[सुशील कुमार सिंह]। अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में बीते 22 सितंबर जब दिन के करीब 11 बज रहे थे तो भारत में रात हो रही थी। पूरी दुनिया की नजर एक ऐसे कार्यक्रम पर थी जहां से एक सर्वाधिक बड़े तो दूसरे सबसे पुराने लोकतंत्र के मुखिया का एक साथ और एक मंच पर संयुक्त गूंज होनी थी। बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक श्रोता और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक वक्ता की भूमिका में बने रहे।

मोदी ने जिस तरह एनआरजी स्टेडियम में उपस्थित 50 हजार से अधिक प्रवासी भारतीयों के बीच ट्रंप का परिचय दिया उससे यही लगा मानो मोदी नहीं, ट्रंप अमेरिका में अतिथि हैं और वे किसी चुनाव प्रचार में संबोधन देने आए हों। रोचक यह भी था कि मोदी ने कहा कि वर्ष 2017 में ट्रंप ने अपने परिवार से मिलाया था, आज मैं अपने परिवार से आपको मिलाता हूं। वाकई प्रवासी भारतीयों पर मोदी के इस कथन का बहुत गहरा असर हुआ होगा।

ह्यूस्टन में भारी तादाद में भारतीय मूल के लोग

गौरतलब है कि ह्यूस्टन में भारी तादाद में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इसके अलावा डलास भी टैक्सास की प्रमुख जगह है जहां प्रवासी भारतीय बहुतायत में हैं। टॉप 10 शहरों में शामिल ये शहर अमेरिका में सबसे ज्यादा भारतीय मूल के लोगों के लिए जाने जाते हैं। मोदी के संबोधन के लिए टैक्सास को चुने जाने के लिए यह एक बड़ी वजह है। शुरुआत में अंग्रेजी और बाद में धाराप्रवाह हिंदी में मोदी का संबोधन चलता रहा और ट्रंप इसका लुत्फ लेते रहे।

मोदी के संवाद 

मोदी का अमेरिका में जिस ढंग का प्रभाव दिखा उससे साफ है कि भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंध अन्य देशों से काफी अलग हैं। हालांकि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय भी मोदी के संवाद और संबंध कहीं अधिक गहरे थे। अबकी बार, ट्रंप सरकार का नारा हाउडी मोदी कार्यक्रम के दौरान ह्यूस्टन में जब गूंजा तब यह बात भी स्पष्ट हो गई कि एक बार फिर व्हाइट हाउस का रास्ता ट्रंप मोदी के सहारे समतल करने की फिराक में हैं। गौरतलब है कि 2016 के नवंबर माह में जब अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप चुने गए थे तब भारतीय मूल के अधिकांश लोगों ने डेमोक्रेटिक पार्टी से चुनाव लड़ रहीं हिलेरी क्लिंटन को वोट दिया था। देखा जाए तो ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी से आते हैं और भारतीय मूल के लोगों पर इस पार्टी की छाप उतनी सकारात्मक नहीं रही है।

ट्रंप की सियासी जमीन हुई मजबूत

अमेरिका में अगले साल नवंबर में फिर चुनाव होने हैं और ट्रंप एक बार फिर व्हाइट हाउस का सपना संजोए हुए हैं। नेशनल एशियन अमेरिकन सर्वे से इस बात का खुलासा हो चुका है कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों ने 2016 के चुनाव में ट्रंप के खिलाफ मतदान किया था। ऐसे में ट्रंप अपनी सियासी जमीन की मजबूती के लिए इन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में लगे हैं। इसके लिए मोदी के संबोधन से बेहतर शायद ही कोई बात हो सकती थी। ह्यूस्टन में ट्रंप के साथ खड़े मोदी और मोदी के साथ खड़े ट्रंप के कई अर्थ हैं जिसमें से एक अर्थ डोनाल्ड ट्रंप के लिए व्हाइट हाउस का मार्ग प्रशस्त करना भी है। संभव है कि भारतीय मूल के लोग आगामी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप के लिए ट्रंप कार्ड सिद्ध हो सकते हैं और यह बात ट्रंप से बेहतर शायद ही कोई जानता हो।

अमेरिकी चुनाव

डोनाल्ड ट्रंप 20 जनवरी 2017 से अमेरिका के राष्ट्रपति हैं। अमेरिका की चुनाव प्रक्रिया कई चरणों से गुजरती है जिसमें पहले चरण में प्राइमरी चुनाव होते हैं, फिर कॉकस, बाद में नेशनल कन्वेंशन आदि से गुजरता हुआ यह इलेक्टोरल कॉलेज तक पहुंचता है। अमेरिका में 50 राज्य हैं और इन राज्यों के मतदाता इलेक्टर का चुनाव करते हैं। ये इलेक्टर राष्ट्रपति पद के किसी न किसी उम्मीदवार के समर्थक होते हैं। इन्हीं से एक इलेक्टोरल कॉलेज बनता है जिसमें कुल 538 सदस्य होते हैं। जब इनका चुनाव हो जाता है तो आम जनता की चुनाव में भागीदारी खत्म हो जाती है और इनके जरिये राष्ट्रपति चुना जाता है जिसके लिए 270 इलेक्टोरल मत जरूरी होते हैं। वर्ष 2016 के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन के बीच कांटे की टक्कर रही, मगर जीत ट्रंप के हाथ आई। व्यक्तित्व के मामले में विवादित ट्रंप 2020 में एक बार फिर व्हाइट हाउस का रास्ता तय करने के लिए भारतीय मूल के लोगों पर दृष्टि गड़ाए हुए हैं।

हाउडी मोदी कार्यक्रम इस दिशा में कहीं अधिक फायदे का सौदा हो सकता है। वैसे प्रधानमंत्री मोदी का अमेरिका में कोई यह पहला संबोधन नहीं था और न ही दुनिया में। मई 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने पहली बार प्रवासी भारतीयों को न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर में संबोधित किया था। उसके बाद यह क्रम जारी रहा। सिडनी, टोरंटो, दुबई, लंदन, सिलिकॉन वैली और जोहेनिसबर्ग और पेरिस समेत बहरीन तक के संबोधनों की गणना की जाए तो यह संख्या 15 होती है, पर एनआरजी स्टेडियम में संबोधन के कुछ अलग मायने हैं।

मोदी का भाषण

मोदी का भाषण सुनकर एक बार तो ऐसा भी लगा जैसे वह किसी चुनावी रैली को संबोधित करने आए हों और डोनाल्ड ट्रंप की स्थिति भी किसी उम्मीदवार की तरह लगी। मोदी का यह बयान कि अबकी बार ट्रंप सरकार दोनों देशों के लिए विवाद का मुद्दा हो सकता है। विरोधी भारत के प्रधानमंत्री के बयान को इस आधार पर मुद्दा बना रहे हैं कि यह दोनों देशों की संप्रभुता और लोकतंत्र में दखलंदाजी है। किसी देश में कौन राष्ट्रपति होगा यह तय करने का अधिकार शायद मोदी को नहीं है, मगर भारत के जिस रसूख को अमेरिका स्वीकार करता है और जिस तरह भारतीय मूल के लोग चुनावी तस्वीर बदल सकते हैं उसेदेखते हुए यह सब हुआ है। हालांकि अमेरिका में बसे भारतीय मूल के लोगों पर हाउडी मोदी का क्या असर हुआ है यह तो चुनाव के बाद पता चलेगा।

वर्ष 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव विवादों से अछूता नहीं था। इस चुनाव में रूस के दखल पर आरोप लग चुका है। हालांकि व्हाइट हाउस इसे सिरे से नकार चुका है। सोवियत संघ के विभाजन के बाद अमेरिका का झुकाव भारत की ओर हुआ, पर संबंधों में गर्माहट बिल क्लिंटन के समय आई। सीनियर और जूनियर जॉर्ज डब्ल्यू बुश के शासनकाल में संबंध बुरे नहीं थे, पर बहुत अच्छे भी नहीं थे जिनका संबंध रिपब्लिकन पार्टी से था। ट्रंप भी उसी पार्टी से हैं और भारत से संबंध अच्छे हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे संबंध अमेरिका के डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा से भी बहुत अच्छे थे।

[निदेशक, वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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