अनु. 370 की समाप्ति जैसे असंभव कार्य की तरह राम मंदिर का निर्माण भी संभव हो गया। ये दोनों कार्य भारतीय इतिहास और संस्कृति में अमर रहने वाले हैं

देश की दिशा बदलने वाली तारीख:

5 अगस्त को दो काम: अनुच्छेद 370 का खात्मा, राम मंदिर के निर्माण से विश्व में भारत और भारतीय नेतृत्व की प्रतिष्ठा बढ़ी

[ हृदयनारायण दीक्षित ]: असंभव का संभव होना विस्मय होता है, लेकिन राष्ट्रीय अभिलाषा से जुड़ा असंभव संभव होकर उमंग, उत्सव और उल्लास लाता है। भारत के इतिहास में एक साल के भीतर दो राष्ट्रीय स्वप्न पूरे हो रहे हैं। आगामी 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की शुरुआत करने जा रहे हैं। मंदिर के लिए 500 वर्ष संघर्ष चला। इसमें रामभक्तों के रक्तपात का त्रासद इतिहास है। परिणाम सामने है।

एक साल पहले 5 अगस्त को संविधान के अनुच्छेद 370 का खात्मा किया गया था

इसी के साथ एक साल पहले इसी तिथि 5 अगस्त को संविधान के अनुच्छेद 370 का खात्मा किया गया था। भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद ने इसके लिए ही बलिदान दिया था। जैसे राम मंदिर निर्माण करोड़ों की भावना है वैसे ही अनुच्छेद 370 की समाप्ति राष्ट्रीय एकता, अखंडता और संप्रभुता की सिद्धि है। सो लोक में उमंग है। दोनों निर्णयों की अंतरराष्ट्रीय चर्चा है। दोनों की कामयाबी का श्रेय मोदी सरकार को है। दृढ़ इच्छाशक्ति से असंभव प्रकृति के कार्य भी संभव हो सकते हैं। मोदी ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है। दोनों से विश्व में भारत और भारतीय नेतृत्व की प्रतिष्ठा बढ़ी है। दोनों मसले भारतीय जनगणमन की कसक थे। दोनों ही शूल की तरह हृदय में चुभते थे।

अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए 500 साल तक चला संघर्ष

अयोध्या वैदिक काल से अब तक उपास्य नगरी है। श्रीराम ने यहीं जन्म लिया। भारत के शील, आदर्श और मर्यादा के पुरुषोत्तम श्रीराम राष्ट्रजीवन का मधु हैं। उनकी जन्मभूमि पर मंदिर था। 1528 में विदेशी लुटेरे बाबर के कारिंदे ने मंदिर गिराया, एक ढांचा बनाया। इसे बाबरी मस्जिद कहा गया। भारत के लिए यह राष्ट्रीय अपमान था। सो इस स्थान पर फिर से मंदिर बनाने के लिए लगातार संघर्ष चले। न्यायिक कार्यवाहियां चलीं। पूरे देश ने आंदोलन चलाया। बलिदान हुए। 500 साल कम नहीं होते, कई पीढ़ियां चली गईं।

बाबरी मस्जिद के भक्तों ने राजनीतिक कारणों से वाधा डाली फिर भी मंदिर के पक्षधर निराश नहीं हुए

बाबरी मस्जिद के भक्तों ने राजनीतिक कारणों से लगातार अड़ंगे डाले। मंदिर के पक्षधर निराश नहीं हुए, लेकिन मंदिर निर्माण असंभव जान पड़ता था। अनु. 370 का हटना भी तमाम लोगों की नजर में असंभव था। राजनीति ने दोनों का घोर सांप्रदायीकरण किया, पर दोनों राष्ट्रीय अपरिहार्यता थे। सांप्रदायिक राजनीति ने जम्मू-कश्मीर को विवादित क्षेत्र बनाया और श्रीराम मंदिर को बाबरी मस्जिद। कश्मीरी अलगाववादी राज्य को भारत का अंग नहीं मानते थे, लेकिन जम्मू-कश्मीर वैसे ही सांस्कृतिक भारत का अंग है जैसे अयोध्या, कुरु, पांचाल या मगध। संस्कृत के काव्य शास्त्र का विकास इसी क्षेत्र में हुआ। यहीं भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से आए सुकेश, शिवि आदि महाविद्वानों ने दार्शनिक पिप्पलाद से जीवन दर्शन पर प्रश्न पूछे थे। इसी प्रश्नोत्तर से दर्शन का ग्रंथ प्रश्नोपनिषद् बना। कल्हण ने राजतरंगिणी इतिहास यहीं रचा। आचार्य अभिनव गुप्त ने प्रत्यभिज्ञा दर्शन का तत्व निरुपण यहीं किया। यह क्षेत्र भारतीय संस्कृति दर्शन का गढ़ रहा, लेकिन सत्तावादी राजनीति के चलते यह भारत में होकर भी एकात्म भारत से पृथक था।

1949 में संविधान सभा ने अनु. 370 जोड़ा, कश्मीर के नेता स्वायत्तता राग गाने लगे

1949 में संविधान सभा ने अनु. 370 जोड़ा। कश्मीर के नेता स्वायत्तता राग गाने लगे। संविधान निर्माताओं ने उसे अस्थायी बनाया था। सांप्रदायिक राजनीति ने उसे भारत तोड़क बनाया। इसके खात्मे को लेकर संदेह थे, पर मोदी सरकार ने राष्ट्रभाव के अनुसार उसे हटाया। 5 अगस्त को एक साल पूरा हो रहा है। स्वाभाविक ही दोनों मसलों पर राष्ट्रीय उल्लास है। वास्तव में यह वह तिथि है जिसने देश को नई दिशा देने के साथ नया आत्मविश्वास भी दिया।

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर राष्ट्रीय अभिलाषा है

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर राष्ट्रीय अभिलाषा है। सो लड़ाई लंबी चली। भारत का मन आशा और निराशा के बीच डोलता रहा। कोर्ट के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने खोदाई की। मंदिर के तमाम साक्ष्य मिले। वामपंथी और कथित सेक्युलर एएसआई पर हमलावर हुए। कोर्ट में सुनवाई रोकने की मांग की गई कि अदालती फैसले का चुनाव में प्रभाव पड़ेगा। अड़ंगेबाजी ने निराशा का माहौल बनाया, लेकिन राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रहरी डटे रहे।

कोर्ट ने मामले को आपस में सुलझाने का मौका दिया, मगर बात सुलझी नहीं 

कोर्ट ने मामले को आपस में सुलझाने का मौका दिया, मगर यहां सुलझाने की बात ही नहीं थी। बाबरी राजनीति का जोर उलझाने में था। वह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को असंभव बनाने की रणनीति पर जुटी रही, लेकिन अनु. 370 जैसे असंभव कार्य की भांति राम मंदिर भी संभव हो गया। दोनों कार्य भारतीय इतिहास-संस्कृति में अमर रहने वाले हैं। ये भारतीय राष्ट्र राज्य की अमर जिजीवीषा की प्रत्यक्ष उपलब्धि हैं। सो इतिहास की उत्सवधर्मा राष्ट्रीय स्मृति बने रहेंगे।

सांप्रदायिकता की पराजय हुई और छद्म सेक्युलर आचरण का पर्दाफाश हुआ

दोनों घटनाओं का सिलसिलेवार इतिहास और परिणति भारतीय स्मृति में छा गई है। यह अन्य संदर्भों की तरह निष्क्रिय स्मृति नहीं रहेगी। यह भविष्य की तमाम चुनौतियों में राष्ट्रीय संप्रभुता और एकता की प्रेरक होगी। यह सामाजिक परिवर्तन की जड़ता को तोड़ेगी। यह भारतीय राजनीति के गुण धर्म और ध्येय निष्ठा को सकारात्मक बना सकती है। चूंकि सांप्रदायिकता की पराजय हुई है और छद्म सेक्युलर आचरण का पर्दाफाश हुआ है इसलिए दल-संगठन इससे सबक सीखकर प्रेरित भी हो सकते हैं। वे भी अपने आदर्शों-विश्वासों के लिए अभियान चला सकते हैं।

मोदी के नेतृत्व, नीति और संकल्प की प्रामाणिकता बढ़ी 

सत्तापक्ष स्वाभाविक ही उत्साह में है। दोनों मामलों में वोट बैंक लालसा नहीं थी। दोनों भाजपा के घोषणा पत्र में थे। उसकी विश्वसनीयता बढ़ी है। अन्य राष्ट्रीय चुनौतियों को हल करने में उसे सुविधा होगी। आर्थिक नीतियों को लागू करने में यह परिवेश सहायक होगा। इन दोनों मसलों से मोदी के नेतृत्व, नीति और संकल्प की प्रामाणिकता बढ़ी है।

जम्मू-कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र ले जाना ऐतिहासिक भूल थी

सेक्युलर राजनीति के ध्वजवाहक गलत निर्णयों पर पश्चाताप करें। उन्होंने तमाम अक्षम्य ऐतिहासिक निर्णय किए हैं। जम्मू-कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र ले जाना ऐतिहासिक भूल थी। अनु. 370 द्वारा राज्य को अतिविशिष्ट दर्जा देना गलत ही था। संविधान सभा में इसके पारित होते समय वरिष्ठ सदस्य मौलाना हसरत मोहानी ने विशेष दर्जे का विरोध किया था, लेकिन सब कुछ पहले से तय था। अलगाववादियों को तमाम सहूलियतें देना भी गलत था।

मंदिर के न्यायिक निर्णय और अनु. 370 के खात्मे को लेकर सारी आशंकाएं निर्मूल सिद्ध हुईं

राम मंदिर आंदोलन में रक्तपात हुआ। बाद में ढांचा गिरा। कई राज्य सरकारें बर्खास्त हुईं। राष्ट्रवादी विध्वंसक कहे गए और मंदिर विध्वंस के समर्थक सेक्युलर। इतिहास रोता रहा। अलगाववादी राजनीति हंसती रही। अब भारत को विभाजित समाज बताने वाले पुर्निवचार करें। दोनों मामलों में मजबूत राष्ट्रीय एकता की शक्ति प्रकट हुई है। मंदिर के न्यायिक निर्णय और अनु. 370 के खात्मे को लेकर सारी आशंकाएं निर्मूल सिद्ध हुईं। दोनों मसले राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता के सुदृढ़ साक्ष्य हैं। विश्वास है कि भारत दोनों मसलों से अर्जित ऊर्जा का सदुपयोग राष्ट्र की समृद्धि और अजेय राष्ट्र निर्माण में करेगा। आइए! राष्ट्रीय उमंग का सदुपयोग करें।

( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं )

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