[प्रशांत मिश्र]। अरुण जी के संबोधन से लोकप्रिय रहे अरुण जेटली प्रखर राजनीतिज्ञ और विख्यात कानूनविद् से पहले सच्चे दोस्त थे। मेरी लगभग तीन दशक की पहचान में उन्होंने कभी भी इस राय में बदलाव नहीं आने दिया। बड़ी बात यह है कि जिस तरह मैं उनकी दोस्ती का दावा कर रहा हूं, ऐसे लोगों की संख्या दो-चार में नहीं, बल्कि दो-चार सौ में होगी। दोस्तों की इतनी बड़ी कतार को संभालकर रखना ही साबित करता है कि वह कितने बड़े दिल के व्यक्ति थे।

वीपी सिंह की सरकार थी और तब वह संभवत: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल हुआ करते थे, जब पहली मुलाकात हुई थी। उनकी बातचीत के लहजे, तर्कपूर्ण संवाद, अनौपचारिक व्यवहार के कारण एक सम्मोहन सा अनुभव हुआ था और वह लगातार बना रहा। एक पत्रकार को बताने के लिए उनके पास बहुत कुछ होता था, लेकिन उन्होंने दोस्ती को दोस्ती तक सीमित रखा। राजनीतिज्ञों की एक बड़ी ख्वाहिश होती है कि वह किसी न किसी कारण से अखबारों मे छपते रहें। लेकिन अरुण जी में कभी यह ललक नहीं दिखी। हालांकि वह दिल्ली में मीडिया के लिए लोकप्रिय व्यक्तित्व रहे, लेकिन अपनी ओर से उन्होंने कभी भी प्रयास नहीं किया।

एक सच्चे दोस्त की तरह वह आंखों में झांककर दिल की खुशी और बोझ को अक्सर जान लिया करते थे और फिर उनकी पूरी कोशिश होती थी कि उस कमी को दूर किया जाए। मुझे याद है कि वह केंद्र में मंत्री थे, जब मैं एक सहयोगी के भाई के लिए मदद मांगने गया। मुश्किल काम था, लेकिन उनसे बताकर आया और कुछ दिनों में सूचना मिली कि काम हो गया। अरुण जी ने अपनी ओर से मुझे कुछ नहीं बताया। यह था उनका बड़ा दिल।

उनकी इसी सहृदयता के कारण मैं बेझिझक उनसे कभी भी कुछ कह बैठता था। मैं जानता था कि राजनीति की इतनी बड़ी शख्सियत की कई व्यस्तताएं होती हैं, लेकिन मैं किसी भी आयोजन में जाने की मांग कर देता था। कभी कभार मना भी करते थे, लेकिन अक्सर यह देखा कि देर-सबेर वह खुद पूछते थे कि कब चलना है। एक वक्त की बात है, वह लखनऊ आए हुए थे। कई बड़े नेताओं के साथ उनकी बैठक चल रही थी।

इसी बीच उन्होंने मुझे भी बुला लिया और बातों-बातों में बोले-पंडित जी मेरे राजगुरु भी हैं। यह मुझे ऐसी कई सलाह देते हैं जो कोई दूसरा नहीं दे सकता है। उन नेताओं के बीच मेरे महत्व को स्थापित करने के लिए उन्होंने यह कहा था। दरअसल मैंने उन्हें एक दो बार कुछ लोकसभा सीटों के बारे में सुझाव दिया था, जहां से उन्हें चुनाव लड़ने के बारे में सोचना चाहिए था। मैं केवल अपनी बात कह रहा हूं, लेकिन इसका प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं कि ऐसे कई लोग थे, जिन्हें अरुण जी दोस्त मानते थे और निभाते थे। बदले में उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए होता था।

वह 2014 में अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तो मेरे एक परिचित ने चुनाव में मदद करनी चाही, लेकिन अरुण जी ने साफ मना कर दिया। वह हर किसी के बारे में पूरी जानकारी रखते थे और हर किसी की संवेदनशीलता का ख्याल रखते थे। काश कि यह गुण हम सब में आ सके कि दोस्तों की जमात साथ लेकर चल सकें, तो शायद दुनिया ही बदल जाए। अरुण जी का नहीं होना सिर्फ एक व्यक्ति के न होने जैसा नहीं है। उनकी विदाई से राजनीति में एक विचार की विदाई हो गई है। एक ऐसी सोच की विदाई हो गई है, जो विरोधी भावनाओं को भी इज्जत दे। जो विरोधी विचारधारा के लोगों से भी दोस्ती निभा सके बिना शर्त। सही मायने में अरुण जी ने लोगों को जीवन कला का मंत्र दिया है।

(लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)

Posted By: Amit Singh

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