[केशव प्रसाद मौर्य]। श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का इतिहास अशोक सिंहल के स्मरण के बिना अधूरा है। अशोक जी भले ही परंपरागत रूप से संत न हों, लेकिन उनका जीवन किसी मायने में संत से कम नहीं। एक ऐसा संत जिसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था अयोध्या में रामजन्मभूमि पर रामलला का भव्य मंदिर निर्माण करना। इसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया।

सनातन धर्म में उनकी आस्था शंकराचार्य की तरह और दुनिया भर में हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार करने की उनकी मंशा स्वामी विवेकानंद जैसी थी। हिंदू समाज को सशक्त और सामथ्र्यवान बनाने तथा एकजुट रखने के लिए वह जीवनपर्यंत सक्रिय रहे। इसके लिए वह अनगिनत मठों, मंदिरों और आश्रमों में गए।

घूम-घूमकर हिंदुत्व को दी एक नई पहचान

उन्होंने केवल देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में घूम-घूमकर हिंदुत्व को एक नई पहचान दी और उसका गौरव जगाया। अपने नाम को सार्थक करने वाले अशोक जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद नौकरी के फेर में नहीं पड़े। काशी के बाबा विश्वनाथ के आशीर्वाद स्वरूप शायद उनके हाथों से भगवान श्रीराम का वह अद्भुत कार्य होना था जो इतिहास में अमिट रूप से दर्ज हो गया। इसका माध्यम बना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसके आजीवन पूर्णकालिक प्रचारक बनकर उन्होंने समाज सेवा का व्रत लिया। उन्होंने लाखों लोगों को रामजन्मभूमि आंदोलन से जोड़ा जो राष्ट्रीय भावनाओं के प्रकटीकरण का भी साक्षी बना।

इंदिरा गांधी के निरंकुश आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष करने वाले अशोक सिंहल जी 1981 में डॉ. कर्ण सिंह के नेतृत्व में होने वाले विराट हिंदू सम्मेलन के सूत्रधार भी थे। इसके उपरांत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें विश्व हिंदू परिषद के कार्य में लगा दिया।

रामजन्मभूमि आंदोलन का हुआ श्रीगणेश

1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में धर्म संसद का आयोजन हुआ। अशोक जी उसके संचालक थे। यहीं से रामजन्मभूमि आंदोलन का श्रीगणेश हुआ। जो भी व्यक्ति इस आंदोलन से जुड़ा वह रामजन्मभूमि के इतिहास का एक स्वर्णिम पन्ना बन गया। इस आंदोलन के दौरान उनकी सभाओं में हिंदुत्व को जगाने वाली उनकी सिंह सरीखी आवाज जिसके कानों में पड़ती उसके पैर वहीं ठहर जाते। उनकी अगुआई में लाखों कारसेवकों ने देश की तमाम पवित्र नदियों के तटों पर राम मंदिर की स्थापना के लिए शपथ ली। उनके एक आह्वान पर लाखों लोग हुंकार भरने के लिए तैयार हो जाते थे।

1986 में रामजन्मभूमि का ताला खोलने का आदेश 

अशोक जी करीब 20 वर्षों तक विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। यह कहने में हर्ज नहीं कि उन्होंने अपनी सोच से देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा ही बदल दी। यह उनकी जीवटता की एक अनोखी मिसाल थी कि 1984 के बाद रामजन्मभूमि को लेकर उनके सतत प्रयासों के कारण ही केवल दो साल बाद 1986 में रामजन्मभूमि का ताला खोलने का आदेश हो गया। इसी के साथ वहां निर्बाध रूप से दर्शन-पूजन होने लगा।

1989 में राम मंदिर का शिलान्यास 

इसके बाद 1989 में पूज्य देवरहा बाबा की मौजूदगी में शिलान्यास पूजन का निर्णय लिया गया और लाखों कारसेवक अयोध्या की ओर कूच कर गए। उसी वर्ष 9 नवंबर को राम मंदिर का शिलान्यास हुआ। इसके साथ ही एलान हुआ कि 30 अक्टूबर 1990 को जन्मभूमि की मुक्ति के लिए कारसेवा होगी, लेकिन तब अयोध्या को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने छावनी में तब्दील कर दिया।

मुलायम सिंह ने कारसेवकों पर गोली चलाने का दिया आदेश 

मुलायम सिंह ने यह एलान भी कर दिया कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता, लेकिन अशोक जी वहां पहुंचकर ही माने। उनके साथ लाखों लोग भी पहुंचे। इसके दिन दो बाद मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाने का हुक्म दे दिया। पुलिस लाठी चार्ज में अशोक जी भी घायल हुए, लेकिन उनका संकल्प नहीं टूटा। उलटे इस घटना ने उनमें और उत्साह भर दिया। 

आजादी के बाद सबसे विशाल रैली

इस घटना के बाद उनके नेतृत्व में 4 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के बोट क्लब पर आजादी के बाद अब तक की सबसे विशाल रैली हुई जिसमें तकरीबन 25 लाख लोग जुटे। अशोक जी की यह क्षमता देखकर देश की राजनीति में भूचाल सा आ गया। इसका एक परिणाम यह हुआ कि मुलायम सिंह सरकार घुटनों के बल आ गई और अशोक जी देश के मानस पटल पर छा गए। वह देश की राजनीति को प्रभावित करने लगे, जबकि वह सक्रिय राजनीति में नहीं थे। 

संतों और महात्माओं का लिया आशीर्वाद 

अशोक जी के पहले हिंदू समाज ने संतों और राजाओं के नेतृत्व में रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए कई बार संघर्ष और आंदोलन किया, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। अशोक जी ने उनके सफल न होने के कारणों का बारीकी से अध्ययन किया। वह सबसे पहले हिंदू समाज को एक धारा में लाए। उन्होंने संतों और महात्माओं का आशीर्वाद लिया और धर्म संसद का आयोजन किया। उन्होंने अपनी व्यूह रचना से एक असंभव कार्य को संभव करके दिखा दिया। अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद उन्होंने रामजन्मभूमि स्थल पर रामलला का भव्य मंदिर का नक्शा बनवाया जो प्रस्तावित राम मंदिर का मॉडल है। इसके साथ ही उन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए श्री रामजन्मभूमि न्यास का गठन भी कराया। संतों और महात्मा की नजरों में अशोक जी स्वयं एक संत हो गए थे।

सिंघल ने कहा था, जब मोदी बनेंगे देश के पीएम तब बनेगा राम मंदिर

अशोक जी अत्यंत दूरदर्शी थे। वह समय की आहट को बखूबी पहचान लेते थे। अपने जीवन के अंतिम क्षण तक वह राम मंदिर के लिए प्रतिबद्ध रहे। 2013 में प्रयाग कुंभ की धर्म संसद में उन्होंने घोषणा की थी कि जब नरेंद्र मोदी के देश के प्रधानमंत्री बनेंगे तभी अयोध्या में राम जन्म स्थान पर मंदिर निर्माण का कार्य प्रशस्त होगा।

जब मई 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो अशोक जी ने कहा था कि 800 साल बाद कोई हिंदू शासक आया है और अब कोई ताकत राम मंदिर के निर्माण को रोक नहीं सकती, मगर 17 नवंबर 2015 को उनका देहावसान हो गया। उनकी स्मृति हम सबके मानस पटल पर अटल है जो हरेक पल उनकी जीवंतता और उपस्थिति का अहसास कराती है। उनकी यह स्मृति राम मंदिर के प्रति हमारे संकल्प का भी स्मरण कराती है।

 

(लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं)

Posted By: Dhyanendra Singh

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