14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने मशहूर भाषण में कहा था-बहुत समय पहले हमने नियति के साथ एक वादा किया था और अब वह समय आ गया है जब हमें यह शपथ फिर से दोहरानी चाहिए कि राष्ट्र और उनके लोगों की सेवा की अपनी प्रतिबद्धता में हम कभी पीछे नहीं हटेंगे। उनके शब्द इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गए, लेकिन 29-30 दिसंबर, 2011 की मध्यरात्रि में संप्रग सरकार ने जो कुछ किया वह इस संकल्प को तोड़ने वाला था। यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहते तो सदन में खड़े होकर कह सकते थे कि मैंने देश की जनता से जो वायदे किए थे उन्हें पूरा किया, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सत्ता की राजनीति में बहुत कुछ ऐसा देखना पड़ता है जो बहुत ही भद्दा होता है, लेकिन गत रात्रि जो कुछ हुआ उसे देखते हुए मुझे संसद का एक विद्यार्थी और संसदीय लोकतंत्र का इतिहासकार होने के नाते कहना पड़ेगा कि वह हमारे लोकतंत्र पर एक बदनुमा धब्बा है। आने वाली पीढि़यां शायद इसके लिए हमें कभी क्षमा न करें। इसी तरह के आचरण देश में समस्याएं पैदा करते हैं। अगर लोगों को यह लगने लगे कि जनता के प्रतिनिधियों की जो सर्वोच्च प्रतिनिधिक संस्था है वह कुछ नहीं कर पा रही है या उसमें सत्ता की राजनीति इतनी हावी हो जाती है कि जनहित और राष्ट्रहित, संसदीय परंपराएं और संविधान को तिलांजलि दे दी जाती है तो जनता की आस्था संविधान में और संसदीय व्यवस्था से डगमगाने लगती है।

कल रात राज्यसभा में सरकार की तरफ से दिया गया यह बयान कि सत्र खत्म करने के अलावा और दूसरा कोई विकल्प नहीं है, एक गलतबयानी थी। कम से कम सदन में एक संशोधन यानी राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति और उसके संबंध में कानून बनाने की विधानमंडलों की शक्ति को लेकर बहुमत साफ था। इसके पक्ष में भाजपा समेत बसपा, बीजद, तृणमूल कांग्रेस आदि एकमत थे यानी इस एकमात्र संशोधन की स्वीकार्यता पर लोकपाल विधेयक पारित हो जाता, लेकिन सरकार इसे मानने को तैयार नहीं हुई। जब सदन का बहुमत विधेयक को पारित करने के पक्ष में था तो इसका कोई औचित्य नहीं कि बहुमत का सम्मान न किया जाता। यदि सरकार सचमुच गंभीर होती तो विधेयक पारित हो जाता। यदि सरकार इस मसले को भी टालना चाहती थी तो मामला राज्यसभा की प्रवर समिति को भेजा जा सकता था और विधेयक को पारित करा लिया जाता और बाकी संशोधन बाद में हो जाते, लेकिन ऐसा करने के बजाय सदन को मतदान न करने देने का रास्ता अपनाया गया। वास्तव में एक सोची-समझी पलायन की रणनीति बनाई गई और सदन में मतदान से बचा गया। दरअसल, राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ा मुद्दा-लोकपाल के बजाय राज्यों में आगामी चुनाव हैं, जिसके मद्देनजर ही दोषारोपण का खेल शुरू हुआ। कुछ न कुछ दोष तो सबका है, लेकिन सरकार का दोष सबसे अधिक है।

लोकपाल विधेयक को संसद में रखवाने के लिए निश्चित ही आंदोलनकारियों को श्रेय जाता है, लेकिन उनकी जो भूमिका रही वह भी ठीक नहीं थी, क्योंकि वे अपने ही विधेयक को अक्षरश: पारित कराने पर जोर दे रहे थे। मेरा मानना है कि विधि की यात्रा कभी खत्म नहीं होती। विधिनिर्माण एक सतत क्रियाशील प्रक्रिया है, जिसमें पड़ाव तो आते हैं, लेकिन अंत कभी नहीं आता। लोकपाल बिल कमजोर ही सही यदि पास हो जाता तो बाद में इसमें संशोधन और सुधार हो जाते। लोकपाल पारित होने से कम से कम इस प्रक्रिया की शुरुआत तो हो ही गई होती। यहां हमें नहीं भूलना चाहिए कि लोकपाल विधेयक चाहे वह सरकारी हो, संशोधित अथवा तथाकथित जनलोकपाल बिल-कोई भी भ्रष्टाचार की जड़ में नहीं जाता और न ही यह इसके कारणों या समाधान को खोजता है। विधेयक में जिस व्यक्ति पर आरोप है उसकी जांच कौन करेगा, सजा कौन देगा, इसे स्पष्ट नहीं किया गया है। यह ऐसा ही है जैसे आत्महत्या को रोकने के लिए सजा बढ़ाने का कानून बना दिया जाए, लेकिन आत्महत्या के कारणों को जानने और उन्हें खत्म करने की कोई कोशिश न हो। विधेयक भ्रष्टाचार के कैंसर पर आघात नहीं करता। औसतन एक सांसद टिकट पाने और चुनाव जीतने के लिए 10 करोड़ रुपये खर्च करता है और अगली बार जीतने के लिए भी उसे इतनी ही रकम जुटानी होती है। फिर वह भ्रष्टाचार क्यों नहीं करेगा?

व्यवस्थागत परिवर्तन यानी राजनीतिक दलीय व्यवस्था और निर्वाचन व्यवस्था में बदलाव लाए बिना राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव नहीं। यहां सवाल सरकार की मंशा और इच्छाशक्ति का भी है। जिन 187 संशोधनों का हवाला देकर समय न होने और दूसरा कोई विकल्प न होने की बात कही गई वह गलत है, क्योंकि इन संशोधनों पर मिनटों में बटन दबाकर मतदान संभव था। इसके अलावा नया साल आने और राष्ट्रपति के अभिभाषण का उल्लेख भी सिर्फ एक बहाना था। जब विपक्ष तैयार था तो सरकार का भागना गलत था। देर रात तक बैठकर या अगले दिन विधेयक को पारित किया जा सकता था। सभापति ने भी स्थिति को अभूतपूर्व और सत्र खत्म करने के अतिरिक्त दूसरा विकल्प न होने की बात कही, क्योंकि सरकार खुद ही मतदान के लिए तैयार नहीं थी। फिलहाल विधेयक राज्यसभा में है, जो उसका लंबित मामला है और यह दोबारा कब सदन में रखा जाएगा, यह सरकार पर निर्भर करेगा। राज्यसभा की खाली सीटों के लिए चुनाव होने हैं और सरकार को राज्यसभा में बहुमत पा लेने की उम्मीद है। इस बीच वह बाकी दलों से भी सौदेबाजी या समझौते कर सकती है। जो भी हो, संसद पर लगा बदनुमा धब्बा तो रहेगा ही और यह संसदीय लोकतंत्र और सरकार के लिए यह एक काला अध्याय है।

[सुभाष कश्यप: लेखक संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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