शिक्षा नीति के बाद से अनेक मान्यताओं को किनारे किया गया। इसी दौर में राम मंदिर आंदोलन परवान चढ़ता है। सनातन समाज यह समझ नहीं पाया कि गंगाजमुनी संस्कृति के नाम उसके साथ अतीत में हुए दुव्र्यवहार और उससे जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों को क्यों नकारा जा रहा है। निश्चित ही तब की सत्ताधारी ताकतों ने अपने राजनीतिक हित के लिए इस तरह के विचार को पोषित किया।

दरअसल तत्कालीन सत्ताधारी ताकतें अल्पसंख्यक मानस की एक विशेषता का दोहन करती रहीं। अल्पसंख्यक मानस हमेशा बहुसंख्यक के मुकाबले खुद को एक रखता है। लेकिन यह भी तब होता है, जब उसे यह ध्यान दिलाया जाए कि बहुसंख्यक समाज से उसे खतरा है। डरी हुई अल्पसंख्यक एकता का मानस राजनीतिक महापर्व में थोक के भाव से एकतरफा मत के रूप में समर्थन देता रहा है। भारतीय राजनीति जिस मोड़ पर इन दिनों खड़ी है, उसमें तत्काल अभी किसी और बड़े आंदोलन की संभावना नहीं है। देश के सामने अगले कुछ वर्षों में पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला देश बनने का लक्ष्य है।

इच्छा शक्ति कितनी मजूबत

अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर भारत को मजबूती से खड़ा करने के उद्देश्य को साकार तभी किया जा सकता है, जब ऐसे आंदोलनों से कम से कम इस प्रक्रिया के पूरी होने तक दूरी बनाई जाए। तब राम मंदिर की तरह के दूसरे लक्ष्यों को भी हासिल करना आसान होगा। वैसे भी नरेंद्र मोदी- अमित शाह की जोड़ी ने दिखा दिया है कि उनकी इच्छा शक्ति कितनी मजूबत है। उसे जब राजनीतिक आधार मिला तो उसने अनुच्छेद 370 के विवादित प्रावधानों को खत्म करने के साथ ही तीन तलाक के जरिये मुसलमान समुदाय की महिलाओं को न्याय दिलाने के असंभव समझे जाने वाले कामों को जमीन पर उतार दिया है। भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख राजनीतिक मुद्दा राम मंदिर का निर्माण, समान नागरिक संहिता और जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाना रहे हैं।

अतीत में भाजपा राजनीतिक मजबूरियों की वजह से इन लक्ष्यों को कुछ वक्त के लिए मुल्तवी भी करती रही है। लेकिन अब परिदृश्य बदला हुआ है। अनुच्छेद 370 के विवादित अंश बीती हुई बात हो चुके हैं, राम मंदिर के लिए सर्वोच्च अदालत ने रास्ता बना दिया। इसलिए भाजपा का समर्थक वर्ग उम्मीद कर सकता है कि जल्द ही वह बाकी लक्ष्यों को हासिल कर सकती है। भाजपा के प्रति उसके समर्थक आधार वर्ग का यह भरोसा बाकी विवादित मुद्दों से कम से कम कुछ हद तक दूर रखने के दबाव वर्ग के रूप में कार्य करेगा।

मैं खुश हूं कि आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया-इकबाल अंसारी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना भी हो रही है। प्रगतिशील ताकतों ने एक तरह से अल्पसंख्यक वर्ग को उकसाते हुए सुप्रीम कोर्ट के लिए कहना शुरू कर दिया है कि उसने मान लिया है कि अल्पसंख्यक दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। अगर सबसे अच्छी प्रतिक्रिया किसी की मानी जा सकती है तो वह है इकबाल अंसारी की। उन्होंने कहा है कि यह मसला बहुत अहम था, जो अब खत्म हो गया। मैं खुश हूं कि आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया। मैं कोर्ट के फैसले का सम्मान करता हूं। राम मंदिर आंदोलन में बतौर मुस्लिम पक्षकार लड़ते रहे इकबाल की प्रक्रिया इसका संदेश है कि देश को अगर आगे बढ़ना है तो इसी फैसले के साथ आगे बढ़ना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मुस्लिम पक्ष के मस्जिद के दावे को भी स्वीकार किया है और उसे अलग पांच एकड़ जमीन देने का आदेश दिया है। बाबा रामदेव ने कहा कि मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक भूमि आवंटित करने का निर्णय स्वागत योग्य है। रामदेव ने कहा कि उनका मानना है कि हिंदू भाइयों को मस्जिद के निर्माण में भी मदद करनी चाहिए। इन बयानों के साथ जिस तरह देश ने इस फैसले पर समझदारी दिखाई है, वह भी यह जाहिर करने के लिए काफी है कि देश बदल रहा है।

[वरिष्ठ पत्रकार]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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