[डॉ. श्रीरंग गोडबोले]। खिलाफत आंदोलन (1919-1924) का भारत में तभी प्रारंभ हो गया था, जब इस्लामी आक्रमणकारियों ने देश में कदम रखा था। 11 मई 1857 को दिल्ली के विद्रोहियों के कब्जे में आने के बाद नाममात्र के मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने बख्त खान (मृत्यु 1859) को विद्रोही बलों का मुख्य सेनापति नियुक्त किया। बख्त खान दिल्ली में 100 जिहादियों के साथ पहुंचा था। बख्त खान रुहेला अफगानों का संरक्षक था जो अपने अमीर-उल-मुजाहिदीन, मौलाना सरफराज अली के नेतृत्व में हांसी, हिसार, भोपाल और टोंक से दिल्ली पहुंचे थे।

हिंदू-मुस्लिम एकता को लेकर मुस्लिमो में कोई भ्रम नहीं था। 20 मई 1857 को मौलवी मोहम्मद सईद ने मुग़ल बादशाह के समक्ष स्पष्ट किया कि, "जिहाद का परचम, हिंदुओं के खिलाफ महोमेदानों की भावनाओं को भड़काने के उद्देश्य से फहराया गया था।" 14 जून 1857 को दिल्ली में अपने शिविर से पंजाब के मुख्य आयुक्त लॉरेन्स को भेजे पत्र में, मेजर जनरल टी. रीड ने लिखा, "वे (मुस्लिम) शहर में हरे झंडे दिखा प्रदर्शन कर रहे हैं और हिंदुओं को धमका रहे हैं।" वाराणसी में 4 जून की आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया है कि "खबर मिली थी कि कुछ मुसलमानों ने बिशेसर के मंदिर में हरे झंडे फहराने का दृढ़ संकल्प किया था"(द सेपोय म्युटिनी एंड रिवोल्ट ऑफ़ 1857, आर.सी मजूमदार, फ़रमा केएलएम, 1957, पृ.230)।

1857 के जिहाद के मुस्लिम अगुआओं के अखिल-इस्लामी संपर्कों का उल्लेख आवश्यक है। 1857 के जिहाद में अपनी भूमिका के लिए अभियोजन से बचने के उद्देश्य से सैय्यद फदल अल्वी, रहमतुल्लाह कैरानवी, हाजी इमदादुल्लाह मक्की, नवाब सिद्दीक हसन खान और मौलाना जाफर थानेसरी भारत से भाग गए। उन्होंने अखिल-इस्लामी संपर्क बनाने के लिए शाही तंत्र के बंदरगाहों, यात्रा मार्गों और संचार के बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल किया था। उन्होंने हिंद महासागर होते हुए मक्का, काहिरा और कांस्टेंटिनोपल जैसे इस्लामी जगत के केंद्र स्थलों की यात्रायें कीं।

रौलट सेडिशन कमेटी की रिपोर्ट

अंग्रेज अपने शासन को उखाड़कर इस्लामी शासन स्थापित करने के प्रयासों से स्वाभाविक रूप से हैरान थे। रौलट कमेटी रिपोर्ट के नाम से प्रसिद्द सेडिशन (राज-द्रोह) कमेटी रिपोर्ट (1918) ने 'भारत में क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े आपराधिक षड्यंत्रों के स्वरुप और उनके विस्तार’ पर प्रकाश डाला। 226 पृष्ठ की रिपोर्ट में 'मुहम्मडन करंट' पर एक अनुभाग है। रिपोर्ट का एक प्रासंगिक अंश निम्नलिखित है (पृ.178-179):

1. तुर्की के साथ भारतीय मुस्लिमों की सहानुभूति क्रीमिया के युद्ध के समय से ही देखी जा सकती थी।

2. कट्टर मुस्लिमों के एक छोटे और अस्पष्ट रूप से परिभाषित समूह के बीच, भारत में वर्तमान ब्रिटिश शासन को हटा कर एक नए इस्लामी साम्राज्य को स्थापित करने की इच्छा विद्यमान रही है।

3. ‘रेशमी पत्र आंदोलन’ नामक एक षड्यंत्र का पता लगा था। इसका उद्देश्य उत्तर-पश्चिम सीमा पर हमले के द्वारा भारत से ब्रिटिश शासन को नष्ट करना था, जिसके साथ ही साथ पूरक के रूप में इस देश में मुस्लिम विद्रोह भी होना था।

4. एक परिवर्तित सिख मौलवी उबैदुल्लाह सिन्धी ने अगस्त 1915 में तीन साथियों अब्दुल्ला, फतेह मुहम्मद और मुहम्मद अली के साथ उत्तर-पश्चिम सीमांत क्षेत्र को पार किया। इन लोगों ने देवबंदी मौलवियों के माध्यम से भारत भर में एक अखिल-इस्लामी और ब्रिटिश विरोधी आंदोलन को फैलाने की योजना बनाई थी।

5. उबैदुल्लाह सिन्धी एक तुर्को-जर्मन मिशन के सदस्यों से मिला। हेजाज़ (तटीय अरब का वह हिस्सा जहाँ मक्का-मदीना हैं) के तुर्क सैन्य गवर्नर ग़ालिब पाशा से जिहाद का घोषणा-पत्र लेकर मौलवी मुहम्मद मियां अंसारी 1916 में भारत लौटा था।

6. अल्लाह की सेना में भारत के रंगरूटों की भर्ती कराने तथा इस्लामी मुल्कों का गठबंधन बनाने की योजना थी। इसका मुख्यालय मदीना में होना था और स्थानीय सैन्य मुखियाओं के नेतृत्व में अधीनस्थ मुख्यालय कांस्टेंटिनोपल, तेहरान और काबुल में स्थापित किए जाने थे।

विदेश स्थित भारतीय मुस्लिमों की भूमिका

विदेशों, विशेष रूप से ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मुस्लिमों ने अखिल-इस्लामी भावनाओं को भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1886 के प्रारंभ में लंदन में अंजुमन-ए-इस्लाम नामक एक अखिल-इस्लामी संस्था की स्थापना हुई, जिसकी शाखाएं भारत में भी थीं। 1903 में एक भारतीय बैरिस्टर अब्दुल्ला अल-मामून सुहरावर्दी (1875-1935) ने इस लगभग मरणासन्न संस्था को 'द पैन-इस्लामिक सोसाइटी ऑफ लंदन' के नए नाम से पुनर्जीवित किया। सोसायटी ने तुर्की के साथ सीधे संपर्क स्थापित करने और अपनी पत्रिका ‘पैन-इस्लाम’ के माध्यम से तुर्की और इस्लाम को प्रभावित करने वाले सवालों पर मुस्लिम भावनाओं को उभारने का काम किया।

जब सितंबर 1911 में इटली ने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की मिलीभगत से ओटोमन शासित त्रिपोली पर धावा बोल दिया तो भारत के मुस्लिमों में आक्रोश फैल गया। लंदन मुस्लिम लीग ने भी तुर्की की सहायता के लिए स्वयंसेवकों को लामबंद करने की धमकी दी। त्रिपोली में पीड़ितों को सहायता पहुंचाने के उद्देश्य से रेड क्रिसेंट सोसाइटी की स्थापना की गई। लाहौर से लेकर मद्रास तक मुस्लिम समाज के दोनों वर्गों सुन्नियों और शियाओं ने चंदा दिया। और इस अहसान का बदला चुकाने के लिए सुन्नियों ने उत्तरी फारस के रूसी कब्जे वाले शहर मशहद में इमाम अली रज़ा के मकबरे पर रुसी बमबारी की निंदा करने में शिया समुदाय का भरपूर साथ दिया (खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया 1919-1924, मुहम्मद नईम कुरैशी, लंदन विश्वविद्यालय के लिए प्रस्तुत शोध प्रबंध, 1973, पृ. 19-23)।

गड़गड़ाहट की आहट

जब अक्टूबर 1912 में, बाल्कन राज्यों ने संयुक्त होकर तुर्की पर हमला किया तो इसके विरुद्ध भारत के मुस्लिमों के बीच त्वरित और कटु आक्रोश फ़ैल गया। उलेमा ने अपने आपसी मतभेदों को किनारे कर दिया। कवि और मजहबी विद्वान शिबली नुमानी ने ‘इस्लाम खतरे में है’ का राग अलापना शुरू कर दिया| उसके युवा अनुयायी अबुल कलाम आज़ाद ने घोषणा की कि जिहाद का समय आ गया है। संयुक्त प्रान्त के पत्रकार शौकत अली (1875-1958), ने कॉमरेड समाचार पत्र में एक स्वयंसेवक दल को गठित करने के लिए अपील जारी की। कॉमरेड के संपादक और उनके भाई मुहम्मद अली (1878-1951) ने इस बात पर बल दिया कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय के लिए एकत्र किया गया धन तुर्की को उधार के रूप में दिया जाए। डॉ मुख्तार अहमद अंसारी (1880-1956) के नेतृत्व में एक अखिल भारतीय चिकित्सा मिशन दिसंबर 1912 के अंत में कांस्टेंटिनोपल पहुंचा। मिशन यंग तुर्क नेताओं के साथ साथ मिस्र के राष्ट्रवादियों के साथ भी संपर्क स्थापित करने में सफल हुआ। इस समय मेसीडोनिया के मुस्लिम शरणार्थियों के लिए अनातोलिया में एक पुनर्वास कॉलोनी, मदीना में एक विश्वविद्यालय, एक इस्लामी बैंक और एक सहकारी समिति की स्थापना प्रस्तावित की गई। इस परियोजना को कॉमरेड समाचार पत्र द्वारा सक्रिय रूप से समर्थन प्रदान किया गया और भारत के मुस्लिमों को तुर्की सुरक्षा बांड खरीदने के लिए भी प्रोत्साहित किया।

भारत में अखिल-इस्लामी आन्दोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि मई 1913 में अंजुमन-ए-ख़ुद्दाम-ए-काबा (काबा के सेवकों का समाज) नामक एक संस्था की स्थापना थी| लखनऊ में फिरंगी महल मदरसा के प्रभावशाली आलिम मौलाना अब्दुल बारी (1879-1926) इसके अध्यक्ष थे और एम.एच. होसैन किदवई और अली बंधु इसके अन्य महत्वपूर्ण प्रवर्तक थे। उन्होंने एक दोहरी योजना पर कार्य करने का फैसला किया जिसमे सर्वप्रथम था किसी भी गैर-मुस्लिम आक्रमण का विरोध करने के लिए मुस्लिमों को संगठित करना| तुर्की को एक शक्तिशाली मुस्लिम शक्ति के रूप में इतना सशक्त करना ताकि मुस्लिमों के पवित्र स्थानों पर एक स्वतंत्र और प्रभावी मुस्लिम प्रभुत्व बनाए रखा जा सके इसका एक और उद्देश्य था।

तुर्की से धनाढ्य आगंतुक भारत आये जिन्हें कथित तौर पर भारत में परेशानियाँ उत्पन्न करने के उद्देश्य से भेजा गया था। ऐसा भी बताया जाता था कि तुर्की सरकार कथित तौर पर हैम्बर्ग में एक जर्मन फर्म के साथ भारतीय मुस्लिमों को उपलब्ध कराने के लिए राइफलों की खरीद हेतु बातचीत कर रही थी (कुरैशी, उक्त, पृ. 22-29)। जुलाई 1914 में जब सर्बिया और ऑस्ट्रिया के बीच संघर्ष के रूप में प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ हुआ उस समय भारत की ऐसी स्थिति थी। यह एक बारूद का बक्सा था जो विस्फोट का इंतजार कर रहा था!

(लेखक ने इस्लाम, ईसाइयत, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धी आंदोलन और धार्मिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं)

Posted By: Amit Singh

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