चीन भारत की सबसे बड़ी और सबसे गंभीर सामरिक चुनौती के रूप में उभर रहा है। भारत की वर्तमान चीन नीति से यह बात सिद्ध हो जाती है कि कमजोरी दबंगई को आकर्षित करती है। भारत जितना डर रहा है, चीन उतना ही आक्त्रामक हो रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में तीन सप्ताह तक लद्दाख में चीनी सेना की घुसपैठ गौर करने लायक है। भारत में कैंप लगाकर बैठा चीन तब वापस लौटा जब भारत ने देपसांग के दक्षिण में चार सौ किलोमीटर दूर चुमार क्षेत्र में एक तरह से हथियार डालते हुए आत्मघाती रक्षात्मक रुख अपनाया और चीन के साथ सीमा रक्षा सहयोग समझौते के मसौदे पर विचार करने को तैयार हो गया। तब से चीन के मुंह जैसे खून लग गया और उसने लद्दाख क्षेत्र में घुसपैठों की झड़ी लगा दी। हैरत की बात यह है कि चीनी घुसपैठ राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम ध्यान खींच रही है। इसका कारण यह है कि भारत सरकार क्षुद्र राजनीति के दलदल में फंसी हुई है। 26 जुलाई को भारत के रक्षा मंत्री एके एंटनी ने यह कह कर हालात को सामान्य करने की कोशिश की कि जल्द ही विवादित क्षेत्रों में घुसपैठ की घटनाओं को रोकने के लिए बीजिंग के साथ वार्ता होगी। इसमें ऐसा तंत्र विकसित किया जाएगा कि घुसपैठ जैसी अप्रिय स्थिति को टाला जा सके, लेकिन इस तरह की बातें तो लंबे समय से की जा रही हैं और इस मुद्दे पर तमाम वार्ताओं और संधियों से हालात नहीं सुधरे हैं। 1देपसांग में अपने सैनिकों की घुसपैठ करने, इसके विस्तार की धमकी देने और भारत से छूट हासिल करने से चीनी सेना को भड़काऊ कार्रवाइयों के लिए प्रोत्साहन मिला। इन छूटों में एक है चुमार-तिब्बत सीमा पर भारत की पेट्रोलिंग स्थगित करना। इससे उत्साहित होकर चीन ने भारत में घुसपैठ तेज कर दी ताकि वह सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र पर अपना दावा मजबूत कर सके। इस इलाके से तिब्बत-शिनजियांग हाईवे पर नजर रखी जा सकती है। भारत को चुमार से चौकियां हटाने और पेट्रोलिंग बंद करने के लिए मजबूर करके चीन ने दो लक्ष्य साध लिए हैं-सेना की तैनाती और निगरानी पर चीन द्वारा निर्धारित प्रतिबंधों पर भारत की सहमति हासिल करना और यह मनवा लेना कि यह इलाका विवादित है। इस इलाके को विवादित घोषित करके चीन परस्पर समायोजन और परस्पर सम्मान के आधार पर अपनी शर्तो पर समाधान निकालने का प्रयास करेगा। इसमें चीन अपनी पुरानी कहावत पर चलता नजर आएगा कि जो हमारा है वह तो हमारा है ही, किंतु जो आपका है उस पर बातचीत कर लेन-देन के आधार पर समाधान निकाला जाए। अपनी सामरिक कायरता पर पर्दा डालने के लिए नई दिल्ली 50 हजार सैनिकों की माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन की अपनी विलंबित योजना को हरी झंडी दिखाकर इतरा रही है। हालांकि इस योजना को कई साल पहले ही लागू किया जाना चाहिए था। निर्णय लेने की लचर प्रक्त्रिया से भारत की हिमालयी सुरक्षा में बड़ी दरारें पड़ गई हैं जो अभी तक नहीं भरी गई हैं। संभवत: विश्व में भारत एकमात्र ऐसा देश है जो अपनी ऐसी रक्षा योजनाओं का प्रचार करता है जिन्हें फलीभूत होने में वर्षो लग जाएंगे। 1नई स्ट्राइक कोर के गठन और तैनाती में करीब सात साल और 10.7 अरब डॉलर लगेंगे। किंतु इस घोषणा में भी भारत ने अपनी कमजोरी दिखा दी। इस बल को अरुणाचल प्रदेश में तैनात करने के बजाय सरकार ने पश्चिम बंगाल और अन्य क्षेत्रों में तैनाती का निश्चय किया है। इसके पीछे सीधे-सीधे चीन का डर झलकता है, जो अरुणाचल प्रदेश को विवादित क्षेत्र बताता है। यह भारत का ऐसा पहला सुरक्षा बल होगा जो पहाड़ी युद्ध क्षमताओं से लैस होगा। यही नहीं, इसमें आक्त्रमणकारी के क्षेत्र में जाकर युद्ध लड़ने की बेहद महत्वपूर्ण खूबी होगी। इस बल की तैनाती से चीन के सैन्य दुस्साहस पर अंकुश लग सकता है। इसमें दो इन्फैंट्री डिविजन, एक एयर-डिफेंस ब्रिगेड, दो आर्टिलरी ब्रिगेड, एक विमानन ब्रिगेड और एक इंजीनियरिंग ब्रिगेड होगी। इस बल के गठन के बाद भी भारत-चीन के बीच सैन्य असमानता दूर नहीं होगी। 1हालिया कुछ सालों में चीनी सैन्य टुकड़ियों की भारतीय क्षेत्र में पेट्रोलिंग तेजी से बढ़ी है। करीब-करीब रोजाना सीमा अतिक्त्रमण से चीन भारत पर सैन्य दबाव बढ़ा रहा है। जैसा कि भारतीय सेना ने सरकार को अवगत कराया है, कई मामलों में तो चीन उन क्षेत्रों तक भी पहुंचा है जिन्हें वह विवादों से परे मानता है। 2001 में मध्य क्षेत्र के नक्शों के आदान-प्रदान के बाद चीन ने अन्य दो क्षेत्रों के नक्शों के लेन-देन का अपना वचन तोड़ दिया। इस पृष्ठभूमि में चीन के ऑपरेशन एग्रीमेंट ड्राफ्ट को भारत का पूरा समर्थन मिलना हैरान करता है। यह मसौदा भारत को जबरन सौंपा गया है, जैसे माथे पर बंदूक लगाकर मसौदे पर विचार के लिए मजबूर किया गया है। इस मसौदे को 4 मई को भारत को सौंपा गया और तब तक चीनी की पलटन देपसांग में कैंप डालकर बैठी हुई थी। चीनी मसौदे से दो बातें निकलती हैं। पहली, इसका मंतव्य भारत को सामरिक नुकसान की स्थिति में रखना है। इस प्रकार सीमा पर दोनों देशों द्वारा सैनिकों की तैनाती और निगरानी पर स्थगन से भारत चीन के अतिक्त्रमण का आसान निशाना बन गया है। स्पष्ट है कि इसका उद्देश्य भारत द्वारा इस क्षेत्र में पहले से विलंबित सैन्य साजोसामान की आपूर्ति और सैनिकों की नियुक्ति में बाधा खड़ी करना है। इसका दूसरा उद्देश्य है सीमा पर शांति व पारस्परिक विश्वास बहाली के लिए 1993, 1996 और 2005 में हुई संधियों को ठंडे बस्ते में डालना। 1चीन द्वारा 2006 में अरुणाचल प्रदेश पर दावा ठोकने और भारतीय सीमा में घुसपैठ की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए अब भारत के लिए सीमा वार्ता में प्रगति का दिखावा करना कठिन हो गया है। देपसांग में शिविर लगाने की घटना चीन द्वारा पूर्व में शांति और निश्चिंतता की केंद्रीय अवधारणाओं पर कुठाराघात है। क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि चीन इन संधियों के बदले ऐसा एकतरफा समझौता थोपना चाहता है, जिसके तहत वह समझौतों के माध्यम से नियंत्रण की रणनीति से लाभ उठाता रहे। अफसोस की बात यह है कि भारत चीन की इस चाल में फंस रहा है। भारत द्वारा सुझाव और टिप्पणियों के लिए चीनी मसौदे का अध्ययन यही दर्शाता है कि वह चीन के हाथों में खेल रहा है। 6 जुलाई को रक्षामंत्री एके एंटनी और चीनी समकक्ष जनरल चांग वेन क्वान ने संयुक्त बयान जारी करते हुए प्रस्तावित समझौतों की वार्ता के प्रारंभिक निष्कर्षो पर सहमति जताने की घोषणा की। क्या बंदूक की नोक पर थोपा गया कोई मसौदा समझौते के निष्कर्ष का आधार बन सकता है? क्या भारत एक पराजित राष्ट्र है जिसके पास वार्ता के लिए थोपे गए एक मसौदे को स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं है?

[लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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