एक-हजार और पांच-सौ रुपये बंद करने के फैसले को लेकर संसद में गतिरोध बना हुआ है। पांचवें दिन भी संसदीय कार्यवाही बाधित रही और संपूर्ण विपक्ष ने संसदीय परिसर में गांधी प्रतिमा पर धरना दिया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी चाहते थे कि प्रधानमंत्री सदन में आएं, पूरी बहस सुने और उत्तर दें। वह नोटबंदी को घोटाला बताकर उसकी जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की मांग भी कर रहे हैं। बुधवार को प्रधानमंत्री सदन में आए, लेकिन राहुल ने अपना स्टैंड बदल दिया और कहा कि चर्चा केवल ‘स्थगन-प्रस्ताव’ द्वारा ही हो, जिसे स्पीकर ने अस्वीकार कर दिया। नोटबंदी के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और आंतरिक-सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर बहस करने के बजाय संसद की कार्यवाही रोकना समझ से परे है। अगर संसद में बहस नहीं हो सकती तो फिर कहां हो सकती है? इतने बड़े देश में नोटबंदी लागू करने पर कुछ तो दिक्कतें तो होनी ही थीं। प्रधानमंत्री ने देश से 50 दिन मांगे थे, लेकिन ऐसा लगता है कि 20-25 दिनों में ही सामान्य स्थिति बहाल हो जाएगी। बैंकों में लाइने कम हो गई हैं, एटीएम बेहतर काम करने लगे हैं और साधारण लोगों में पहले जैसी घबराहट नहीं रही। अब लंबी लाइनों का भी रहस्य खुलने लगा है। आम आदमी के अलावा, बैंकों की लाइन में ज्यादातर वे लोग लगे जो अपने नहीं किसी और की काली कमाई सफेद करा रहे थे। किसी धनकुबेर के 4000-4500 रुपये को सफेद करने में मजदूरों को बिना काम किए 400 रुपये मिल रहे थे। जीरो बैलेंस से खुले जन-धन खातों में भी लोगों ने काली-कमाई जमा कराई। स्याही के इस्तेमाल और नोट बदलने की राशि में कटौती किए जाने से इस पर कुछ रोक लगी।
लाइन में लगने वालों ने जिस तरह कष्ट सह कर भी पूरे देश में कहीं कोई विशेष अप्रिय घटना नहीं होने दी वह लोकतंत्र में गुणात्मक सुधार के लिए आम नागरिक की प्रतिबद्धता दिखाता है। उसे लगता है कि कोई बड़ा काम हुआ है। उसे पता नहीं कि इसका आगे क्या असर होगा, लेकिन उसका मानना है कि मोदी का कदम कालेधन वाले अमीरों के खिलाफ और गरीबों के हित में है। ताज्जुब यह कि बड़े व्यापारी भी खुश हैं, इसके बावजूद कि फिलवक्त उनके व्यवसाय में मंदी आई है। वे भी चाहते हैं कि कोई ऐसी व्यवस्था बने कि न उन्हें टैक्स चोरी करना पड़े, न घूस देना पड़े। नोटबंदी के मुद्दे पर जनता के भी कुछ सवाल हैं। पहला सवाल यही है कि क्या सरकार कुछ और बेहतर तैयारी से नोटबंदी नहीं कर सकती थी? नए नोट का साइज क्यों छोटा किया गया? इसके चलते लाखों एटीएम को ‘रीकैलिब्रेट’ करना पड़ा। जब 86 प्रतिशत मुद्रा एक-हजार और पांच-सौ रुपये के रूप में थी तो उतनी मुद्रा की व्यवस्था पहले ही क्यों नहीं हुई? रबी की बुवाई और शादियों के मौसम की अनदेखी क्यों की गई? ऐसे सवाल भी हैं कि यदि छह माह से तैयारी चल रही थी तो दो हफ्ते बाद भी बैंकों में पर्याप्त नकदी क्यों नहीं पहुंच पा रही? दो हजार का नोट क्यों लाया गया? इन सवालों के साथ जनता के मन में यह टीस भी है कि काम तो अच्छा है, लेकिन बेहतर तैयारी से किया जाना चाहिए था। ऐसा होता तो विपक्ष को संसदीय गतिरोध का मौका नहीं मिलता। कुछ नेताओं जैसे अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी ने तो नोटबंदी पर जनता को उकसाने की भी कोशिश की।
चूंकि भाजपा के भी अनेक नेता और व्यापारी भी नोटबंदी के शिकार हुए हैं इसलिए वे भी मोदी के फैसले से खुश न होंगे। तमाम व्यापारी, नौकरशाह आदि के बारे में जनता मानती है कि कुछ अपवादों को छोड़ कर इनमें से अधिकतर के पास काला धन है। वे अपना काला धन कहां ले जाएं? जाहिर है कि वे नोटबंदी के फैसले को असफल करने की भी कोशिश करेंगे। क्या मोदी सरकार की उनसे निपटने की क्या कोई योजना है? नकदी संकट के कारण एक सवाल यह भी उभरा है कि क्या मोदी को इस फैसले से कोई राजनीतिक नफा-नुकसान भी होगा? क्या कुछ दिनों का कष्ट वाकई भाजपा के प्रति लोगों में नाराजगी भरेगा? यदि हां तो क्या वह नाराजगी इतनी होगी कि भाजपा के विरुद्ध वोटों में तब्दील हो? मोदी का निर्णय लोकलुभावन नहीं, वरन दवा की कड़वी घूंट जैसा है। अब जनता को यह फैसला लेना है कि उसे कालेधन और भ्रष्टाचार के मर्ज के साथ भावी पीढ़ी को जीने देना है या उससे निजात पाना है? वह जो भी फैसला ले, जब कुछ दिनों में बैंकों का कामकाज सामान्य होगा तो जनता शुरुआती कष्ट भूल जाएगी और चर्चा इस पर होगी कि क्या नोटबंदी से उसे कुछ राहत मिली? क्या कीमतों में कुछ गिरावट आई? क्या भ्रष्टाचार पर लगाम लगा? क्या आतंकवाद और नकली नोटों पर अंकुश लगा? कुछ लोगों का मानना है कि आगामी चुनावों में भाजपा को नोटबंदी का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
लोकतंत्र में निर्णयों की नैतिकता और उसके औचित्य का मानक लोक-स्वीकृति है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब आदि में चुनावों पर इसका जो भी प्रभाव पड़े, लेकिन लोकसभा के लिए मोदी ने अपनी जगह बना ली है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव खुश दिखते हैं। सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। न केवल अखिलेश का पार्टी में वर्चस्व स्थापित हो गया, वरन सपा में एका भी हो गया। मायावती को जरूर कष्ट है और उसकी वजह भी समझी जा सकती है। बिहार में नीतीश कुमार प्रसन्न हैं। उन पर रौब गांठने वाले लालू यादव का आर्थिक दबदबा लड़खड़ा गया। नि:संदेह वे राजनेता भी खुश होंगे जो संसाधन विहीन हैं और चुनाव लड़ना चाहते हैं, क्योंकि इस बार चुनावों में कालेधन का अभाव होगा और चुनाव प्रचार के बहुत खर्चीले होने की संभावना कम है। प्रधानमंत्री ने संकेत दिया है कि भ्रष्टाचार, कालेधन और आतंकवाद पर प्रहार के लिए आगे भी कड़े निर्णय लिए जाएंगे, लेकिन अच्छा होगा यदि वे जनता को विश्वास में लें। वैसे तो नोटबंदी का आम जनता ने स्वागत किया है, फिर भी यदि रिजर्व बैंक कुछ बेहतर तैयारी और तालमेल से इस निर्णय को अंजाम देता तो शायद जनता को शुरुआती दिनों में हुए कष्ट से बचाया जा सकता था। नोटबंदी एक प्रसव-पीड़ा की भांति है जो संभवत: गरीब जनता को भविष्य में राहत देगी।
[ लेखक डॉ. एके वर्मा, वरिष्ठ स्तंभकार एवं सेंटर फॉर द स्टडी अॉफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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