मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

[संजय गुप्त]। आखिरकार पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम सीबीआइ से बच नहीं सके। हालांकि उन्होंने सीबीआइ की गिरफ्त से बचने की तमाम कोशिश की, लेकिन अदालतों की ओर से कोई राहत न मिलने के कारण उन्हें नाकामी ही मिली। वह सीबीआइ की रिमांड में इसलिए हैं, क्योंकि उन पर आरोप है कि उन्होंने आइएनएक्स मीडिया में अनुचित तरीके से विदेशी निवेश में मदद की और इसका लाभ उनके बेटे कार्ति की बेनामी कंपनियों को मिला। आइएनएक्स मीडिया पीटर और इंद्राणी मुखर्जी की कंपनी थी। जब बेटी की हत्या के मामले में इंद्राणी मुखर्जी से पूछताछ हो रही थी तो यह पता चला कि चिदंबरम के दखल से ही आइएनएक्स मीडिया में निवेश को मंजूरी मिली थी।

काले धन को सफेद करने का किया गया काम
वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड ने यह मंजूरी दी थी। मंजूरी करीब चार करोड़ रुपये की दी गई थी, लेकिन तीन सौ करोड़ रुपये से अधिक की राशि निवेश की गई। जांच एजेंसियों की मानें तो तय सीमा से अधिक निवेश करके काले धन को सफेद करने का काम किया गया। इसी मामले की जांच में सीबीआइ चिदंबरम को हिरासत में लेकर पूछताछ करना चाह रही थी।

सीबीआइ ने दीवार फांदकर किया गिरफ्तार
अग्रिम जमानत मिलते रहने के कारण वह ऐसा करने में सक्षम नहीं हो पा रही थी, लेकिन बीते दिनों जब दिल्ली उच्च न्यायलय ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी तो वह भूमिगत हो गए। जब सीबीआइ चिदंबरम की तलाश कर रही थी तो वह कांग्रेस के दफ्तर में प्रकट हुए। वहां उन्होंने खुद को निर्दोष बताया। जब तक सीबीआइ उन तक पहुंचती तब तक वह घर चले गए। आखिरकार सीबीआइ को उनके घर की दीवार फांदकर उन्हें गिरफ्तार करना पड़ा। इसके बाद सीबीआइ की विशेष अदालत ने उन्हें चार दिन के लिए रिमांड पर दे दिया।

जांच एजेंसियों से की लुका छिपी
चिदंबरम पूर्व केंद्रीय वित्त और गृह मंत्री ही नहीं, राज्यसभा सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के वकील भी हैं। उनका इस तरह घपले- घोटाले की चपेट में आना और गिरफ्तार होना अप्रत्याशित है। एक कुशल प्रशासक और काबिल वकील की छवि वाले चिदंबरम ने जिस तरह जांच एजेंसियों से लुका-छिपा की और जिन हालात में वह गिरफ्तार हुए उसने सारे देश का ध्यान आकर्षित किया।

खड़े हो रहे हैं कई सवाल
कांग्रेसी नेता उनका बचाव करते हुए सीबीआइ की कार्रवाई को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रहे हैं, लेकिन वह जिस तरह लगभग 27 घंटे तक सीबीआइ को चकमा देते रहे वह कई सवाल खड़े करता है। इस घटनाक्रम में सबसे ज्यादा सवाल इसे लेकर खड़े हो रहे हैं कि आखिर उन्होंने कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस करना जरूरी क्यों समझा?

आइएनएक्स मीडिया मामले का सच क्या है 
वैसे एक सवाल यह भी है कि सीबीआइ 27 घंटे तक चिदंबरम को ढूंढ क्यों नहीं पाई? सीबीआइ के बाद ईडी भी चिदंबरम से पूछताछ करना चाह रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि उनकी याचिका का निस्तारण होने तक ईडी उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकती। पता नहीं आइएनएक्स मीडिया मामले का सच क्या है, लेकिन यह तो जरूरी है ही कि जांच एजेंसियां चिदंबरम पर लगे आरोपों से संबंधित ऐसे साक्ष्य जुटाएं जो अदालत के समक्ष ठहर सकें। यह इसलिए, क्योंकि जांच एजेंसियां इस आरोप से दो-चार होती ही रहती हैं कि वे राजनीतिक दबाव में काम करती हैं। 

कांग्रेस चिदंबरम को दे रही क्लीनचिट
स्वाभाविक तौर पर चिदंबरम के मामले में भी ऐसे आरोप लगे हैं। कांग्रेस केवल चिदंबरम को केवल तंग करने का आरोप ही नहीं लगा रही है, बल्कि उन्हें क्लीनचिट भी दे रही है। बेहतर हो कि कांग्रेस इस पर ध्यान दे कि वह खुद अदालत का काम नहीं कर सकती। उसे इससे भी परिचित होना चाहिए कि जब वह सत्ता में थी तब भी सीबीआइ के दुरुपयोग के आरोप लगते थे। खुद सुप्रीम कोर्ट ने उसे पिंजरे में कैद तोता बताया था। यह भी नहीं भूला जा सकता कि सीबीआइ एक समय किस तरह गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह के पीछे पड़ी और उन्हें गिरफ्तार करके ही मानी थी। भारत में राजनीतिक भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। सभी इससे अवगत हैं कि संप्रग सरकार में किस तरह एक के बाद एक घोटाले हुए।

नेताओं और नौकरशाहों की साठगांठ
आइएनएक्स मीडिया मामला भी उसी दौर का है। हैरानी की बात यह है कि तमाम राजनीतिक घपलों-घोटालों के बावजूद हमारी शीर्ष जांच एजेंसियां बहुत कम लोगों को सजा दिला पाने में कामयाब हो पाती हैं। जो मामला जितने बड़े नेता से जुड़ा होता है उसमें जांच एजेंसियों की सफलता की दर उतनी ही कम रहती है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि नेताओं और नौकरशाहों की साठगांठ के कारण ही भ्रष्टाचार के बड़े मामलों की तह तक नहीं पहुंचा जाता। एक तो नेताओं से जुड़े मामलों की जांच में लंबा समय लगता है और दूसरे, ऐसे सुबूत नहीं जुटाए जा पाते जो अदालत में टिक सकें। 2जी मामले में ऐसा ही हुआ था जिसमें ए राजा भी आरोपित थे। इस मामले में सीबीआइ की ओर से जुटाए गए सारे सुबूत अदालत ने सिरे से खारिज कर दिए थे।

नेताओं और नौकरशाहों से जुड़े भ्रष्टाचार 
यदि भारत में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना है तो हर स्तर पर जांच एजेंसियों को सक्षम बनाना होगा। इसी के साथ उन्हें राजनीतिक दबाव से भी मुक्त रखना पड़ेगा। इसके लिए सरकारों के साथ जांच एजेंसियों को भी अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए सक्रिय होना होगा। चाहे चिदंबरम से जुड़ा आइएनएक्स मीडिया मामला हो या फिर राहुल-सोनिया गांधी से संबंधित नेशनल हेराल्ड मामला अथवा अन्य नेताओं से जुड़े और कई मामले-इन सबका निस्तारण यथाशीघ्र होना चाहिए। जब नेताओं या फिर नौकरशाहों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में समय रहते दूध का दूध और पानी का पानी नहीं हो पाता तो जांच एजेंसियों की बदनामी होने के साथ ही सरकारों की भी किरकिरी होती है। 

फिलहाल किसी के लिए यह कहना कठिन है कि चिदंबरम के मामले का निस्तारण कब और कैसे होगा, लेकिन यह ठीक नहीं कि जब किसी नेता के खिलाफ गंभीर आरोप लगते हैं तो उनके साथियों-समर्थकों की ओर से यह माहौल बनाया जाता है कि उन्हें राजनीतिक कारणों से परेशान किया जा रहा है। खुद आरोपों के घेरे में खड़े नेता भी अपने को पाक-साफ बताते हैं।

देश में भिन्न-भिन्न मापदंड अपनाए गए 
इसके विपरीत जब कोई कारोबारी किसी मुश्किल में फंसता है तो उसे तत्काल ही चोर- लुटेरा करार दिया जाता है। साधारण मामला होने पर भी उसे जमानत तक नहीं मिलती। आखिर जो तमाम राहत-रियायत नेताओं को मिल जाती है वह कारोबारियों को क्यों नहीं मिलती? वास्तव में यह वह सवाल है जो यह बयान करता है कि अपने देश में अलग-अलग लोगों के लिए किस तरह भिन्न-भिन्न मापदंड अपना लिए गए हैं। इन दोहरे मापदंडों का परित्याग किया जाना चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि प्रधानमंत्री वेल्थ क्रिएटर के प्रति सम्मान का भाव विकसित करने की जरूरत जता रहे हैं। इस जरूरत की पूर्ति तभी होगी जब जांच एजेंसियों की जवाबदेही भी तय की जाएगी। यह जवाबदेही नेताओं के मामले में भी तय होनी चाहिए और कारोबारियों के साथ-साथ आम लोगों के मामलों में भी।


(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)

 

Posted By: Dhyanendra Singh

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