ऊंट भारतीय सेना का हमेशा से एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। आज भी सीमा सुरक्षा बल के पास ऊंटों की एक बड़ी संख्या है जो रेगिस्तानी सीमा पर चैकसी करने, गश्त लगाने और सेना से जुड़े आवागमन के अन्य कामों में लगे हुए हैं। जैसलमेर और राजस्थान के पाकिस्तान से सटे सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा का पूरा जिम्मा इन्हीं पर है। ऊंट सीमापार से घुसपैठियों व तस्करों को पकड़ने में मददगार साबित होते हैं। सीमा प्रहरी होने के अलावा ऊंट यहां के रेतीले, दुगर्म इलाकों में डाक वितरण व आवागमन के लिए भी इस्तेमाल में लाए जाते हैं। इसके बावजूद आज राज्य में ऊंटों की घटती संख्या चिंता पैदा कर रही है। सीमा सुरक्षा बल को भी पर्याप्त मात्र में ऊंट नहीं मिल रहे हैं। राजस्थान और ऊंट के बीच गहरा रिश्ता है, बल्कि कहा जाए कि ऊंट ही राजस्थान की पहचान हैं और उसकी आर्थिक रीढ़ भी। राजस्थान के दूरदराज के इलाकों में ऊंट का इस्तेमाल सवारी ढोने और समान ढोने में किया जाता है। कृषि कार्यो के लिए ऊंट एक आदर्श पशु है। राजस्थान के लगभग 11 रेतीले जिलों में जहां आवागमन के अन्य साधनों का इस्तेमाल यहां के दुर्गम रास्तों के कारण कर पाना संभव नहीं हो पाता, वहां पर मात्र ऊंट गाड़ी ही सवारी व माल ढोने का एक मुख्य साधन है। सवाल यह भी पैदा होता है कि जिस राज्य की पूरी अर्थव्यवस्था ही ऊंट पर टिकी है फिर कैसे ऊंटों की संख्या में कमी हो रही है?

‘इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कन्जर्वेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सिस’ द्वारा इसे लुप्तप्राय जीवों की श्रेणी में रखा गया है। इसकी अंधाधुंध तस्करी का ही नतीजा है कि पिछले दस सालों में इसकी आबादी में लगभग एक चैथाई की कमी आई है। दस साल पहले राज्य में आठ लाख ऊंट पाए जाते थे, लेकिन आज इनकी संख्या दो लाख से भी कम रह गई है। मजे की बात यह है कि राजस्थान में बहुतायत में पाया जाने वाला यह जानवर तस्करी के द्वारा अब दक्षिण भारतीय राज्यों और पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी पहुंच रहा है। जुलाई 2014 में राजस्थान सरकार द्वारा कानून बनाकर ऊंट को संरक्षित करने के लिए इसे ‘राज्य पशु’ का दर्जा दिया गया था। कानूनन इन्हें मारने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। इनकी खरीद फरोख्त पर भी कड़ा प्रतिबंध लगा देने के बावजूद राजस्थान के साप्ताहिक बाजारों और मेले में इनकी जमकर खरीद-फरोख्त होती है।

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा इसे मारने और खाने पर प्रतिबंध लगा देने के बावजूद इन्हें मारे जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। इनकी तस्करी को रोकने के लिए कर्नाटक सरकार द्वारा ऊंटों के राज्य में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा देने के बावजूद इनकी अवैध तस्करी से जुड़े गुट इन्हें राज्य में ले आते हैं। केरल सरकार द्वारा भी राज्य में ऊंट का मांस खाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देने के बावजूद हर साल इनकी न केवल तस्करी होती है, बल्कि इनकी कुर्बानी भी दी जाती है। विकट और विषम स्थितियों में कांटेदार पौधों व वृक्षों को खाकर अपना पेट भरकर संतुष्ट रहने वाले ऊंट की दिनोंदिन घटती आबादी राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक खतरे की घंटी है। इनकी घटती आबादी से जहां सीमा सुरक्षा व्यवस्था को खतरा हो सकता है वहीं यह राजस्थान के आम लोगों के जीवन को भी संकट में डाल सकता है। राजस्थान की आन, बान और शान का प्रतीक ऊंट का बेतहाशा और गैर कानूनी ढंग से मारा जाना भारत की लचर कानून व्यवस्था की ओर इंगित करता है। राजस्थान में लगातार कम होते चारागाह और आहार चारे की उपलब्धता और गुणवत्ता में कमी, जलवायु परिवर्तन, अकाल एवं सूखे की स्थिति के कारण पहले से ही इनकी आबादी कम हो रही है। ऐसे में अगर मानव की इन कारगुजारियों का सिलसिला यूं ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब राजस्थान की पहचान दिखाने वाला यह ऊंट केवल लोगों की स्मृतियों का एक हिस्सा बनकर रह जाएगा।

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Posted By: kishor joshi

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