संजय गुप्त: अयोध्या में विवादित ढांचे के ध्वंस के तीन दशक बाद हिंदुओं की आस्था के दो प्रमुख स्थल-वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा का कृष्ण जन्मभूमि मंदिर चर्चा के केंद्र में हैं। आजादी के बाद ही हिंदुओं ने यह मांग उठाई थी कि अयोध्या, काशी, मथुरा आदि में जहां भी प्रमुख मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाई गईं, उन्हें उनके हवाले कर दिया जाए, लेकिन कांग्रेस ने इस मांग को अनसुना कर दिया। उसके नेताओं ने ऐसी कोई पहल नहीं कि गोरी, गजनवी, खिलजी, बाबर, औरंगजेब आदि ने हिंदू समाज को अपमानित करने के लिए उनके जिन मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट कर वहां मस्जिदें बनाईं, वे हिंदुओं को वापस मिल जाएं। जब अयोध्या विवाद अपने चरम पर था, तब नरसिंह राव सरकार ने एक ऐसा कानून बनाया, जिसके अनुसार देश के सभी धार्मिक स्थल उसी स्थिति में रहेंगे, जिसमें वे 15 अगस्त, 1947 को थे। इस कानून से केवल अयोध्या प्रकरण को बाहर रखा गया, क्योंकि यहां का मामला अदालतों में विचाराधीन था।

अयोध्या मामले के हल के लिए कई बार दोनों पक्षों के बीच बात तो हुई, लेकिन वह किसी नतीजे पर इसलिए नहीं पहुंच सकी, क्योंकि कई दल और वामपंथी नेता एवं इतिहासकर मुस्लिम नेताओं को सुलह न करने के लिए उकसाते रहे। ये लोग इसकी भी अनदेखी करते रहे कि हिंदू समाज किस तरह अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का आकांक्षी है। इस आकांक्षा को भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समझा और राम मंदिर आंदोलन को अपना सहयोग दिया। भाजपा-संघ ने हमेशा यही कहा कि इस मसले का हल या तो बातचीत से निकले या फिर न्यायपालिका के जरिये। आखिरकार लंबी प्रतीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला देते हुए जिस जमीन पर विवादित ढांचा था, उसे हिंदुओं को देने का निर्देश दिया। उसने मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में एक नई मस्जिद के निर्माण के लिए जमीन देने के आदेश भी पारित किए। हिंदू समाज की जितनी आस्था अयोध्या के राम मंदिर पर है, उतनी ही, बल्कि उससे अधिक काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रति भी है। यह एक तथ्य है कि औरंगजेब ने इस मंदिर परिसर में जबरन मस्जिद बनवाई। हिंदू समाज इस मस्जिद को देखकर सदियों तक अपमान के घूंट पीता रहा, लेकिन जब अयोध्या मामले में फैसला राम मंदिर के पक्ष में आया तो कुछ हिंदू फिर सक्रिय हुए। उन्हें तब और बल मिला, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्निर्माण कराया। इससे लोगों में काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रति आकर्षण और बढ़ा।

चूंकि ज्ञानवापी परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर में 1991 तक हिंदू नियमित पूजा करते थे, इसलिए काशी विश्वनाथ धाम बनने के बाद कुछ हिंदू महिलाएं यह मांग लेकर अदालत गईं कि उन्हें पहले की तरह इस मंदिर में जाने की अनुमति मिले और इसका पता भी लगाया जाए कि ज्ञानवापी मस्जिद कहीं मंदिर को तोड़कर तो नहीं बनाई गई? इसी मांग पर वाराणसी के सिविल कोर्ट ने ज्ञानवापी परिसर की वीडियोग्राफी कराने के आदेश दिए। इस वीडियोग्राफी से संबंधित जो रिपोर्ट लीक हुई, उसके अनुसार मस्जिद में एक शिवलिंग भी है और उसकी दीवारों पर हिंदू धर्म के अनेक प्रतीक भी अंकित हैं। जहां शिवलिंग मिलने की बात कही जा रही है, वहां मुस्लिम समाज के लोग वजू किया करते थे। सिविल कोर्ट ने शिवलिंग वाले स्थान को सील करने के आदेश दिए। इसी के साथ उसने मुसलमानों को नमाज पढ़ने की छूट तो दी, लेकिन वजू का स्थान अन्यत्र बनाने को कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ इसी तरह का आदेश दिया और मामले को सिविल कोर्ट से वाराणसी की जिला अदालत के हवाले कर दिया। हालांकि मुस्लिम पक्ष वीडियोग्राफी को 1991 के धर्मस्थल कानून का उल्लंघन बता रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया कि यह कानून किसी स्थल के धार्मिक चरित्र का आकलन करने से नहीं रोकता। इस मामले में अंतिम अदालती फैसला कुछ भी हो, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यहां पर मंदिर को तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई, फिर भी मुसलमानों का एक वर्ग यह मानने को तैयार नहीं कि मंदिर का ध्वंस कर मस्जिद बनवाई गई। यह और कुछ नहीं साक्षात दिख रहे सत्य से मुंह मोड़ना है। कुछ मुस्लिम नेता तो काशी विश्वनाथ मंदिर का ध्वंस कराने वाले औरंगजेब की प्रशंसा में लग गए हैं। इससे हिंदू समाज का क्षुब्ध होना स्वाभाविक है।

मुसलमानों को यह समझना होगा कि उनके पूर्वज भारत भूमि के थे और वे हिंदू ही थे। वे गोरी, गजनी, खिलजी या बाबर के साथ भारत नहीं आए थे। यह भी किसी से छिपा नहीं कि इन विदेशी हमलावरों ने न केवल हिंदुओं को जबरन मुसलमान बनाया, बल्कि हिंदू समाज को अपमानित करने और उनके मनोबल को कुचलने के लिए तमाम मंदिरों को तोड़कर वहां मस्जिदें बनवाईं। इन विदेशी आक्रांताओं के इस दुष्कृत्य को भूला नहीं जा सकता। हालांकि इसे भुलाने के लिए वामपंथी इतिहासकारों ने सेक्युलरिज्म के नाम पर तमाम झूठ लिखा, लेकिन उसकी पोल रह-रहकर खुलती ही रही। इसके बाद भी कांग्रेस नेतृत्व वामपंथी इतिहासकारों की तरह यही कहता रहा कि अपमान भरे इतिहास को भुला देने के साथ ही मंदिरों की जगह जबरन बनाई गईं मस्जिदों को स्वीकार कर लेना चाहिए। यह संभव नहीं। कोई भी समाज अपनी आस्था और अस्मिता के प्रतीकों के साथ हुए अपमान को भूल नहीं सकता-तब तो और भी नहीं, जब सच को शरारत के साथ जानबूझकर छिपाया जा रहा हो।

आजादी के बाद होना तो यह चाहिए था कि जो अत्याचार इस्लामी हमलावरों ने हिंदुओं पर किए, उसे सही रूप में सामने रखा जाता और इस सच को आत्मसात किया जाता कि इन हमलावरों ने हिंदुओं को अपमानित करने के लिए उनके धर्मस्थलों का विध्वंस किया। यह दुख की बात है कि आजादी के बाद हमें न केवल झूठा इतिहास पढ़ाया गया, बल्कि अत्याचारी विदेशी हमलावरों का महिमामंडन भी किया गया। जो आज भी यह काम कर रहे हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए कि काशी, मथुरा के साथ अन्यत्र जहां भी मंदिरों पर मस्जिदें बनाई गईं, वे हिंदू समाज के लिए एक नासूर की तरह हैं। अब जब काशी और मथुरा के मामले अदालतों के समक्ष हैं, तब फिर कोई ऐसी पहल भी होनी चाहिए कि ऐसे मसले आपसी बातचीत से सुलङों। जो गलती अयोध्या मामले में हुई, वह आगे न दोहराई जाए, इसी में समाज और देश का हित है।

Edited By: Sanjeev Tiwari