[ मुकुल व्यास ]: इसरो ने चंद्रमा पर दूसरा मिशन रवाना करके अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। चंद्रयान-2 इसरो का अत्यंत महत्वाकांक्षी मिशन है। चंद्रमा पर तकनीकी रूप से कठिन मिशन भेजने का साहस दिखाकर भारत ने एक बार फिर पूरी दुनिया को अपनी तकनीकी क्षमता दिखाई है। भारत अब एक बड़ी अंतरिक्ष शक्ति बन चुका है जिसका लोहा अब दूसरे देश भी मानने लगे हैं। इसी साल 27 मार्च को भारत ने अंतरिक्ष में शत्रु के उपग्रह को मार गिराने की क्षमता प्रदर्शित की थी।

अंतरिक्ष में एक और बड़ी छलांग

अब चार महीने के अंदर भारत ने चंद्रयान-2 के जरिये अंतरिक्ष में एक और बड़ी छलांग लगाई है। इस नए मिशन की सफलता के बाद इसरो के वैज्ञानिक 2022 में अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजने की तैयारियों में जुट जाएंगे। नि:संदेह वह एक गौरवशाली पल था जब शक्तिशाली उपग्रह प्रक्षेपण वाहन जीएसएलवी-मार्क 3 जिसे बाहुबली का नाम दिया जा रहा है, ने श्रीहरिकोटा से उड़ान भरकर चंद्रयान-2 को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुंचाया। यह मिशन पहले 15 जुलाई को रवाना होना था, लेकिन प्रक्षेपण से एक घंटे पहले जीएसएलवी रॉकेट के क्रायोजेनिक स्टेज में लीक दिखने के बाद रवानगी कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दी गई। इसरो के इंजीनियरों ने बहुत जल्द इस खराबी को दूर कर दिया।

पहले यह रूस के साथ संयुक्त मिशन था

चंद्रयान-2 को सबसे पहले 2010 या 2011 में छोड़े जाने की योजना थी। तब यह रूस के साथ संयुक्त मिशन था। रूस इस मिशन के लिए लैंडर और रोवर देने वाला था। रूसी लैंडर और रोवर के डिजाइन में खामियां नजर आने के बाद यह मिशन आगे नहीं बढ़ पाया। रूस भी पीछे हट गया। इसरो को स्वदेशी साधनों से ही लैंडर और रोवर का विकास करना पड़ा। इसमें वक्त लग गया। चंद्रमिशन 2017 तक तैयार हो गया था। पिछले साल इस मिशन को रवाना करने की योजना बनी, लेकिन चंद्रमा पर लैंडिंग के उपयुक्त अवसर के अभाव में इसे दो बार स्थगित करना पड़ा।

चंद्रमा पर पानी की खोज

चंद्रमा के इस मिशन से पहले भारत ने अक्टूबर 2008 में चंद्रयान-1 को चंद्रमा से 100 किमी की ऊंचाई पर वृत्ताकार कक्षा में स्थापित किया था। चंद्रमा पर पानी की उपस्थिति की खोज चंद्रयान-1 की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। चंद्रयान-2 की विशेषता यह है कि इसके साथ एक लैंडर विक्रम और एक रोवर प्रज्ञान भी है। रोवर छह पहियों वाली एक गाड़ी है।

चंद्रयान-2 चुनौतीपूर्ण और जटिल मिशन है

चंद्रयान-2 अत्यंत चुनौतीपूर्ण और जटिल मिशन है, क्योंकि इसमें इसरो न सिर्फ मुख्य परिक्रमा-यान (ऑर्बिटर) को चंद्रमा की कक्षा में स्थापित करेगा, बल्कि लैंडर को बहुत धीरे-धीरे चंद्रमा की सतह पर उतारेगा। रोवर से युक्त लैंडर ऑर्बिटर से अलग होने के बाद सात सितंबर को धीरे-धीरे चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा।

चंद्रमा की सतह तक पहुंचने में 48 दिन लगेंगे

इस तरह चंद्रयान-2 को पृथ्वी से चंद्रमा की सतह तक 3.84 लाख किमी की दूरी तय करने में 48 दिन लगेंगे। चंद्रयान-2 मिशन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने वाला भारत दुनिया का पहला देश होगा। अभी तक अमेरिका, रूस और चीन ने भी वहां यान उतारने की कोशिश नहीं की है। ऑर्बिटर से अलग होने के बाद लैंडर को चंद्रमा की सतह को छूने में 15 मिनट लगेंगे। लैंडर में लगे हुए सेंसर यान को चट्टानों और क्रेटरों से बचाते हुए सही जगह पर उतरने में मदद करेंगे।

चंद्रमा पर चहलकदमी

सतह पर उतरने के करीब साढ़े चार घंटे बाद लैंडर से रोवर बाहर निकल कर चंद्रमा की सतह पर चहलकदमी करते हुए प्रयोग शुरू कर देगा। ऑर्बिटर 100 किमी ऊंची कक्षा में स्थापित होकर चंद्रमा की सतह के नक्शे तैयार करेगा। उसका कार्यकाल एक वर्ष का है। लैंडर और रोवर के मिशन का कार्यकाल एक-एक चंद्र दिवस का है। एक चंद्र दिवस पृथ्वी के 14-15 दिन के बराबर होता है।

ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर खींचेंगा चांद की तस्वीरें

चंद्रयान-2 मिशन के ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर में कुल 14 उपकरण हैं जो चंद्रमा की तस्वीरें खींचेंगे और खनिजों, हीलियम गैस और भूमिगत बर्फ की तलाश करेंगे। लैंडर और रोवर को बेंगलुरु स्थित लूनर टेरेन टेस्ट फेसिलिटी में जांचा-परखा गया है। इसके लिए तमिलनाडु के सलेम से खास तरह की मिट्टी मंगाई गई। पहले अमेरिका से चंद्रमा जैसी मिट्टी मंगाने पर भी विचार किया गया था, जिसका मूल्य 150 डॉलर प्रति किलो था। चूंकि इसमें 60-70 टन मिट्टी खर्च होनी थी तो देसी वैज्ञानिकों ने घरेलू समाधान तलाश कर इसे किफायती बना दिया।

रोवर के लिए दक्षिणी ध्रुव उपयुक्त जगह

लैंडिंग के लिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का चुनाव उसकी सुविधाजनक स्थिति और बेहतर संचार के हिसाब से किया गया है। रोवर को अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए सौर ऊर्जा चाहिए। दक्षिणी ध्रुव में पर्याप्त मात्रा में सूरज की रोशनी उपलब्ध है। लैंडिंग की जगह पर 12 डिग्री से ज्यादा ढलान नहीं होना चाहिए, अन्यथा लैंडर लुढ़क जाएगा। इस दृष्टि से भी यह स्थल उपयुक्त पाया गया। यहां उत्तरी ध्रुव की तुलना में जल-बर्फ की मौजूदगी की संभावना अधिक है। अत: भारतीय मिशन से नई वैज्ञानिक जानकारियों की उम्मीद की जा सकती है।

चंद्रयान-2 शत प्रतिशत स्वदेशी मिशन है

चंद्रयान-2 शत प्रतिशत स्वदेशी मिशन है, क्योंकि प्रक्षेपण वाहन, ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर का निर्माण इसरो की निर्माणशालाओं में हुआ है। चंद्रयान-2 को अंतरिक्ष में पहुंचाने वाले प्रक्षेपण वाहन, बाहुबली रॉकेट का डिजाइन और निर्माण तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर ने किया है। तीन चरणों वाले रॉकेट का वजन 640 टन है। देश के तमाम शोध संस्थानों ने भी इसमें योगदान दिया है। समूचा देश इस मिशन से लाभान्वित होगा।

चंद्रयान-2 मिशन की लागत 1000 करोड़

संपूर्ण मिशन की लागत करीब 1000 करोड़ है। इसमें 603 करोड़ रुपये चंद्रयान-2 के कंपोजिट मॉड्यूल के निर्माण और इसरो को ट्रैकिंग और नौसंचालन सुविधाएं उपलब्ध कराने वाली विदेशी एजेंसियों को भुगतान में खर्च किए गए हैं। जीएसएलवी-मार्क 3 के निर्माण में करीब 375 करोड़ रुपये खर्च हुए। इस रॉकेट के निर्माण में देश भर के करीब 500 उद्योगों ने योगदान किया है। कंपोजिट मॉड्यूल के लिए हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर जुटाने में 120 उद्योगों का योगदान है।

चंदमा की रासायनिक संरचना का अध्ययन

चंद्रयान-2 के लैंडर का वजन 1.4 टन है। इसमें चार पेलोड हैं जिनमें एक नासा का है। तीन भारतीय उपकरण चंद्रमा के भूकंपों पर प्रयोग करेंगे और लैंडिंग की जगह के ताप-भौतिक गुणों का अध्ययन करेंगे। नासा के पेलोड, लेजर रेट्रोरिफ्लेक्टर अरे को अंतिम समय में शामिल किया गया है। यह पृथ्वी-चंद्रमा सिस्टम की बारीकियों को समझने की कोशिश करेगा और चंदमा पर लैंडर और पृथ्वी के बीच की दूरी को नापेगा। रोवर का वजन करीब 27 किलो है। इसमें अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर सहित दो पेलोड हैं। ये उपकरण चंदमा की सतह की रासायनिक संरचना का अध्ययन करेंगे।

( स्तंभकार विज्ञान मामलों के लेखक हैैं ) 

Posted By: Bhupendra Singh

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